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Saharanpur News: ...ये सांसें तेज चलती हैं किसी का दिल दुखाया क्या
Sun, 01 Oct 2023 12:51 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
Updated Sun, 01 Oct 2023 12:51 AM IST
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सहारनपुर के मेला गुग्घाल के तहत जनंमच में आयोजित स्थानीय कवि सम्मेलन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ बुद्ध
सहारनपुर। ‘जिसे चाहा नहीं तुमने कभी वह चैन पाया क्या, ये सांसें तेज चलती हैं किसी का दिल दुखाया क्या, जरूरत क्या तुम्हारे रूप को शृंगार करने की, किसी हिरणी ने अपनी आंख में काजल लगाया क्या’। डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने अपनी इन पंक्तियों से खूब वाहवाही लूटी।
मौका था मेला गुघाल के जनमंच प्रेक्षागृह में आयोजित स्थानीय कवि सम्मेलन का। स्थानीय कवि सम्मेलन की अध्यक्षता देहरादून से आए गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने की। सम्मेलन की शुरूआत विनोद भृंग द्वारा सरस्वती वंदना से की गई। नरेंद्र मस्ताना ने लोकगीत ‘गुडगुड हुक्का बोल्ले, दिनभर म्हारे जेठ का, चौकीदारी करता दिख्खे दिन भर गेट का’ सुनाई। सुशीला शर्मा ने पढ़ा ‘माझी धीरे खेना नाव, जग की टेढ़ी पगडंडी तज, जाना उनके गांव, माझी धीरे खेना नाव’। डॉ. वीरेंद्र आज़म ने ‘यार शहर अब तू भी सोच कुछ अपने बारे में, बचा सकता है तो बचा ले, मयूर का नृत्य और सियार की हूक, चिड़ियां की चीं-चीं और कोयल की कूक’ सुनाकर तालियां बटोरी। संदीप शर्मा ने अपनी कविता संडे सुनाई। डॉ. संदीप मिश्र ने पढ़ा कि ‘आंख के ये मोती कब धार हो गए, हंसना था चाहा पर यार हो गए।
सुधीर प्रवाज़ के इस शेर को भी दाद मिली ''एक मुद्दत हो गई साथ में रहते हुए, देखे नहीं तुमने मेरे बहते हुए।’ प्रतिभा त्रिपाठी ने ‘कोई रांझे की हीर हो जाऊं, मैं वफा की नजीर हो जाऊं’ सुनाकर वाहवाही लूटी। महेश पाल ने पढ़ा कि ‘देखो सुनो ये जो पागल खाने हैं, कुछ को छोड़ के इनमें सब दीवाने हैं। राजेश बघेल की पंक्तियां देखिए हिन्दुस्तानी होने का कुछ ऐसे फर्ज निभा लो, जितना शेष बचा है देश मिलकर इसे बचा लो’। इसके अलावा डॉ. विजेंद्र पाल शर्मा, मोनिका शर्मा व जया गुप्ता ने भी काव्यपाठ किया। संचालन संयोजक प्रशांत राजन ने किया। कार्यक्रम में महापौर डॉ. अजय कुमार, नगर विधायक राजीव गुंबर, भाजपा महानगर अध्यक्ष पुनीत त्यागी, रमा गुप्ता, मंसूर बदर, वर्षा चोपड़ा, यशपाल भाटिया, राजीव अग्रवाल आदि मौजूद रहे।
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मौका था मेला गुघाल के जनमंच प्रेक्षागृह में आयोजित स्थानीय कवि सम्मेलन का। स्थानीय कवि सम्मेलन की अध्यक्षता देहरादून से आए गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने की। सम्मेलन की शुरूआत विनोद भृंग द्वारा सरस्वती वंदना से की गई। नरेंद्र मस्ताना ने लोकगीत ‘गुडगुड हुक्का बोल्ले, दिनभर म्हारे जेठ का, चौकीदारी करता दिख्खे दिन भर गेट का’ सुनाई। सुशीला शर्मा ने पढ़ा ‘माझी धीरे खेना नाव, जग की टेढ़ी पगडंडी तज, जाना उनके गांव, माझी धीरे खेना नाव’। डॉ. वीरेंद्र आज़म ने ‘यार शहर अब तू भी सोच कुछ अपने बारे में, बचा सकता है तो बचा ले, मयूर का नृत्य और सियार की हूक, चिड़ियां की चीं-चीं और कोयल की कूक’ सुनाकर तालियां बटोरी। संदीप शर्मा ने अपनी कविता संडे सुनाई। डॉ. संदीप मिश्र ने पढ़ा कि ‘आंख के ये मोती कब धार हो गए, हंसना था चाहा पर यार हो गए।
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सुधीर प्रवाज़ के इस शेर को भी दाद मिली ''एक मुद्दत हो गई साथ में रहते हुए, देखे नहीं तुमने मेरे बहते हुए।’ प्रतिभा त्रिपाठी ने ‘कोई रांझे की हीर हो जाऊं, मैं वफा की नजीर हो जाऊं’ सुनाकर वाहवाही लूटी। महेश पाल ने पढ़ा कि ‘देखो सुनो ये जो पागल खाने हैं, कुछ को छोड़ के इनमें सब दीवाने हैं। राजेश बघेल की पंक्तियां देखिए हिन्दुस्तानी होने का कुछ ऐसे फर्ज निभा लो, जितना शेष बचा है देश मिलकर इसे बचा लो’। इसके अलावा डॉ. विजेंद्र पाल शर्मा, मोनिका शर्मा व जया गुप्ता ने भी काव्यपाठ किया। संचालन संयोजक प्रशांत राजन ने किया। कार्यक्रम में महापौर डॉ. अजय कुमार, नगर विधायक राजीव गुंबर, भाजपा महानगर अध्यक्ष पुनीत त्यागी, रमा गुप्ता, मंसूर बदर, वर्षा चोपड़ा, यशपाल भाटिया, राजीव अग्रवाल आदि मौजूद रहे।
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