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Saharanpur News: शिवालिक से मिला ट्राइसेराटोप्स डायनासोर का जीवाश्मर
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जगदीप कुमार
सहारनपुर। शिवालिक से निकलने वाली सहनस्रा नदी के तट से हाल ही में एक सींग का जीवाश्म मिला है। इसकी खोज हिमालयन पर्यावरण संस्थान देहरादून के निदेशक डॉ. उमर सैफ ने की है। उनकी शुरुआती जांच में यह ट्राइसेराटोप्स डायनासोर के नाक का सींग के रूप में पुष्ट हुआ है, क्योंकि इससे पहले डायनासोर के पंख और अंडे का जीवाश्म भी यहां से मिल चुका है। उन्होंने जीवाश्म के फोटो जियोलॉजी सोसायटी ऑफ इंडिया को भी भेजे हैं और जांच के लिए आमंत्रित किया है।
डॉ. सैफ ने बताया कि सींग मिलने के बाद उन्होंने डायनासोर की प्रजातियों पर आधारित रिसर्च पेपर्स को स्टडी किया, जहां भी अभी तक ट्राइसेराटोप्स डायनासोर के सींग मिले हैं। उनसे भी मिलान किया गया है।
शुरुआती जांच के आधार पर यह ट्राइसेराटोप्स डायनासोर का सींग दिखाई पड़ता है। यह जीवाश्म पूरी तरह से सैंडस्टोन में बदल चुका है, जो लाखों वर्षों तक पानी के संपर्क में रहने और भारी मिनरलाइजेशन के कारण संभव हुआ। उन्होंने बताया कि यह खोज विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
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क्योंकि भारत में लेट क्रेटेशियस काल (लगभग 10.05 करोड़ वर्ष पूर्व से लेकर 6.6 करोड़ वर्ष पूर्व) के डायनासोर के जीवाश्म बहुत सीमित संख्या में मिले हैं। अब तक गुजरात के नर्मदा घाटी क्षेत्र में राजासौरस जैसे मांसाहारी डायनासोर के अवशेष पाए गए हैं। सींगधारी डायनासोर (ट्राइसेराटोप्स) उत्तरी अमेरिका में पाए जाते थे। शिवालिक से मिला जीवाश्म इस संभावना को जन्म देता है कि भारत में भी ऐसे डायनासोर की उपस्थिति रही हो या उनके किसी करीबी रिश्तेदार का विकास हुआ हो। डॉ. सैफ ने पुराजैविक विशेषज्ञों, भूवैज्ञानिकों और संबंधित संस्थानों से अनुरोध किया है कि वह इस खोज की वैज्ञानिक पुष्टि और विस्तृत अध्ययन के लिए शिवालिक क्षेत्र का दौरा करें। संवादक
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सहारनपुर। शिवालिक से निकलने वाली सहनस्रा नदी के तट से हाल ही में एक सींग का जीवाश्म मिला है। इसकी खोज हिमालयन पर्यावरण संस्थान देहरादून के निदेशक डॉ. उमर सैफ ने की है। उनकी शुरुआती जांच में यह ट्राइसेराटोप्स डायनासोर के नाक का सींग के रूप में पुष्ट हुआ है, क्योंकि इससे पहले डायनासोर के पंख और अंडे का जीवाश्म भी यहां से मिल चुका है। उन्होंने जीवाश्म के फोटो जियोलॉजी सोसायटी ऑफ इंडिया को भी भेजे हैं और जांच के लिए आमंत्रित किया है।
डॉ. सैफ ने बताया कि सींग मिलने के बाद उन्होंने डायनासोर की प्रजातियों पर आधारित रिसर्च पेपर्स को स्टडी किया, जहां भी अभी तक ट्राइसेराटोप्स डायनासोर के सींग मिले हैं। उनसे भी मिलान किया गया है।
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शुरुआती जांच के आधार पर यह ट्राइसेराटोप्स डायनासोर का सींग दिखाई पड़ता है। यह जीवाश्म पूरी तरह से सैंडस्टोन में बदल चुका है, जो लाखों वर्षों तक पानी के संपर्क में रहने और भारी मिनरलाइजेशन के कारण संभव हुआ। उन्होंने बताया कि यह खोज विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
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क्योंकि भारत में लेट क्रेटेशियस काल (लगभग 10.05 करोड़ वर्ष पूर्व से लेकर 6.6 करोड़ वर्ष पूर्व) के डायनासोर के जीवाश्म बहुत सीमित संख्या में मिले हैं। अब तक गुजरात के नर्मदा घाटी क्षेत्र में राजासौरस जैसे मांसाहारी डायनासोर के अवशेष पाए गए हैं। सींगधारी डायनासोर (ट्राइसेराटोप्स) उत्तरी अमेरिका में पाए जाते थे। शिवालिक से मिला जीवाश्म इस संभावना को जन्म देता है कि भारत में भी ऐसे डायनासोर की उपस्थिति रही हो या उनके किसी करीबी रिश्तेदार का विकास हुआ हो। डॉ. सैफ ने पुराजैविक विशेषज्ञों, भूवैज्ञानिकों और संबंधित संस्थानों से अनुरोध किया है कि वह इस खोज की वैज्ञानिक पुष्टि और विस्तृत अध्ययन के लिए शिवालिक क्षेत्र का दौरा करें। संवादक