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देहात में शुरू हुई जहारवीर की यात्राएं
Updated Sun, 30 Jul 2017 12:11 AM IST
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देहात में शुरू हुई जहारवीर की यात्राएं
फोटो-1
बेहट (सहारनपुर)। कांवड़ यात्रा समापन के बाद जहारवीर गोगा म्हाड़ी की गाथाओं का वर्णन फिजां गूंजने लगा है। बड़ी संख्या में लोग राजस्थान के जनपद हनुमानगढ़ के गोगा म्हाड़ी पर जा रहे हैं। वहां से लौट कर लोग कंदूरी (भोज) का आयोजन कर रहे हैं। जहावीर गोगा से जुड़े गीतों से उत्सव सा माहौल बना है।
सावन में चलने वाली कावंड़ यात्रा के समापन के बाद ही जहारवीर गोगा की गाथाओं का बोलबाला शुरू हो जाता है। सावन के मध्य में लोग जात लेकर गोगा म्हाड़ी जाने की तैयारियों में लग जाते हैं। गोगा म्हाड़ी ले जाई जाने वाली छड़ी को जात कहा जाता है। जाहरवीर गोगा के बारे में कई किदवंतियां है। वैसे गोगा के बारे में अधिकतर वर्णन लोकगीतों में ही मिलता है। तकरीबन चार सौ साल पहले राजस्थान के चुरू जिले के ददरेवा गांव में हुआ था। इस नायक को हठयोगी गोरखनाथ का शिष्य कहा जाता है। कई बड़ी लड़ाईयां और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए भी जहावीर को याद किया जाता है। मध्य सावन से गोगा म्हाड़ी पर जाने का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो भादो के आखिरी तक जारी रहता है, जो राजस्थान में गोगा म्हाड़ी पर नहीं जा पाते वे लोग गांवों और कस्बों में बनी म्हाड़ियों पर निशान या छड़ी चढ़ाते हैं। राजस्थान में गोगा म्हाड़ी पर जात चढ़ाने वाले घर से पीले वस्त्र धारण कर निकलते है। उनके हाथ में छड़ी होती है और साथ में गोगा की गाथाएं गाने वाले लोकनायक। क्षेत्र से काफी संख्या में लोग फिलहाल राजस्थान में गोगा म्हाड़ी पर गए हुए हैं।
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बेहट (सहारनपुर)। कांवड़ यात्रा समापन के बाद जहारवीर गोगा म्हाड़ी की गाथाओं का वर्णन फिजां गूंजने लगा है। बड़ी संख्या में लोग राजस्थान के जनपद हनुमानगढ़ के गोगा म्हाड़ी पर जा रहे हैं। वहां से लौट कर लोग कंदूरी (भोज) का आयोजन कर रहे हैं। जहावीर गोगा से जुड़े गीतों से उत्सव सा माहौल बना है।
सावन में चलने वाली कावंड़ यात्रा के समापन के बाद ही जहारवीर गोगा की गाथाओं का बोलबाला शुरू हो जाता है। सावन के मध्य में लोग जात लेकर गोगा म्हाड़ी जाने की तैयारियों में लग जाते हैं। गोगा म्हाड़ी ले जाई जाने वाली छड़ी को जात कहा जाता है। जाहरवीर गोगा के बारे में कई किदवंतियां है। वैसे गोगा के बारे में अधिकतर वर्णन लोकगीतों में ही मिलता है। तकरीबन चार सौ साल पहले राजस्थान के चुरू जिले के ददरेवा गांव में हुआ था। इस नायक को हठयोगी गोरखनाथ का शिष्य कहा जाता है। कई बड़ी लड़ाईयां और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए भी जहावीर को याद किया जाता है। मध्य सावन से गोगा म्हाड़ी पर जाने का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो भादो के आखिरी तक जारी रहता है, जो राजस्थान में गोगा म्हाड़ी पर नहीं जा पाते वे लोग गांवों और कस्बों में बनी म्हाड़ियों पर निशान या छड़ी चढ़ाते हैं। राजस्थान में गोगा म्हाड़ी पर जात चढ़ाने वाले घर से पीले वस्त्र धारण कर निकलते है। उनके हाथ में छड़ी होती है और साथ में गोगा की गाथाएं गाने वाले लोकनायक। क्षेत्र से काफी संख्या में लोग फिलहाल राजस्थान में गोगा म्हाड़ी पर गए हुए हैं।
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