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खत्म होने लगी देवबंदी बेर की मिठास
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Sun, 05 Mar 2017 11:59 PM IST
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बिक्री के लिए तैयार देवबंदी बेर।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सहारनपुर के देवबंद में विश्व में अपनी खास पहचान रखने वाले देवबंदी बेर की मिठास खत्म होने लगी है। कृषि विभाग की अनदेखी और भूमाफिया के लालच से बेरों की फसल अब नाम मात्र ही बची है।
आलम यह है कि जहां कभी बेरियां ही बेरियां दिखाई देती थी, अब वहां सिर्फ मकान ही मकान है।देवबंद के बेर लड्डू हो गए और बाबू बेर या मिठाइयां। कुछ इस तरह की आवाजें लगाकर फल व्यापारी दुकानों पर बेर की बिक्री करते थे।
देवबंद में कभी बड़ी संख्या में बेरियां हुआ करती थीं। यहां बेर पूरे विश्व में भेजा जाता था। खासतौर से पेबंदी नस्ल का बेर सबसे अधिक पसंद किया जाता है और इसकी पैदावार भी देवबंद क्षेत्र में ही होती है।
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लेकिन धीरे धीरे यह फसल खत्म हो गई। इसका मुख्य कारण शासन और कृषि विभाग की अनदेखी और उसका लाभ उठाकर कालोनियों का निर्माण करने वाले भूमाफिया हैं।
देवबंदी बेर की खुशबू और मिठास का ही कमाल है कि पूरे विश्व में इस बेर को मंगाया जाता है। बुजुर्ग हाफिज उस्मान बताते हैं कि कभी लोग चीनी की बजाए बेरों को ही दूध और चावलों में डालकर खीर बनाया करते थे।
इस मिठास केकारण ही देश विदेशों में बेर देवबंद के नाम से बेचा जाता था। उनका कहना है कि यदि शासन प्रशासन ने अभी भी इस फसल की ओर ध्यान नहीं दिया तो यह फसल समाप्त हो जाएगी और आने वाली पीढ़ी बुजुर्गों से कहानियों में ही बेर के किस्से सुना करेगी।
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आलम यह है कि जहां कभी बेरियां ही बेरियां दिखाई देती थी, अब वहां सिर्फ मकान ही मकान है।देवबंद के बेर लड्डू हो गए और बाबू बेर या मिठाइयां। कुछ इस तरह की आवाजें लगाकर फल व्यापारी दुकानों पर बेर की बिक्री करते थे।
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देवबंद में कभी बड़ी संख्या में बेरियां हुआ करती थीं। यहां बेर पूरे विश्व में भेजा जाता था। खासतौर से पेबंदी नस्ल का बेर सबसे अधिक पसंद किया जाता है और इसकी पैदावार भी देवबंद क्षेत्र में ही होती है।
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लेकिन धीरे धीरे यह फसल खत्म हो गई। इसका मुख्य कारण शासन और कृषि विभाग की अनदेखी और उसका लाभ उठाकर कालोनियों का निर्माण करने वाले भूमाफिया हैं।
देवबंदी बेर की खुशबू और मिठास का ही कमाल है कि पूरे विश्व में इस बेर को मंगाया जाता है। बुजुर्ग हाफिज उस्मान बताते हैं कि कभी लोग चीनी की बजाए बेरों को ही दूध और चावलों में डालकर खीर बनाया करते थे।
इस मिठास केकारण ही देश विदेशों में बेर देवबंद के नाम से बेचा जाता था। उनका कहना है कि यदि शासन प्रशासन ने अभी भी इस फसल की ओर ध्यान नहीं दिया तो यह फसल समाप्त हो जाएगी और आने वाली पीढ़ी बुजुर्गों से कहानियों में ही बेर के किस्से सुना करेगी।