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पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही पॉलिथीन
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दिल्ली रोड पर कचरे में पड़ी पॉलिथीन
- फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। हर तरह की पॉलिथीन पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है। मगर फिलहाल 50 माइक्रॉन से नीचे की पॉलिथीन बैन है। 50 माइक्रोन से अधिक की पॉलिथीन बैन नहीं करने की वजह यह है कि उसको रीसाइकिल किया जा सकता है। मगर स्थानीय स्तर पर पॉलिथीन को कचरे से अलग नहीं करने और रीसाइकिल की व्यवस्था नहीं होने के कारण पॉलिथीन कचरे के साथ मिलकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है।
स्मार्ट सिटी सहारनपुर से प्रतिदिन करीब 125 मीट्रिक टन कचरा निकलता है। पर्यावरण पर पॉलिथीन के दुष्प्रभावों को रोकने के लिए नगर निगम लोगों से पॉलिथीन को कचरे से अलग कर निगम की कूड़ा उठाने वाली गाड़ियों को सौंपने की अपील करता रहा है। पॉलिथीन के खिलाफ अभियान भी लगातार चलाया जा रहा है। मगर इसके बावजूद पॉलिथीन को लेकर आम नागरिक और नगर निगम गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं। नतीजा यह है कि पॉलिथीन कचरे के साथ जमीन पर फैलकर या दबकर पर्यावरण को हर तरह से नुकसान पहुंचा रही है।
ऐसे पहचानें पॉलिथीन को
मार्केट में जितनी भी थैली लूज मिलती है, वह सारी ही एनजीटी की बैन की सीमा में आती हैं। अगर थैली उंगली के जोर लगाने पर आराम से फट जाए तो समझ जाना चाहिए कि यह 50 माइक्रोन से कम की है। बैन की सीमा के बाहर सिर्फ वही पॉलिथीन हैं, जिनका इस्तेमाल बड़ी कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स को पैक करने के लिए करती हैं। मिसाल के तौर पर दूध, घी और सरसों का तेल की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली थैलियां। इनको आप आसानी से फाड़ नहीं सकते, इन्हें काट कर ही इस्तेमाल किया जा सकता है। इस पॉलिथीन को रीसाइकिल कर नया आइटम बनाया जा सकता है, मगर 50 माइक्रोन से नीचे की पॉलिथीन को रीसाइकिल नहीं हो सकता।
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उपभोक्ता पर भी हो सकती है कार्रवाई
अगर कोई घर से ऐसी पॉलिथीन लेकर मार्केट जा रहे हैं, जो प्रतिबंधित है, तो आप पर भी कार्रवाई की जा सकती है। क्योंकि पॉलिथीन बनाने से लेकर इस्तेमाल करना तक बैन है। फिर उन्हें कोई दुकानदार इस्तेमाल कर रहा हो या ग्राहक। घर के डस्टबिन में डाली जाने वाली ब्लैक थैलियां भी एनजीटी के बैन के दायरे में आती हैं। जिस थैली में दूध पैक होता है या फिर सरसों तेल या फिर घी आदि की पैकिंग होता है वह 50 माइक्रोन से ज्यादा की है और इसी कारण वह बैन नहीं है।
विशेषज्ञ की टिप्पणी
सभी तरह की पॉलिथीन पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है। 50 माइक्रोन से नीचे की पॉलिथीन जमीन में दबने के बाद उससे जो पानी रिसकर जमीन में जाता है वह दूषित होता है। इस पानी के सेवन से दिव्यांगता आती है। इसके अलावा 50 माइक्रोन से अधिक की पॉलिथीन यदि जमीन में दब जाए तो वह वाटर रिचार्ज नहीं होने देती।
डॉक्टर पीके शर्मा, पर्यावरणविद्।
पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगाने के लिए नगर निगम की टीम लगातार छापेमारी अभियान चला रही है। जिसका असर भी बाजारों में नजर आ रहा है। रही बात पॉलिथीन को कचरे से अलग करने की तो इसके लिए कार्ययोजना तैयार की जा चुकी है। आम लोगों से भी पॉलिथीन का इस्तेमाल बंद करने तथा गैरप्रतिबंधित पॉलिथीन को कचरे से अलग रखने को कहा गया है।
ज्ञानेंद्र सिंह, नगरायुक्त।
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स्मार्ट सिटी सहारनपुर से प्रतिदिन करीब 125 मीट्रिक टन कचरा निकलता है। पर्यावरण पर पॉलिथीन के दुष्प्रभावों को रोकने के लिए नगर निगम लोगों से पॉलिथीन को कचरे से अलग कर निगम की कूड़ा उठाने वाली गाड़ियों को सौंपने की अपील करता रहा है। पॉलिथीन के खिलाफ अभियान भी लगातार चलाया जा रहा है। मगर इसके बावजूद पॉलिथीन को लेकर आम नागरिक और नगर निगम गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं। नतीजा यह है कि पॉलिथीन कचरे के साथ जमीन पर फैलकर या दबकर पर्यावरण को हर तरह से नुकसान पहुंचा रही है।
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ऐसे पहचानें पॉलिथीन को
मार्केट में जितनी भी थैली लूज मिलती है, वह सारी ही एनजीटी की बैन की सीमा में आती हैं। अगर थैली उंगली के जोर लगाने पर आराम से फट जाए तो समझ जाना चाहिए कि यह 50 माइक्रोन से कम की है। बैन की सीमा के बाहर सिर्फ वही पॉलिथीन हैं, जिनका इस्तेमाल बड़ी कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स को पैक करने के लिए करती हैं। मिसाल के तौर पर दूध, घी और सरसों का तेल की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली थैलियां। इनको आप आसानी से फाड़ नहीं सकते, इन्हें काट कर ही इस्तेमाल किया जा सकता है। इस पॉलिथीन को रीसाइकिल कर नया आइटम बनाया जा सकता है, मगर 50 माइक्रोन से नीचे की पॉलिथीन को रीसाइकिल नहीं हो सकता।
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उपभोक्ता पर भी हो सकती है कार्रवाई
अगर कोई घर से ऐसी पॉलिथीन लेकर मार्केट जा रहे हैं, जो प्रतिबंधित है, तो आप पर भी कार्रवाई की जा सकती है। क्योंकि पॉलिथीन बनाने से लेकर इस्तेमाल करना तक बैन है। फिर उन्हें कोई दुकानदार इस्तेमाल कर रहा हो या ग्राहक। घर के डस्टबिन में डाली जाने वाली ब्लैक थैलियां भी एनजीटी के बैन के दायरे में आती हैं। जिस थैली में दूध पैक होता है या फिर सरसों तेल या फिर घी आदि की पैकिंग होता है वह 50 माइक्रोन से ज्यादा की है और इसी कारण वह बैन नहीं है।
विशेषज्ञ की टिप्पणी
सभी तरह की पॉलिथीन पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है। 50 माइक्रोन से नीचे की पॉलिथीन जमीन में दबने के बाद उससे जो पानी रिसकर जमीन में जाता है वह दूषित होता है। इस पानी के सेवन से दिव्यांगता आती है। इसके अलावा 50 माइक्रोन से अधिक की पॉलिथीन यदि जमीन में दब जाए तो वह वाटर रिचार्ज नहीं होने देती।
डॉक्टर पीके शर्मा, पर्यावरणविद्।
पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगाने के लिए नगर निगम की टीम लगातार छापेमारी अभियान चला रही है। जिसका असर भी बाजारों में नजर आ रहा है। रही बात पॉलिथीन को कचरे से अलग करने की तो इसके लिए कार्ययोजना तैयार की जा चुकी है। आम लोगों से भी पॉलिथीन का इस्तेमाल बंद करने तथा गैरप्रतिबंधित पॉलिथीन को कचरे से अलग रखने को कहा गया है।
ज्ञानेंद्र सिंह, नगरायुक्त।