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सरकार मुकदमें वापस लेगी तो जनता का अदालतों से विश्वास उठेगा: उलमा
Updated Sun, 01 Apr 2018 12:56 AM IST
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सरकार मुकदमे वापस लेगी तो जनता का
अदालतों से विश्वास उठेगा : उलमा
देवबंद(सहारनपुर)। पहले मुजफ्फरनगर दंगों में दर्ज मुकदमों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू करना और अब सहारनपुर में सड़क दूधली में हुए बवाल में दर्ज मामलों को वापस लिए जाने की तैयारी करने के मामले में देवबंदी उलमा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह वोट बैंक की राजनीति है। अगर सरकार इसी तरह मुकदमे वापस लेती रही तो अदालतों से जनता का यकीन हट जाएगा।
शनिवार को दारुल उलूम अशरफिया के मोहतमिम मौलाना सालिम अशरफ कासमी ने कहा कि 2019 का चुनाव नजदीक है इसलिए वोट बैंक की राजनीति शुरु कर दी गई है। अगर इसी तरह सरकार दर्ज मुकदमों को वापस लेती रही तो इससे प्रजातंत्र को झटका लगेगा और अदालतों पर से लोगों का यकीन हट जाएगा। जो बहुत भारी नुकसान है। उन्होंने कहा कि जब राजनीतिक दल खुद ही जब चाहे इस तरह के मुकदमे खत्म कर देंगी तो फिर अदालतों का रोल ही क्या रह गया। प्रजातंत्र में अदालतों को पूरा हक होता है फैसला देने का। लेकिन पार्टियां दबाव बनाकर अदालतों से फैसला कराने लगे तो प्रजातंत्र खत्म हो जाएगा। दारुल उलूम निस्वाह के मोहतमिम मौलाना अब्दुल लतीफ का कहना है कि जनता के भरोसे का सबसे बड़ा जरिया अदालतें होती हैं। ऐसे में सरकार अदालत के रोल अदा करने लगे तो यह भरोसा डगमगा जाएगा। राज्य सरकार हो या फिर केंद्र सरकार इन्हें चाहिए कि वह अदालतों में चल रहे मामलों पर फैसला आने का इंतजार करें। उससे पहले ही सरकार की ओर से कोई हुकुमनामा जारी करने से जनता के अंदर डल पैदा करने जैसा है।
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अदालतों से विश्वास उठेगा : उलमा
देवबंद(सहारनपुर)। पहले मुजफ्फरनगर दंगों में दर्ज मुकदमों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू करना और अब सहारनपुर में सड़क दूधली में हुए बवाल में दर्ज मामलों को वापस लिए जाने की तैयारी करने के मामले में देवबंदी उलमा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह वोट बैंक की राजनीति है। अगर सरकार इसी तरह मुकदमे वापस लेती रही तो अदालतों से जनता का यकीन हट जाएगा।
शनिवार को दारुल उलूम अशरफिया के मोहतमिम मौलाना सालिम अशरफ कासमी ने कहा कि 2019 का चुनाव नजदीक है इसलिए वोट बैंक की राजनीति शुरु कर दी गई है। अगर इसी तरह सरकार दर्ज मुकदमों को वापस लेती रही तो इससे प्रजातंत्र को झटका लगेगा और अदालतों पर से लोगों का यकीन हट जाएगा। जो बहुत भारी नुकसान है। उन्होंने कहा कि जब राजनीतिक दल खुद ही जब चाहे इस तरह के मुकदमे खत्म कर देंगी तो फिर अदालतों का रोल ही क्या रह गया। प्रजातंत्र में अदालतों को पूरा हक होता है फैसला देने का। लेकिन पार्टियां दबाव बनाकर अदालतों से फैसला कराने लगे तो प्रजातंत्र खत्म हो जाएगा। दारुल उलूम निस्वाह के मोहतमिम मौलाना अब्दुल लतीफ का कहना है कि जनता के भरोसे का सबसे बड़ा जरिया अदालतें होती हैं। ऐसे में सरकार अदालत के रोल अदा करने लगे तो यह भरोसा डगमगा जाएगा। राज्य सरकार हो या फिर केंद्र सरकार इन्हें चाहिए कि वह अदालतों में चल रहे मामलों पर फैसला आने का इंतजार करें। उससे पहले ही सरकार की ओर से कोई हुकुमनामा जारी करने से जनता के अंदर डल पैदा करने जैसा है।
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