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Saharanpur News: शिव महापुराण में सुनाई काशी विश्वनाथ एवं बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंगों की कथा
Thu, 07 Aug 2025 11:28 PM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
Updated Thu, 07 Aug 2025 11:28 PM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
चिलकाना। गांव चौरीमंडी स्थित शिव मंदिर में चल रही शिव महापुराण में कथा वाचक महात्मा आत्मानंद गिरि महाराज ने भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में बैद्यनाथ एवं काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा सुनाई।
बुधवार को उन्होंने कहा कि देवी पार्वती ने भगवान शिव से कैलाश छोड़कर कहीं और बसने की इच्छा व्यक्त की। इसके लिए भगवान शिव ने काशी को चुना और विश्वनाथ के रूप में वहां स्थापित हो गए। काशी को मुक्ति का स्थान माना जाता है, जहां भगवान शिव और देवी पार्वती के मिलन से आत्मा को परम शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
एक बार रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हिमालय पर घोर तपस्या की। उसने एक-एक करके अपने नौ बार सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ाए। जब रावण दसवीं बार सिर काटने वाला था, तो भगवान शिव प्रकट हुए और उसे दर्शन दिए। रावण ने भगवान शिव से शिवलिंग को लंका ले जाने की अनुमति मांगी।
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शिवजी ने कहा कि यदि शिवलिंग को रास्ते में कहीं भी रखा गया, तो वह वहीं स्थापित हो जाएगा। रावण शिवलिंग को लेकर लंका जा रहा था, लेकिन रास्ते में उसे लघुशंका लगी। उसने शिवलिंग को बैजू नाम के चरवाहे को पकड़ा दिया। बैजू ने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया और वह वहीं स्थापित हो गया। इस ज्योतिर्लिंग को बैद्यनाथ कहा जाता है।
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चिलकाना। गांव चौरीमंडी स्थित शिव मंदिर में चल रही शिव महापुराण में कथा वाचक महात्मा आत्मानंद गिरि महाराज ने भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में बैद्यनाथ एवं काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा सुनाई।
बुधवार को उन्होंने कहा कि देवी पार्वती ने भगवान शिव से कैलाश छोड़कर कहीं और बसने की इच्छा व्यक्त की। इसके लिए भगवान शिव ने काशी को चुना और विश्वनाथ के रूप में वहां स्थापित हो गए। काशी को मुक्ति का स्थान माना जाता है, जहां भगवान शिव और देवी पार्वती के मिलन से आत्मा को परम शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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एक बार रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हिमालय पर घोर तपस्या की। उसने एक-एक करके अपने नौ बार सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ाए। जब रावण दसवीं बार सिर काटने वाला था, तो भगवान शिव प्रकट हुए और उसे दर्शन दिए। रावण ने भगवान शिव से शिवलिंग को लंका ले जाने की अनुमति मांगी।
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शिवजी ने कहा कि यदि शिवलिंग को रास्ते में कहीं भी रखा गया, तो वह वहीं स्थापित हो जाएगा। रावण शिवलिंग को लेकर लंका जा रहा था, लेकिन रास्ते में उसे लघुशंका लगी। उसने शिवलिंग को बैजू नाम के चरवाहे को पकड़ा दिया। बैजू ने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया और वह वहीं स्थापित हो गया। इस ज्योतिर्लिंग को बैद्यनाथ कहा जाता है।