कौन जीतेगा दलितों का दिल
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मुस्लिमों के बाद जिले में दूसरी बड़ी आबादी वाले दलितों की है। जिनके दम पर ही पिछले विधानसभा चुनाव में भी कुल सात विधानसभा सीटों में से चार पर बसपा उम्मीदवारों का ही कब्जा रहा।
इतना ही नहीं, दलित वोटरों के दम पर ही पिछले विधानसभा चुनावों में एक या दो बार नहीं बल्कि तीन-तीन बार उम्मीदवार विधानसभा तक पहुंचे हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव में सियासी हालत बदले हुए हैं।
जो कल तक बसपा में दलितों के रहनुमा थे। वे अब बागी होकर भाजपा का दामन थाम चुके हैं। पांच लाख से अधिक दलित वोटर हैं। बदले राजनीतिक माहौल में बसपा के साथ ही भाजपा और कांग्रेस भी दलितों को अपनी ओर खींचने की जद्दोजहद में हैं।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि दलितों का दिल कौन सा दल या उम्मीदवार जीतने में कामयाब होगा। उधर, लंबे अरसे से दलितों के रहनुमा रहे स्वामी प्रसाद मौर्य के भाजपा का दामन थामने के बाद ही उनके करीबी डा. धर्म सिंह सैनी भी बसपा से बागी होकर अब भाजपा का दामन थाम चुके हैं।
भाजपा ने उन्हें नकुड़ सीट से ही टिकट भी दे दिया है, लेकिन अब नए सियासी समीकरणों में दलित वोटरों में सेंध उनके लिए आसान नहीं होगी जबकि भाजपा इस उम्मीद में है कि दलित वोटों के सहारे वे बेड़ा पार लगा दें।
बेहट विधानसभा सीट पर महावीर राणा भी अब बसपा से बागी होकर भाजपा से चुनावी मैदान में हैं। पहले विधानसभा चुनाव में दलितों के सहारे ही करीबी अंतर से जीतने वाले महावीर राणा के लिए इस बार का चुनाव कड़ा इम्तिहान होगा क्योंकि दलितों को जोड़ना और भाजपा में भीतरघात से जूझना आसान नहीं होगा।