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Saharanpur News: ठंड ने बढ़ाई मशरूम में गलन की समस्या
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मशरूम की खेती का निरीक्षण करते कृषि विज्ञानिक
- जनपद में होता है करीब 300 मीट्रिक टन मशरूम का उत्पादन
फोटो समाचार
संवाद न्यूज एजेंसी
सहारनपुर। तापमान में गिरावट का असर मशरूम की खेती पर पड़ रहा है। ठंड के चलते जनपद में कई उत्पादकों के यहां बटन मशरूम में गलन की समस्या बढ़ गई है। गलन की समस्या होने से न सिर्फ मशरूम की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है बल्कि इसका असर इसके भाव पर भी पड़ रहा है। जिले में करीब 200 मशरूम की उत्पादन इकाइयां हैं।
बढ़ रही ठंड का असर मशरूम की खेती पर दिखाई देने लगा है। इसके चलते जनपद में कई मशरूम उत्पादन इकाइयों में गलन की समस्या दिखाई दे रही है। इसने मशरूम उत्पादकों के सामने परेशानी खड़ी कर दी है। उत्पादक इस समस्या को लेकर कृषि विज्ञान केंद्र में आ रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ. आईके कुशवाहा ने बताया कि ग्राम फतेहपुर कलां की किरन, हरेटी के रजत यादव, मुजफ्फराबाद के ब्रह्मपाल सैनी एवं रजत सैनी आदि उत्पादकों के यहां मशरूम में गलन की समस्या देखी गई है। उनके यहां गलन के चलते मशरूम का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। मशरूम के उत्पादन के लिए आदर्श तापमान 15 से 18 डिग्री सेल्सियस है। लेकिन पिछले दिनों जनपद में तापमान गिरकर तीन डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। कम तापमान में मशरूम में फफूंदी और जीवाणुओं के प्रकोप से गलन शुरू हो गई है।
उन्होंने बताया कि गलन की समस्या से बचाव के लिए दिन में धूप के समय उत्पादन इकाई को खोलना और रात के समय इसे बंद कर देना चाहिए। तापमान बढ़ाने के लिए इकाई के अंदर धुआं रहित अंगीठी, बल्ब का प्रयोग करना फायदेमंद है। गल रही मशरूम को निकालकर और नई केसिन मिट्टी डालकर उसे समतल कर देना चाहिए। इसके बाद पांच ग्राम ब्लीचिंग पाउडर को 10 लीटर पानी में घोलकर दो से तीन बार छिड़काव करना मुफीद रहेगा। अगर केसिन पर कवक जाल दिखाई दे रहा हो तो मशरूम के पुराने अवशेष को नीचे से हटाकर नई केसिन मिट्टी डाल दें। साथ ही कार्बेंडाजिम 25 प्रतिशत और मैंकोजेब 25 प्रतिशत की दो ग्राम मात्रा प्रति लीटर ताजे पानी में घोलकर छिड़काव कर दें।
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जनपद में 300 मीट्रिक टन से अधिक होता है उत्पादन
जनपद में पूरे वर्ष मशरूम का उत्पादन होता है। अक्तूबर से मार्च तक सफेद बटन मशरूम की खेती होती है। फरवरी से अप्रैल तक ढिंगरी मशरूम का उत्पादन लिया जाता है। मिल्की मशरूम की खेती का समय अगस्त से अक्तूबर माह तक है। जनपद में करीब 300 मीट्रिक टन से अधिक उत्पादन हो जाता है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
सहारनपुर। तापमान में गिरावट का असर मशरूम की खेती पर पड़ रहा है। ठंड के चलते जनपद में कई उत्पादकों के यहां बटन मशरूम में गलन की समस्या बढ़ गई है। गलन की समस्या होने से न सिर्फ मशरूम की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है बल्कि इसका असर इसके भाव पर भी पड़ रहा है। जिले में करीब 200 मशरूम की उत्पादन इकाइयां हैं।
बढ़ रही ठंड का असर मशरूम की खेती पर दिखाई देने लगा है। इसके चलते जनपद में कई मशरूम उत्पादन इकाइयों में गलन की समस्या दिखाई दे रही है। इसने मशरूम उत्पादकों के सामने परेशानी खड़ी कर दी है। उत्पादक इस समस्या को लेकर कृषि विज्ञान केंद्र में आ रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ. आईके कुशवाहा ने बताया कि ग्राम फतेहपुर कलां की किरन, हरेटी के रजत यादव, मुजफ्फराबाद के ब्रह्मपाल सैनी एवं रजत सैनी आदि उत्पादकों के यहां मशरूम में गलन की समस्या देखी गई है। उनके यहां गलन के चलते मशरूम का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। मशरूम के उत्पादन के लिए आदर्श तापमान 15 से 18 डिग्री सेल्सियस है। लेकिन पिछले दिनों जनपद में तापमान गिरकर तीन डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। कम तापमान में मशरूम में फफूंदी और जीवाणुओं के प्रकोप से गलन शुरू हो गई है।
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उन्होंने बताया कि गलन की समस्या से बचाव के लिए दिन में धूप के समय उत्पादन इकाई को खोलना और रात के समय इसे बंद कर देना चाहिए। तापमान बढ़ाने के लिए इकाई के अंदर धुआं रहित अंगीठी, बल्ब का प्रयोग करना फायदेमंद है। गल रही मशरूम को निकालकर और नई केसिन मिट्टी डालकर उसे समतल कर देना चाहिए। इसके बाद पांच ग्राम ब्लीचिंग पाउडर को 10 लीटर पानी में घोलकर दो से तीन बार छिड़काव करना मुफीद रहेगा। अगर केसिन पर कवक जाल दिखाई दे रहा हो तो मशरूम के पुराने अवशेष को नीचे से हटाकर नई केसिन मिट्टी डाल दें। साथ ही कार्बेंडाजिम 25 प्रतिशत और मैंकोजेब 25 प्रतिशत की दो ग्राम मात्रा प्रति लीटर ताजे पानी में घोलकर छिड़काव कर दें।
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जनपद में 300 मीट्रिक टन से अधिक होता है उत्पादन
जनपद में पूरे वर्ष मशरूम का उत्पादन होता है। अक्तूबर से मार्च तक सफेद बटन मशरूम की खेती होती है। फरवरी से अप्रैल तक ढिंगरी मशरूम का उत्पादन लिया जाता है। मिल्की मशरूम की खेती का समय अगस्त से अक्तूबर माह तक है। जनपद में करीब 300 मीट्रिक टन से अधिक उत्पादन हो जाता है।