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Saharanpur News: मौरा के ठाकुर द्वारा से बनती थी आजादी के लिए आंदोलन की रणनीति

Tue, 12 Aug 2025 11:54 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Tue, 12 Aug 2025 11:54 PM IST
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The strategy of the movement for freedom was made by the Thakur of Maura
बाबू सूबा सिंह, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी। मां तुझे प्रणाम से संबं​धित फोटो
-मां तुझे प्रणाम......
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-देश की आजादी के लिए हुए आंदोलनों में सहारनपुर का रहा विशेष योगदान
संवाद न्यूज एजेंसी
बड़गांव। देश की आजादी के लिए हुए आंदोलनों का सहारनपुर मुख्य केंद्र रहा है। बड़गांव क्षेत्र के मौरा गांव स्थित ठाकुर द्वारा मंदिर ने भी आजादी की लड़ाई में आहुति दी। मौरा निवासी बाबू सूबा सिंह रेलवे की नौकरी छोड़कर आजादी के लिए आंदोलन में कूद पड़े थे। आजादी मिली तो उन्होंने ही सबसे पहले बड़गांव थाने पर तिरंगा फहराकर आजादी जश्न मनाया था।
बड़गांव क्षेत्र भी जंग-ए-आजादी का मुख्य गवाह रहा है। यहां पर मौरा गांव स्थित ठाकुरद्वारा मंदिर व गांधी आश्रम में आंदोलन का ब्लू प्रिंट तैयार किया जाता था। यहां के बाबू सूबा सिंह रेलवे की नौकरी छोड़कर आजादी के आंदोलन में आ गए। आलम यह था कि अंग्रेजी शासन को क्रांतिकारियों के दमन को बड़गांव में छावनी बनानी पड़ी थी। उसी छावनी के स्थान पर आज थाना बड़गांव है। हिंदुस्तान आजाद होने पर बाबू सूबा सिंह ने थाने पर सबसे पहली बार झंडा फहराया था।
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बाबू सूबा सिंह के पौत्र नरेंद्र सिंह ने बताया कि बड़गांव क्षेत्र के गांव मौरा का ठाकुरद्वारा मंदिर क्रांतिकारियों के लिए महत्वपूर्ण शरण स्थली का प्रमुख केंद्र था। यहां से ही आंदोलन को नई राह दी जाती थी। इसके लिए आंदोलन चलाने व दिशा-निर्देश देने को गांव के ठाकुर सूबा सिंह के पास क्रांतिकारी दिन रात जुटे रहते थे। यहां की गोपनीय व्यवस्था इतनी सुरक्षित थी कि महज तीन किमी दूरी पर बड़गांव थाने में तैनात अंग्रेज पुलिस को क्रांतिकारियों के जुटने की भनक तक नहीं हो पातीं थी।
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कौन थे बाबू सूबा सिंह----
मौरा गांव निवासी किसान ठाकुर खजान सिंह के बेटे बाबू सूबा सिंह वर्ष 1929 में भारतीय रेलवे में सहायक स्टेशन मास्टर नियुक्त हुए थे, लेकिन महात्मा गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया। 31 जुलाई 1930 को पहली बार जेल गए और एक साल सजा काटी। 19 दिसंबर वर्ष 1932 में फिर छह माह की कैद व पचास रुपये जुर्माना भरना पड़ा और 25 मई 1933 को वह रिहा हुए। फिर उन्हें सत्याग्रह आंदोलन में शामिल होने के जुर्म में 25 जनवरी 1941 को तीन माह का कठोर कारावास व 200 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसके तहत उन्हें फिर 15 फरवरी 1941 को मेरठ जेल भेज दिया गया। यही नहीं भारत छोड़ो आंदोलन के तहत वर्ष 1942 में उन्हें फिर जेल में नजरबंद रहना पड़ा। कुछ ही वर्षो में सूबा सिंह आंदोलनकारियों की अग्रणी पंक्ति में आ गए।

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इंदिरा गांधी ने दिया था ताम्रपत्र
1947 में आजादी मिलने पर बड़गांव थाने पर बाबू सूबा सिंह ने पहली बार झंडा फहराया। वर्ष 1972 में 25वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बाबू सूबा सिंह को मरणोपरांत स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था।

बाबू सूबा सिंह, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी। मां तुझे प्रणाम से संबंधित फोटो

बाबू सूबा सिंह, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी। मां तुझे प्रणाम से संबंधित फोटो

बाबू सूबा सिंह, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी। मां तुझे प्रणाम से संबंधित फोटो

बाबू सूबा सिंह, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी। मां तुझे प्रणाम से संबंधित फोटो

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