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Saharanpur News: होती थी छड़ियों की दौड़, ढलते सूरज के साथ दिखता खूबसूरत नजारा
Sun, 15 Sep 2024 02:36 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
Updated Sun, 15 Sep 2024 02:36 AM IST
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सहारनपुर। तीन दशक पूर्व 26 छड़ियों की दौड़ लगती थी। शाम को ढलते सूरज के साथ यह आकर्षक नजारा देखने को गंगोह रोड पर सड़क के दोनों तरफ लाखों श्रद्धालु एकत्र होते थे, लेकिन दौड़ के दौरान श्रद्धालु चोटिल हो जाते थे। इसलिए 1994 में यह परंपरा बंद करनी पड़ी। विजेता छड़ी और निशानियों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाता था, लेकिन धीरे-धीरे इसका स्वरूप बदल गया।
गंगोह रोड स्थित श्री जाहरवीर गोगा महाराज की म्हाड़ी मेले का इतिहास 900 वर्ष पुराना है। देश में राजस्थान के बागड़ के बाद सहारनपुर में सबसे बड़ा तीन दिवसीय मेला भरता है। श्री शिव गोरख जाहरवीर सेवा समिति के संस्थापक पंकज उपाध्याय बताते हैं कि छड़ियों की दौड़ गंगोह रोड स्थित पूर्वी यमुनानहर से लेकर म्हाड़ी तक लगती थी। दौड़ को देखने के लिए जिले भर से लोग आते थे। छड़ियों के निशानिए (भक्त) छड़ी लेकर दौड़ते थे, जो छड़ी सबसे पहले म्हाड़ी पर पहुंचती थी, वह विजेता छड़ी होती थी। उस छड़ी के निशानियों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाता था, लेकिन दौड़ में श्रद्धालु और निशानिए चोटिल हो जाते थे। इसी को देखते हुए दौड़ का आयोजन बंद किया गया। आखिरी बार दौड़ 1994 में लगी थी।
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जब खुद खड़ी हो गई थी छड़ी, कर्फ्यू में भी नहीं रुका मेला
बाबा श्री जाहरवीर गोगा महाराज की प्रतीक चिह्न नेजा और 26 छड़ियां हैं। सभी छड़ियों के नाम अलग हैं। 21 सितंबर 2015 को पुरानी चुंगी स्थित अपने स्थान पर भगत पंकज उपाध्याय की बिंद्रा प्रेम छड़ी बिना किसी सहारे के चार से पांच घंटे खुद खड़ी रही थी। इसे चमत्कार मानते हुए बड़ी संख्या में श्रद्घालु पहुंच गए थे और छड़ी के दर्शन किए थे। वहीं, श्री गुग्घा म्हाड़ी सुधार सभा के प्रधान अनिल प्रताप सैनी बताते हैं कि कर्फ्यू में भी कभी मेला भरने से नहीं रुका है।
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गंगोह रोड स्थित श्री जाहरवीर गोगा महाराज की म्हाड़ी मेले का इतिहास 900 वर्ष पुराना है। देश में राजस्थान के बागड़ के बाद सहारनपुर में सबसे बड़ा तीन दिवसीय मेला भरता है। श्री शिव गोरख जाहरवीर सेवा समिति के संस्थापक पंकज उपाध्याय बताते हैं कि छड़ियों की दौड़ गंगोह रोड स्थित पूर्वी यमुनानहर से लेकर म्हाड़ी तक लगती थी। दौड़ को देखने के लिए जिले भर से लोग आते थे। छड़ियों के निशानिए (भक्त) छड़ी लेकर दौड़ते थे, जो छड़ी सबसे पहले म्हाड़ी पर पहुंचती थी, वह विजेता छड़ी होती थी। उस छड़ी के निशानियों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाता था, लेकिन दौड़ में श्रद्धालु और निशानिए चोटिल हो जाते थे। इसी को देखते हुए दौड़ का आयोजन बंद किया गया। आखिरी बार दौड़ 1994 में लगी थी।
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जब खुद खड़ी हो गई थी छड़ी, कर्फ्यू में भी नहीं रुका मेला
बाबा श्री जाहरवीर गोगा महाराज की प्रतीक चिह्न नेजा और 26 छड़ियां हैं। सभी छड़ियों के नाम अलग हैं। 21 सितंबर 2015 को पुरानी चुंगी स्थित अपने स्थान पर भगत पंकज उपाध्याय की बिंद्रा प्रेम छड़ी बिना किसी सहारे के चार से पांच घंटे खुद खड़ी रही थी। इसे चमत्कार मानते हुए बड़ी संख्या में श्रद्घालु पहुंच गए थे और छड़ी के दर्शन किए थे। वहीं, श्री गुग्घा म्हाड़ी सुधार सभा के प्रधान अनिल प्रताप सैनी बताते हैं कि कर्फ्यू में भी कभी मेला भरने से नहीं रुका है।
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