{"_id":"586d50974f1c1bb61e1586bf","slug":"rld-jayant-judgment-and-existence-test","type":"story","status":"publish","title_hn":"जयंत के फैसले और रालोद के वजूद का इम्तिहान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जयंत के फैसले और रालोद के वजूद का इम्तिहान
ब्यूरो/अमर उजाला, बागपत
Updated Thu, 05 Jan 2017 01:23 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विधानसभा चुनाव के ऐलान के बाद अपने गढ़ में इस बार रालोद के वजूद का इम्तिहान होगा। पिछले चुनाव में तीन में से दो सीट बसपा के खाते में चली जाने से रालोद को तगड़ा झटका लग चुका है। रालोद महासचिव जयंत चौधरी के फैसले भी इस बार कसौटी पर होंगे। गठबंधन से लेकर प्रत्याशियों तक की कमान इस बार जयंत चौधरी के हाथ में है।
राजनीति के पुराने पन्ने पलटे तो बागपत की सीटों पर रालोद की बादशाहत रही है। वर्ष 2002 और 2007 के चुनाव में तीनों सीटों पर रालोद का ही कब्जा था। वर्ष 2007 में बसपा सुप्रीमो मायावती मुख्यमंत्री थी। बसपा सरकार के बाद वर्ष 2012 में चुनाव हुए तो रालोद अपने गढ़ में ही बसपा से दो सीटों पर मात खा गई। छपरौली में रालोद के वीरपाल राठी जीते थे, जबकि बड़ौत में बसपा के लोकेश दीक्षित, बागपत में हेमलता चौधरी।
हालांकि जीत का अंतर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन बसपा के हाथ जिले में एक साथ दो सीट लगना भी धमाके से कम नहीं था। विधानसभा चुनाव में रालोद को मिले इस दर्द को मुजफ्फरनगर दंगे ने और अधिक बढ़ाने का काम किया।
विज्ञापन
समीकरण ऐसे टूटे की लोकसभा चुनाव में चौधरी अजित सिंह हार गए। विधानसभा चुनाव 2017 के चुनाव का ऐलान हो चुका है। असलियत में मुजफ्फरनगर दंगे के बाद यह पहले विधानसभा चुनाव होंगे। देखने वाली बात यह होगी कि रालोद ने कितनी वापसी की है।
साल 2012 में पूर्व मंत्री अनुराधा चौधरी रालोद छोड़कर सपा में चली गई थी, तब अधिकतर फैसले चौधरी अजित सिंह ने ही किए थे, लेकिन इस बार के चुनाव में जयंत चौधरी आगे बढ़कर फैसले कर रहे हैं और उन्हें पार्टी में तव्वज्जो भी मिली है। ऐसे में जयंत के फैसले और रालोद की साख दांव पर होगी।
विज्ञापन
राजनीति के पुराने पन्ने पलटे तो बागपत की सीटों पर रालोद की बादशाहत रही है। वर्ष 2002 और 2007 के चुनाव में तीनों सीटों पर रालोद का ही कब्जा था। वर्ष 2007 में बसपा सुप्रीमो मायावती मुख्यमंत्री थी। बसपा सरकार के बाद वर्ष 2012 में चुनाव हुए तो रालोद अपने गढ़ में ही बसपा से दो सीटों पर मात खा गई। छपरौली में रालोद के वीरपाल राठी जीते थे, जबकि बड़ौत में बसपा के लोकेश दीक्षित, बागपत में हेमलता चौधरी।
विज्ञापन
हालांकि जीत का अंतर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन बसपा के हाथ जिले में एक साथ दो सीट लगना भी धमाके से कम नहीं था। विधानसभा चुनाव में रालोद को मिले इस दर्द को मुजफ्फरनगर दंगे ने और अधिक बढ़ाने का काम किया।
विज्ञापन
समीकरण ऐसे टूटे की लोकसभा चुनाव में चौधरी अजित सिंह हार गए। विधानसभा चुनाव 2017 के चुनाव का ऐलान हो चुका है। असलियत में मुजफ्फरनगर दंगे के बाद यह पहले विधानसभा चुनाव होंगे। देखने वाली बात यह होगी कि रालोद ने कितनी वापसी की है।
साल 2012 में पूर्व मंत्री अनुराधा चौधरी रालोद छोड़कर सपा में चली गई थी, तब अधिकतर फैसले चौधरी अजित सिंह ने ही किए थे, लेकिन इस बार के चुनाव में जयंत चौधरी आगे बढ़कर फैसले कर रहे हैं और उन्हें पार्टी में तव्वज्जो भी मिली है। ऐसे में जयंत के फैसले और रालोद की साख दांव पर होगी।