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काश ! पहले ही हो जाता कर्जा माफ, तो अपने होते साथ

Thu, 06 Apr 2017 12:56 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर Updated Thu, 06 Apr 2017 12:56 AM IST
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Hopefully ! Already the loan will be forgiven, then with your own
कर्जा में आत्महत्या करने वाले किसान के परिजन। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
सहारनपुर में किसानों ने कर्जा माफ किए जाने की घोषणा का स्वागत किया है। इसके साथ ही दो वर्ष पूर्व ओलावृष्टि के चलते बर्बाद हुई फसल के सदमे से मरने वाले किसानों के परिजनों की आंखों में अपनों को खोने का दुख भी छलक आया है।
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उनका कहना है कि यदि पूर्व सरकार भी उनका कर्ज माफ कर देती तो शायद उनके अपने आज उनके बीच होते। मार्च 2015 में हुई बेमौसम बरसात और भारी ओलावृष्टि ने क्षेत्र के किसानों की खेतों में खड़ी गेहूं की फसलों को बर्बाद कर दिया था।
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इस दोहरी मार ने कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की कमर तोड़ दी थी। गांव रंगैल निवासी किसान मेहरसिंह के परिजनों पत्नी तिरक्षा, पुत्र प्रदीप और बेटी प्रिया ने बताया कि खेत में अपने खून-पसीने से सींची फसल को बर्बाद हुई देख मेहरदीन ने खेत में ही दम तोड़ दिया था। हालांकि उन पर किसी बैंक का कर्ज नहीं था। 
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इनके अलावा क्षेत्र के गांव फतेहचंदपुर निवासी 45 वर्षीय विक्रमसिंह पुत्र सीताराम, गांव बालू निवासी 55 वर्षीय मुनशाद पुत्र काला सहित कई और किसानों की सदमे से मौत हो गई थी।

जबकि गांव रंधेड़ी निवासी 58 वर्षीय किसान महेंद्र पुत्र गोपी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अधिकतर किसानों ने योगी सरकार के कर्ज माफी के फैसले की सराहना करते हुए कहा कि इससे छोटे और जरूरतमंद किसानों को बेहद राहत मिलेगी। 

बड़गांव क्षेत्र के गांव रामनगर निवासी सरजीत की पिछले साल ओलावृष्टि से गेहूं की फसल बरबाद होने पर खेत का नजारा देख मौके पर ही हृदय गति रुकने से मौत हो गई थी।

सरजीत पर यूनियन बैंक का साढे़ तीन लाख रुपये का कर्ज था जो अभी तक नहीं उतर सका है। उसके इकलौते बेटे विक्रम ने बताया कि सरकार ने कर्ज माफी की घोषणा की है, लेकिन अभी उसे यह नहीं पता कि उसका कर्ज माफ होगा या नहीं।

यदि उनका एक लाख रुपये का कर्ज माफ होता है तो कुछ तो बोझ सिर से उतरेगा। परंतु वह मायूस हो कर कर्ज की सारी रकम माफ किए जाने की मांग भी करता है। 

मृतक किसान मेहरदीन के परिजनों ने बताया कि उनके दादा की मौत के एक साल बाद भी जमीन में पिता का नाम दर्ज नहीं हो पाया था। इसके चलते न तो उन्हें किसी बैंक से कर्ज मिल पाया था और ना ही पिता की मौत का मुआवजा।

किसान देवीचंद के पुत्रों के अनुसार उनके पिता की मौत के दो साल बाद भी जमीन उनके नाम दर्ज नहीं हो पाई है। इसलिए जरूरत होने के बावजूद उन्हें कर्ज नहीं मिल पाता और वह साहूकारों से कर्ज लेकर जरूरत पूरी करते हैं। 

ग्राम भलस्वाईसापुर निवासी जयपाल पुत्र मुंशी की अप्रैल 2015 में ओलावृष्टि से गेहूं की फसल बरबाद होने पर खेत का नजारा देख मौके पर ही दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी। उस पर बैंक और सोसायटी का करीब साढ़े तीन लाख रुपये का कर्ज था।

बुधवार को उसकी पत्नि कुसुम देवी ने बताया कि पिछली सरकार में वह अधिकारियों के चक्कर काट कर थक गई थी, लेकिन कोई राहत नहीं मिल सकी थी।

अब योगी सरकार से उम्मीद जगी है कि उसके कर्ज में कम से कम एक लाख रुपये की रकम तो कम होगी। उसे उम्मीद है कि आगे भी सरकार उन जैसे गरीब किसानों की सुध लेगी।

गंगोह के मोहल्ला इलाहीबख्श निवासी कर्ज के बोझ तले दबे 80 वर्षीय किसान देवीचंद आर्य की 14 अप्रैल 2015 को सदमे से मौत हो गई थी। उनकी पत्नी कांति, पुत्र राकेश, नरेश और मुकेश का कहना है कि उन पर बैंक का तीन लाख रुपये का कर्ज है।

कर्ज ना चुका पाने और ऊपर से फसल बर्बाद होने के चलते देवीचंद की सदमे मौत हो गई थी। यदि पूर्व सरकार किसानों का कर्ज माफ कर देती तो शायद देवीचंद आज जिंदा होते। 

नागल के बसेड़ा गांव निवासी 46 वर्षीय भूल्लन पुत्र सोमदत्त त्यागी ने पिछले वर्ष फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उस पर क्रेडिट कार्ड व सोसाइटी के करीब छह लाख रुपये का कर्ज था।


भुल्लन के दो बेटी और दो बेटे हैं। इनमें सबसे बड़ी बेटी की उम्र 17 साल ही है। उसकी पत्नि अमिता ने बताया कि पति की मौत पर सांसद राघव लखनपाल आये थे।

वह कर्जमाफी कराने व नौकरी दिलाने का वायदा कर गए थे लेकिन अभी तक उनके परिवार के लिये कुछ भी नहीं हो सका। हालांकि अब योगी सरकार द्वारा एक लाख रुपये कर्ज माफी की बात आयी है जो अच्छा कदम है। 
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