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औषधीय खेती की ओर बढ़ रहा रुझान
Updated Thu, 29 Mar 2018 11:47 PM IST
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औषधीय खेती की ओर बढ़ रहा रुझान
सहारनपुर। परंपरागत खेती में बढ़ती लागत और घटती आय के चलते किसानों का रुख कृषि विविधीकरण की ओर हो रहा है। इसके चलते जिले के किसान तेजी से औषधीय खेती को अपना रहे हैं। जनपद में एलोविरा, तुलसी, ब्राह्मी और अश्वगंधा की खेती लगभग 115 हेक्टेअर में सफलतापूर्वक हो रही है।
बढ़िया आमदनी के चलते जिले के किसानों का रुख तेजी से औषधीय खेती की ओर हो रहा है। जिले में एलोविरा की खेती 60 हेक्टेयर, तुलसी करीब 20 हेक्टेयर, ब्राह्मी 10 और अश्वगंधा की खेती लगभग 15 हेक्टेयर में हो रही है। सौंदर्य प्रसाधन से लेकर त्वचा और लीवर के रोगों में कारगर रहने वाला एलोविरा को फरवरी मार्च में लगाया जाता है। इसकी पत्तियों को काटकर आयुर्वेदिक औषधि निर्माताओं के यहां सप्लाई की जाती है। एक वर्ष में इसकी पत्तियों की कटाई तीन बार होती है और इसका रेट पांच से सात रुपये प्रति किलो रहता है। एक बीघा खेत से एक बार में सात से आठ क्विंटल तक उत्पादन मिल जाता है।
तुलसी की रोपाई वर्ष में दो बार होती है। अगस्त में और फरवरी में। चार महीने की इस फसल में गीली तुलसी आठ से 10 क्विंटल निकल जाती है, जो 20 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक जाती है। इसे सुखाकर भी बेचा जा सकता है। सूखने पर इसका रेट 80 से 100 रुपये तक रहता है। आयुर्वेदिक औषधि बनाने वाले उद्योग में इसकी सप्लाई होती है। इसी प्रकार अश्वगंधा की खेती भी जनपद में सफलतापूर्वक हो रही है। बाजार में इसका भाव 30 से 40 रुपये तक मिल जाता है। इसे अगस्त माह में लगाया जाता है।
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जिला उद्यान अधिकारी अरुण कुमार ने बताया कि जिले के मुजफ्फराबाद, साढ़ौली कदीम, देवबंद और गंगोह में औषधीय फसलों की खेती किसान सफलतापूर्वक कर रहे हैं। औषधीय फसलों के बढिया उत्पादन और बाजार में अच्छी मांग के चलते यह खेती परंपरागत खेती की तुुलना में बेहतर साबित हो रही है। इससे जिले के किसानों का रुझान तेजी से औषधीय खेती की ओर हो रहा है।
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सहारनपुर। परंपरागत खेती में बढ़ती लागत और घटती आय के चलते किसानों का रुख कृषि विविधीकरण की ओर हो रहा है। इसके चलते जिले के किसान तेजी से औषधीय खेती को अपना रहे हैं। जनपद में एलोविरा, तुलसी, ब्राह्मी और अश्वगंधा की खेती लगभग 115 हेक्टेअर में सफलतापूर्वक हो रही है।
बढ़िया आमदनी के चलते जिले के किसानों का रुख तेजी से औषधीय खेती की ओर हो रहा है। जिले में एलोविरा की खेती 60 हेक्टेयर, तुलसी करीब 20 हेक्टेयर, ब्राह्मी 10 और अश्वगंधा की खेती लगभग 15 हेक्टेयर में हो रही है। सौंदर्य प्रसाधन से लेकर त्वचा और लीवर के रोगों में कारगर रहने वाला एलोविरा को फरवरी मार्च में लगाया जाता है। इसकी पत्तियों को काटकर आयुर्वेदिक औषधि निर्माताओं के यहां सप्लाई की जाती है। एक वर्ष में इसकी पत्तियों की कटाई तीन बार होती है और इसका रेट पांच से सात रुपये प्रति किलो रहता है। एक बीघा खेत से एक बार में सात से आठ क्विंटल तक उत्पादन मिल जाता है।
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तुलसी की रोपाई वर्ष में दो बार होती है। अगस्त में और फरवरी में। चार महीने की इस फसल में गीली तुलसी आठ से 10 क्विंटल निकल जाती है, जो 20 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक जाती है। इसे सुखाकर भी बेचा जा सकता है। सूखने पर इसका रेट 80 से 100 रुपये तक रहता है। आयुर्वेदिक औषधि बनाने वाले उद्योग में इसकी सप्लाई होती है। इसी प्रकार अश्वगंधा की खेती भी जनपद में सफलतापूर्वक हो रही है। बाजार में इसका भाव 30 से 40 रुपये तक मिल जाता है। इसे अगस्त माह में लगाया जाता है।
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जिला उद्यान अधिकारी अरुण कुमार ने बताया कि जिले के मुजफ्फराबाद, साढ़ौली कदीम, देवबंद और गंगोह में औषधीय फसलों की खेती किसान सफलतापूर्वक कर रहे हैं। औषधीय फसलों के बढिया उत्पादन और बाजार में अच्छी मांग के चलते यह खेती परंपरागत खेती की तुुलना में बेहतर साबित हो रही है। इससे जिले के किसानों का रुझान तेजी से औषधीय खेती की ओर हो रहा है।