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स्कूलों में लगी स्टेशनरी की दुकानें
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Wed, 05 Apr 2017 12:41 AM IST
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सहारनपुर में कांवेंट स्कूलों में नई क्लास शुरू होने के साथ ही अभिभावकों की पूरी जेब काटी जा रही है। जिन अभिभावकों के दो या उससे अधिक बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ रहे हैं, उनको कापी-किताबों से लेकर ड्रेस, जूता-मोजा आदि खरीदना बेहद भारी पड़ रहा है।
स्कूलों से लेकर दुकानों तक कॉपी-किताब और ड्रेस की दुकानों तक में अभिभावकों से मोटी रकम वसूली जा रही है। कुछ स्कूलों में काउंटर खोलकर कॉपी-किताब और ड्रेस बेची जा रही है। जबकि ज्यादातर स्कूल प्रबंधन ने बाहर दुकानें अधिकृत कर रखी है।
दिल्ली रोड, कोर्ट रोड, देहरादून रोड, चिलकाना रोड, बेहट रोड, मिशन कंपाउंड आदि के स्कूलों ने कुछ दुकानों को अधिकृत कर दिया है। जहां से स्कूल प्रबंधन को मोटा कमीशन मिलता है। बदले में इसका बोझ अभिभावकों पर पड़ रहा है।
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कॉपी किताबें बड़ी कंपनियों की बताकर उनकी मोटी कीमत वसूली जा रही है। दुकानों में छोटी कक्षाओं के बस्ते तैयार हैं, जिसे आठ हजार रुपये तक में बेचा जा रहा है।
दुकानदार कॉपी-किताबों में बेतहाशा कीमत वसूल रहे हैं। बड़ी कंपनियों के नाम पर 120 पेज की कॉपी पर एमआरपी 35 रुपये तक छपवाकर बेची जा रही है, जबकि यही लोकल बनी हुई कॉपी 12-15 रुपये में उपलब्ध है।
यही हाल किताबों का है। जिस किताब का मूल्य 50 रुपये से भी कम है, उस पर 120-150 रुपये तक एमआरपी छापकर बेचा जा रहा है। स्कूलों ने दुकानें अधिकृत कर दी है। रिजल्ट के साथ दुकान के नाम की लिस्ट अभिभावकों को थमा दी जाती है।
ऐसी दुकानों में स्कूल के नाम छपा हुए कवर कॉपी-किताबों पर चढ़ा कर दिए जाते है। ऐसे में अभिभावकों के सामने किसी और दुकान का विकल्प भी नहीं रहता।
टैक्स की हो रही चोरी ः किताब को छोड़कर पाठ्य सामग्री से जुड़ी हर वस्तु जैसे यूनिफार्म, जूता-मोजा टैैक्स के दायरे में है, लेकिन इसकी बिक्री कैश मेमो पर न करके बड़े पैमाने पर टैक्स की चोरी हो रही है।
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स्कूलों से लेकर दुकानों तक कॉपी-किताब और ड्रेस की दुकानों तक में अभिभावकों से मोटी रकम वसूली जा रही है। कुछ स्कूलों में काउंटर खोलकर कॉपी-किताब और ड्रेस बेची जा रही है। जबकि ज्यादातर स्कूल प्रबंधन ने बाहर दुकानें अधिकृत कर रखी है।
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दिल्ली रोड, कोर्ट रोड, देहरादून रोड, चिलकाना रोड, बेहट रोड, मिशन कंपाउंड आदि के स्कूलों ने कुछ दुकानों को अधिकृत कर दिया है। जहां से स्कूल प्रबंधन को मोटा कमीशन मिलता है। बदले में इसका बोझ अभिभावकों पर पड़ रहा है।
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कॉपी किताबें बड़ी कंपनियों की बताकर उनकी मोटी कीमत वसूली जा रही है। दुकानों में छोटी कक्षाओं के बस्ते तैयार हैं, जिसे आठ हजार रुपये तक में बेचा जा रहा है।
दुकानदार कॉपी-किताबों में बेतहाशा कीमत वसूल रहे हैं। बड़ी कंपनियों के नाम पर 120 पेज की कॉपी पर एमआरपी 35 रुपये तक छपवाकर बेची जा रही है, जबकि यही लोकल बनी हुई कॉपी 12-15 रुपये में उपलब्ध है।
यही हाल किताबों का है। जिस किताब का मूल्य 50 रुपये से भी कम है, उस पर 120-150 रुपये तक एमआरपी छापकर बेचा जा रहा है। स्कूलों ने दुकानें अधिकृत कर दी है। रिजल्ट के साथ दुकान के नाम की लिस्ट अभिभावकों को थमा दी जाती है।
ऐसी दुकानों में स्कूल के नाम छपा हुए कवर कॉपी-किताबों पर चढ़ा कर दिए जाते है। ऐसे में अभिभावकों के सामने किसी और दुकान का विकल्प भी नहीं रहता।
टैक्स की हो रही चोरी ः किताब को छोड़कर पाठ्य सामग्री से जुड़ी हर वस्तु जैसे यूनिफार्म, जूता-मोजा टैैक्स के दायरे में है, लेकिन इसकी बिक्री कैश मेमो पर न करके बड़े पैमाने पर टैक्स की चोरी हो रही है।