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जिले के कारोबार ने बढ़ाई विदेशों तक शान
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जिले के कारोबार ने बढ़ाई विदेशों तक शान
वुड कार्विंग का कलस्टर बना, बांस का फर्नीचर बनाने का प्रशिक्षण केंद्र की हुई स्थापना
सहारनपुर। अमर उजाला ने बीते 34 साल में सहारनपुर के कारोबार की सकारात्मक बदलती तस्वीरें देखीं। कभी यहां महज 20 औद्योगिक इकाइयां होती थी, जो आज बढ़कर 615 तक पहुंच गई हैं। वुड कार्विंग कारोबार ने देश दुनिया में नाम रोशन किया तो हौजरी कारोबार को भी चार चांद लगे। वुड कार्विंग का कलस्टर बन रहा है, तो बांस के फर्नीचर बनाने का प्रशिक्षण केंद्र (सीएफसी) बन चुका है।
वैसे तो सहारनपुर में आईटीसी (इंडियन टोबेको कंपनी) देश आजाद होने से पहले ही स्थापित है, जिसके बाद स्टार पेपर मिल की स्थापना हुई। मगर 1980 के बाद सहारनपुर के औद्योगिक विकास और इसके इतिहास का आकलन इसी से लगाया जा सकता है कि इंडियन इंडस्ट्री एसोसिएशन का गठन प्रदेश में सबसे पहले 1985 में मेरठ और लखनऊ में हुआ, जिसके बाद 1986 में सहारनपुर और कानपुर में इसका गठन हुआ। 1986 में यहां सिर्फ 20 औद्योगिक इकाइयां थीं और आईआईए चैप्टर सहारनपुर के प्रथम अध्यक्ष स्वतंत्रता सेनानी हेमंत कुमार चुने गए थे। देखते ही देखते कारोबारी दायरा बढ़ता गया। अब 615 औद्योगिक इकाइयां आईआईए में पंजीकृत हैं।
1500 करोड़ से ज्यादा का वुड कार्विंग कारोबार
सहारनपुर का वुड कार्विंग कारोबार दुनियाभर में मशहूर है और सालाना 1500 करोड़ से ज्यादा का टर्न ओवर है। यहां से आस्ट्रेलिया, जापान सहित विभिन्न देशों को वुड कार्विंग उत्पादों का निर्यात किया जाता है, जो करीब 1000 करोड़ रुपये सालाना है। वुड कार्विंग कारोबार की बेहतरी के लिए मंडी समिति रोड पर ईपीसीएच (हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद) का सेंटर स्थापित है तो पिलखनी औद्योगिक क्षेत्र में करीब 250 बीघा भूमि पर वुड कार्विंग कलस्टर बनना है, जिसमें कॉमन फैसिलिटी सेंटर भी बन रहा है। इसके अलावा बेहट क्षेत्र में वन विभाग की नर्सरी पर बांस फर्नीचर बनाने का प्रशिक्षण केंद्र स्थापित हो चुका है।
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औद्योगिक क्षेत्र में पाईं उपलब्धियां
- कमिश्नरी आने के साथ ही उपायुक्त उद्योग का दफ्तर खुला।
- हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद का ट्रेनिंग सेंटर बना।
- वुड कार्विंग कलस्टर की स्थापना हुई, जमीन की खरीद शुरू।
- बांस के फर्नीचर बनाने का प्रशिक्षण केंद्र एवं सीएफसी मिला।
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वुड कार्विंग का कलस्टर बना, बांस का फर्नीचर बनाने का प्रशिक्षण केंद्र की हुई स्थापना
सहारनपुर। अमर उजाला ने बीते 34 साल में सहारनपुर के कारोबार की सकारात्मक बदलती तस्वीरें देखीं। कभी यहां महज 20 औद्योगिक इकाइयां होती थी, जो आज बढ़कर 615 तक पहुंच गई हैं। वुड कार्विंग कारोबार ने देश दुनिया में नाम रोशन किया तो हौजरी कारोबार को भी चार चांद लगे। वुड कार्विंग का कलस्टर बन रहा है, तो बांस के फर्नीचर बनाने का प्रशिक्षण केंद्र (सीएफसी) बन चुका है।
वैसे तो सहारनपुर में आईटीसी (इंडियन टोबेको कंपनी) देश आजाद होने से पहले ही स्थापित है, जिसके बाद स्टार पेपर मिल की स्थापना हुई। मगर 1980 के बाद सहारनपुर के औद्योगिक विकास और इसके इतिहास का आकलन इसी से लगाया जा सकता है कि इंडियन इंडस्ट्री एसोसिएशन का गठन प्रदेश में सबसे पहले 1985 में मेरठ और लखनऊ में हुआ, जिसके बाद 1986 में सहारनपुर और कानपुर में इसका गठन हुआ। 1986 में यहां सिर्फ 20 औद्योगिक इकाइयां थीं और आईआईए चैप्टर सहारनपुर के प्रथम अध्यक्ष स्वतंत्रता सेनानी हेमंत कुमार चुने गए थे। देखते ही देखते कारोबारी दायरा बढ़ता गया। अब 615 औद्योगिक इकाइयां आईआईए में पंजीकृत हैं।
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1500 करोड़ से ज्यादा का वुड कार्विंग कारोबार
सहारनपुर का वुड कार्विंग कारोबार दुनियाभर में मशहूर है और सालाना 1500 करोड़ से ज्यादा का टर्न ओवर है। यहां से आस्ट्रेलिया, जापान सहित विभिन्न देशों को वुड कार्विंग उत्पादों का निर्यात किया जाता है, जो करीब 1000 करोड़ रुपये सालाना है। वुड कार्विंग कारोबार की बेहतरी के लिए मंडी समिति रोड पर ईपीसीएच (हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद) का सेंटर स्थापित है तो पिलखनी औद्योगिक क्षेत्र में करीब 250 बीघा भूमि पर वुड कार्विंग कलस्टर बनना है, जिसमें कॉमन फैसिलिटी सेंटर भी बन रहा है। इसके अलावा बेहट क्षेत्र में वन विभाग की नर्सरी पर बांस फर्नीचर बनाने का प्रशिक्षण केंद्र स्थापित हो चुका है।
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औद्योगिक क्षेत्र में पाईं उपलब्धियां
- कमिश्नरी आने के साथ ही उपायुक्त उद्योग का दफ्तर खुला।
- हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद का ट्रेनिंग सेंटर बना।
- वुड कार्विंग कलस्टर की स्थापना हुई, जमीन की खरीद शुरू।
- बांस के फर्नीचर बनाने का प्रशिक्षण केंद्र एवं सीएफसी मिला।