{"_id":"59779e084f1c1bac038b46cd","slug":"kargil-martyr-s-parents-living-in-muflisi","type":"story","status":"publish","title_hn":"मुफलिसी में जी रहे कारगिल शहीद के माता-पिता ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मुफलिसी में जी रहे कारगिल शहीद के माता-पिता
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Wed, 26 Jul 2017 01:13 AM IST
विज्ञापन
शहीद राजेश के माता-पिता
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कारगिल की लड़ाई में दुश्मनों के दांत खट्टे करते हुए खुशी-खुशी अपने प्राण न्यौछावर करने वाले शहीद राजेश वैरागी का नाम इतिहास में दर्ज हो गया। मगर, सरकारी लापरवाही के चलते उनके परिजनों को कहीं का नहीं छोड़ा।
शहादत के वक्त किए गए सभी वायदे धूल में मिल चुके हैं। माता पिता के बुढ़ापे की लाठी राजेश तो शहीद हो गए और उनके मां-बाप मुफलिसी में जीवन जी रहे हैं। 18 साल पहले गंगोह के बस अड्डा चौक पर लगने वाली शहीद की प्रतिमा को प्रशासन वादा कर भूल गया। एक सड़क का नाम जरूर शहीद को समर्पित किया गया था, मगर समय बीतने के साथ ही उस पर शिलापट का कोई नामो-निशान तक नहीं है।
गंगोह से करीब नौ किलोमीटर दूर गांव जेहरा निवासी लांस नायक राजेश वैरागी 1999 में पाकिस्तान से हुई कारगिल की लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। लांस नायक शहीद राजेश वैरागी के अंतिम संस्कार के मौके पर जिला प्रशासन ने गंगोह के सहारनपुर बस अड्डा चौक पर शहीद की प्रतिमा लगाने की घोषणा की थी।
विज्ञापन
यह घोषणा पूरी करना तो छोड़िए शहीद के नाम पर गंगोह-वजीरपुर मार्ग का नामकरण कर शिलापट लगाया गया था। जो थोड़े समय बाद गायब हो गया। शहीद की मां कांति देवी के चेहरे पर झुर्रियां पड़ गई हैं। अपने बेटे की शहादत को याद कर वे गौरवान्वित भी होती हैं।
करीब 75 वर्ष की कांति देवी सरकार को कोसती हैं और कहती हैं कि बेटे की शहादत देश के लिए हुई और अफसरों ने उस वक्त बड़ी-बड़ी बातें की थी। मगर दुख इस बात का है कि इन अफसरों ने बेटे की शहादत का मोल तक नहीं समझा। सरकार भी चली गई और दूसरी आई, मगर किसी ने शहीद के सम्मान के बारे में नहीं सोचा। अब इन सरकारों पर यकीन नहीं है, बस भरोसा भगवान का है कि वे ही न्याय करेंगे।
समय से नहीं आती पेंशन
शहीद राजेश वैरागी की पत्नी तो मजबूरी में हरियाणा चली गई थी और गांव में उसके पिता ताराचंद, मां कांति देवी और एक भाई राकेश वैरागी रहते हैं। इनके पास महज 10 बीघा जमीन है और यही उनकी आजीविका का साधन है।
मां-बाप को सरकार की ओर से ढाई-ढाई हजार रुपये पेंशन मिलती है, मगर वह भी समय से नहीं आती। पिता ताराचंद कहते हैं कि बेटे की शहादत पर गर्व है, मगर सरकार और अफसरों ने जो किया उसे कभी माफ नहीं करूंगा। यह शहीद के परिजनों का सम्मान छोड़िए उनकी सुध तक नहीं लेते।
यह मुद्दा वाकई बेहद गंभीर है और शहीद का सम्मान हमारे के लिए गौरव है। शहीद के परिजनों से किए गए हर वायदे को पूरा कराया जाएगा। इसके लिए मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को अवगत कराया जाएगा।
राघव लखनपाल शर्मा, सांसद
विज्ञापन
शहादत के वक्त किए गए सभी वायदे धूल में मिल चुके हैं। माता पिता के बुढ़ापे की लाठी राजेश तो शहीद हो गए और उनके मां-बाप मुफलिसी में जीवन जी रहे हैं। 18 साल पहले गंगोह के बस अड्डा चौक पर लगने वाली शहीद की प्रतिमा को प्रशासन वादा कर भूल गया। एक सड़क का नाम जरूर शहीद को समर्पित किया गया था, मगर समय बीतने के साथ ही उस पर शिलापट का कोई नामो-निशान तक नहीं है।
विज्ञापन
गंगोह से करीब नौ किलोमीटर दूर गांव जेहरा निवासी लांस नायक राजेश वैरागी 1999 में पाकिस्तान से हुई कारगिल की लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। लांस नायक शहीद राजेश वैरागी के अंतिम संस्कार के मौके पर जिला प्रशासन ने गंगोह के सहारनपुर बस अड्डा चौक पर शहीद की प्रतिमा लगाने की घोषणा की थी।
विज्ञापन
यह घोषणा पूरी करना तो छोड़िए शहीद के नाम पर गंगोह-वजीरपुर मार्ग का नामकरण कर शिलापट लगाया गया था। जो थोड़े समय बाद गायब हो गया। शहीद की मां कांति देवी के चेहरे पर झुर्रियां पड़ गई हैं। अपने बेटे की शहादत को याद कर वे गौरवान्वित भी होती हैं।
करीब 75 वर्ष की कांति देवी सरकार को कोसती हैं और कहती हैं कि बेटे की शहादत देश के लिए हुई और अफसरों ने उस वक्त बड़ी-बड़ी बातें की थी। मगर दुख इस बात का है कि इन अफसरों ने बेटे की शहादत का मोल तक नहीं समझा। सरकार भी चली गई और दूसरी आई, मगर किसी ने शहीद के सम्मान के बारे में नहीं सोचा। अब इन सरकारों पर यकीन नहीं है, बस भरोसा भगवान का है कि वे ही न्याय करेंगे।
समय से नहीं आती पेंशन
शहीद राजेश वैरागी की पत्नी तो मजबूरी में हरियाणा चली गई थी और गांव में उसके पिता ताराचंद, मां कांति देवी और एक भाई राकेश वैरागी रहते हैं। इनके पास महज 10 बीघा जमीन है और यही उनकी आजीविका का साधन है।
मां-बाप को सरकार की ओर से ढाई-ढाई हजार रुपये पेंशन मिलती है, मगर वह भी समय से नहीं आती। पिता ताराचंद कहते हैं कि बेटे की शहादत पर गर्व है, मगर सरकार और अफसरों ने जो किया उसे कभी माफ नहीं करूंगा। यह शहीद के परिजनों का सम्मान छोड़िए उनकी सुध तक नहीं लेते।
यह मुद्दा वाकई बेहद गंभीर है और शहीद का सम्मान हमारे के लिए गौरव है। शहीद के परिजनों से किए गए हर वायदे को पूरा कराया जाएगा। इसके लिए मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को अवगत कराया जाएगा।
राघव लखनपाल शर्मा, सांसद