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गर्मी की दस्तक के साथ ही घाड़ में मंडराया आग का खतरा
Updated Sat, 21 Apr 2018 12:32 AM IST
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बेहट (सहारनपुर)। गर्मी की दस्तक के साथ ही तहसील बेहट के घाड़ इलाके में एक बार फिर अग्निकांड का खतरा मंडराने लगा हैं। बादशाही वन रेंज के अलावा जैतपुर खुर्द और कासमपुर में आग की घटनाओं ने फूस की छत और मिट्टी की दीवारों से बने घरों में रहने वाले गरीब परिवारों के माथे पर चिंता की लकीरें डाल दी हैं। ग्रामीणों को हर वक्त यही डर रहता है कि कहीं से कोई चिंगारी हवा के साथ न आकर उनके घर को जला दे। आग लगने से उनके सिर से छत तो छिनती ही है, साथ ही साल भर की खून पसीने की गाढ़ी कमाई भी पलक झपकते ही राख के ढेर में तब्दील हो जाती हैं। बेबस और लाचार हजारों परिवार की दर्द को बरसों से न तो प्रशासन और न ही शासन ने समझने की जरूरत समझी है।
शिवालिक तलहटी से सटे तहसील बेहट के तकरीबन 120 गांवों को उसकी भौगोलिक स्थिति के चलते घाड़ क्षेत्र घोषित किया है। कंकरीले, पथरीले और रेतीले इस इलाके में भीषण गर्मी में तेज हवा तबाही लेकर आती है। सरकारी स्तर से इस इलाके में जीवन स्तर को सुधारने के लिए कुछ भी दावे किए जाते हो, लेकिन आज भी यहां फूस की छत और मिट्टी की दीवारों से बने घरों की संख्या कम नहीं है। गर्म हवाओं के दौर में फूंस की छत से बने इन घरों में हल्की सी चिंगारी शोला बनकर सब कुछ राख कर देती है। पानी की किल्लत और आग बुझाने के संसाधानों का अभाव लोगों की लाचारी है। सरकारी स्तर से मिलने वाली सहायता जब तक आग बुझाने के लिए पहुंचती है, तो तब तक सब कुछ राख हो जाता है।
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प्रभावित गांव
-फैजाबाद, रहना, मगनपुरा, मायापुर रुपपुर, मिर्जापुर पोल, भगवाला, मिरगपुर पांजूवाला, कासमपुर, रामपुर, बडकला, हवीबपुर तपोवन, नागल, भूरीवाला, नौगांवा ग्राम समूह, कोठडी ग्राम समूह, जैतपुर खुर्द, कला, धौलाकुआं, मदनपुरा, पाडली, शेरपुर पेला।
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बीस साल में नहीं खुल सका फायर स्टेशन
अग्निकांड के चलते बीस साल से फायर स्टेशन की कार्ययोजना परवान नहीं चढ़ सकी है। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि और अधिकारी इलाके के लोगों को आश्वासन के अलावा कुछ नहीं दे पाए। गंभीर बात यह है कि इन इलाकों से फायर स्टेशन 50 किलोमीटर दूर सहारनपुर मुख्यालय पर है। ऐसे में बेहट में फायर स्टेशन खोले जाने का प्रस्ताव दिया गया, मगर वह हर बार फाइलों में दब गया। प्रशासन फायर स्टेशन के लिए जमीन उपलब्ध कराने में नाकाम रहा है। हाल में ही कलसिया में सिंचाई विभाग की जमीन को चिह्नित किया गया है, मगर जमीन कब तक ट्रांसफर होगी कहना मुश्किल है। वैैैसे भी मुख्यालय का फायर स्टेशन संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। वैैैसे यहां फायर की सात गाड़ियों के अलावा तीन वाटर टेंडर है।
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नुकसान का पूरा मुआवजा भी नहीं मिलता
मैं अपने बच्चों की खातिर जान ही दे देता, लेकिन मेरी जान का मुआवजा कम है। शायर नवाज देवबंदी की ये पंक्तियां उस प्रशासनिक व्यवस्था पर कटाक्ष है, जिससे अग्निकांड पीड़ितों के लिए इतनी भी सहायता नहीं मिल पाती है कि कि उनके जख्मों पर मरहम ही लग जाए। सरकार से मिलने वाली सहायता राशि के नाम पर पीड़ितों को 1500 से 2000 हजार रुपये के चेक थमा दिया जाते है, जो नाकाफी है। इतने में दोबारा से उनकी फूस की छत भी नहीं बन पाती।
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घाड़ में फायर बिग्रेड की यूनिट स्थापित किए जाने का प्रस्ताव पहले से ही शासन को गया हुआ है, लेकिन अभी तक जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण यूनिट स्थापित नहीं हो सकी। कलसिया में सिंचाई विभाग की जमीन का प्रस्ताव दिया गया है, इसकी स्वीकृति मिलते ही वहां दो यूनिट का फायर स्टेशन स्थापित होगा।
तेजवीर सिंह, मुख्य अग्निशमन अधिकारी सहारनपुर
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घाड़ मजदूर मोर्चा वर्ष 1985 से घाड़ क्षेत्र में फायर स्टेशन की स्थापना की मांग करता आ रहा है। इसके लिए आंदोलन भी किए गए, लेकिन गूंगी और बहरी सरकारों के कानों में उनकी आवाज नहीं पहुंची और आज तक फायर स्टेशन नहीं बन सका।
चाणूराम, सह संयोजक घाड़ मजदूर मोर्चा
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अभी हाल ही में विधान सभा सत्र में उन्होंने घाड़ क्षेत्र में अग्निकांडों से होने वाले जानमाल के नुकसान का हवाला देते हुए बेहट में फायर स्टेशन बनाए जाने की मांग उठाई थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया था। जल्द ही फायर स्टेशन खुल जाएगा।
नरेश सैनी, विधायक बेहट विधान सभा क्षेत्र
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हर साल होते है 20 से 25 अग्निकांड
वन क्षेत्राधिकारी शरद कुमार गुप्ता के अनुसार एक रेंज में प्रतिवर्ष 20 से 25 अग्निकांड जंगलों में होना आम बात है। अधिकांश आग की घटनाएं लोगों की गलती से लगती है। जंगलों में आम जनमानस का प्रवेश बंद होने पर अग्निकांड की घटनाएं कम हो जाएगी।
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आग रोकने की वन विभाग की तैयारी
मुख्य वन संरक्षक सुनील कुमार दूबे ने बताया कि फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के पास गूगल मैप है। मोबाइल पर आग लगने का अलर्ट मिल जाता है। इसी सप्ताह खारा बीट में लगी आग की सूचना भी ऐसे ही मिली थी। शिवालिक के तीनों रेंज अफसरों अलर्ट कर दिया गया है। तीनो रेंज में 15 वन समितियों के साथ बैठक करने के लिए बोला गया है, ताकि कोई भी व्यक्ति जंगल में ज्वलनशील पदार्थ लेकर न जाये। शांकुबरी रेंज में मंदिर के आस पास में पॉलीथिन और अन्य कोई भी ज्वलनशील पदार्थ को प्रतिबंधित किया जा रहा है। यदि कोई नियमों का उल्लंघन करता पाया गया तो उसके खिलाफ वन विभाग मुकदमा दर्ज कराएगा।
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पहले हेलीकाप्टर से बुझाते थे जंगल की आग
सूत्रों के अनुसार 1988-89 में जब उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड एक थे। तब जंगलों की आग को बुझाने के लिए एक विशेष विंग फायर फाइटिंग का गठन किया गया था । इनको विदेश में आग बुझाने के लिए प्रशिक्षित कर विशेष उपकरण दिए गए थे। इनमें एक हेलीकाप्टर भी था। इससे जंगल में लगी आग पर आसमान से पानी का छिड़काव कर उसे बुझाया जाता था। अधिकारियों ने हेलीकाप्टर का आग बुझाने में कम निजी कार्यों में ज्यादा प्रयोग किया। बाद में हेलीकाप्टर हल्द्वानी में खड़ा खड़ा बेकार हो गया।
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शिवालिक तलहटी से सटे तहसील बेहट के तकरीबन 120 गांवों को उसकी भौगोलिक स्थिति के चलते घाड़ क्षेत्र घोषित किया है। कंकरीले, पथरीले और रेतीले इस इलाके में भीषण गर्मी में तेज हवा तबाही लेकर आती है। सरकारी स्तर से इस इलाके में जीवन स्तर को सुधारने के लिए कुछ भी दावे किए जाते हो, लेकिन आज भी यहां फूस की छत और मिट्टी की दीवारों से बने घरों की संख्या कम नहीं है। गर्म हवाओं के दौर में फूंस की छत से बने इन घरों में हल्की सी चिंगारी शोला बनकर सब कुछ राख कर देती है। पानी की किल्लत और आग बुझाने के संसाधानों का अभाव लोगों की लाचारी है। सरकारी स्तर से मिलने वाली सहायता जब तक आग बुझाने के लिए पहुंचती है, तो तब तक सब कुछ राख हो जाता है।
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प्रभावित गांव
-फैजाबाद, रहना, मगनपुरा, मायापुर रुपपुर, मिर्जापुर पोल, भगवाला, मिरगपुर पांजूवाला, कासमपुर, रामपुर, बडकला, हवीबपुर तपोवन, नागल, भूरीवाला, नौगांवा ग्राम समूह, कोठडी ग्राम समूह, जैतपुर खुर्द, कला, धौलाकुआं, मदनपुरा, पाडली, शेरपुर पेला।
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बीस साल में नहीं खुल सका फायर स्टेशन
अग्निकांड के चलते बीस साल से फायर स्टेशन की कार्ययोजना परवान नहीं चढ़ सकी है। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि और अधिकारी इलाके के लोगों को आश्वासन के अलावा कुछ नहीं दे पाए। गंभीर बात यह है कि इन इलाकों से फायर स्टेशन 50 किलोमीटर दूर सहारनपुर मुख्यालय पर है। ऐसे में बेहट में फायर स्टेशन खोले जाने का प्रस्ताव दिया गया, मगर वह हर बार फाइलों में दब गया। प्रशासन फायर स्टेशन के लिए जमीन उपलब्ध कराने में नाकाम रहा है। हाल में ही कलसिया में सिंचाई विभाग की जमीन को चिह्नित किया गया है, मगर जमीन कब तक ट्रांसफर होगी कहना मुश्किल है। वैैैसे भी मुख्यालय का फायर स्टेशन संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। वैैैसे यहां फायर की सात गाड़ियों के अलावा तीन वाटर टेंडर है।
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नुकसान का पूरा मुआवजा भी नहीं मिलता
मैं अपने बच्चों की खातिर जान ही दे देता, लेकिन मेरी जान का मुआवजा कम है। शायर नवाज देवबंदी की ये पंक्तियां उस प्रशासनिक व्यवस्था पर कटाक्ष है, जिससे अग्निकांड पीड़ितों के लिए इतनी भी सहायता नहीं मिल पाती है कि कि उनके जख्मों पर मरहम ही लग जाए। सरकार से मिलने वाली सहायता राशि के नाम पर पीड़ितों को 1500 से 2000 हजार रुपये के चेक थमा दिया जाते है, जो नाकाफी है। इतने में दोबारा से उनकी फूस की छत भी नहीं बन पाती।
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घाड़ में फायर बिग्रेड की यूनिट स्थापित किए जाने का प्रस्ताव पहले से ही शासन को गया हुआ है, लेकिन अभी तक जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण यूनिट स्थापित नहीं हो सकी। कलसिया में सिंचाई विभाग की जमीन का प्रस्ताव दिया गया है, इसकी स्वीकृति मिलते ही वहां दो यूनिट का फायर स्टेशन स्थापित होगा।
तेजवीर सिंह, मुख्य अग्निशमन अधिकारी सहारनपुर
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घाड़ मजदूर मोर्चा वर्ष 1985 से घाड़ क्षेत्र में फायर स्टेशन की स्थापना की मांग करता आ रहा है। इसके लिए आंदोलन भी किए गए, लेकिन गूंगी और बहरी सरकारों के कानों में उनकी आवाज नहीं पहुंची और आज तक फायर स्टेशन नहीं बन सका।
चाणूराम, सह संयोजक घाड़ मजदूर मोर्चा
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अभी हाल ही में विधान सभा सत्र में उन्होंने घाड़ क्षेत्र में अग्निकांडों से होने वाले जानमाल के नुकसान का हवाला देते हुए बेहट में फायर स्टेशन बनाए जाने की मांग उठाई थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया था। जल्द ही फायर स्टेशन खुल जाएगा।
नरेश सैनी, विधायक बेहट विधान सभा क्षेत्र
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हर साल होते है 20 से 25 अग्निकांड
वन क्षेत्राधिकारी शरद कुमार गुप्ता के अनुसार एक रेंज में प्रतिवर्ष 20 से 25 अग्निकांड जंगलों में होना आम बात है। अधिकांश आग की घटनाएं लोगों की गलती से लगती है। जंगलों में आम जनमानस का प्रवेश बंद होने पर अग्निकांड की घटनाएं कम हो जाएगी।
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आग रोकने की वन विभाग की तैयारी
मुख्य वन संरक्षक सुनील कुमार दूबे ने बताया कि फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के पास गूगल मैप है। मोबाइल पर आग लगने का अलर्ट मिल जाता है। इसी सप्ताह खारा बीट में लगी आग की सूचना भी ऐसे ही मिली थी। शिवालिक के तीनों रेंज अफसरों अलर्ट कर दिया गया है। तीनो रेंज में 15 वन समितियों के साथ बैठक करने के लिए बोला गया है, ताकि कोई भी व्यक्ति जंगल में ज्वलनशील पदार्थ लेकर न जाये। शांकुबरी रेंज में मंदिर के आस पास में पॉलीथिन और अन्य कोई भी ज्वलनशील पदार्थ को प्रतिबंधित किया जा रहा है। यदि कोई नियमों का उल्लंघन करता पाया गया तो उसके खिलाफ वन विभाग मुकदमा दर्ज कराएगा।
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पहले हेलीकाप्टर से बुझाते थे जंगल की आग
सूत्रों के अनुसार 1988-89 में जब उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड एक थे। तब जंगलों की आग को बुझाने के लिए एक विशेष विंग फायर फाइटिंग का गठन किया गया था । इनको विदेश में आग बुझाने के लिए प्रशिक्षित कर विशेष उपकरण दिए गए थे। इनमें एक हेलीकाप्टर भी था। इससे जंगल में लगी आग पर आसमान से पानी का छिड़काव कर उसे बुझाया जाता था। अधिकारियों ने हेलीकाप्टर का आग बुझाने में कम निजी कार्यों में ज्यादा प्रयोग किया। बाद में हेलीकाप्टर हल्द्वानी में खड़ा खड़ा बेकार हो गया।