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सपा के सत्ता संग्राम से रामपुर में फिर बढ़ी बेचैनी
अमर उजाला ब्यूरो/ रामपुर
Updated Sun, 01 Jan 2017 11:59 PM IST
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रामपुर में रविवार को सपा का राजनीतिक दंगल टीवी पर देखते लोग। अमर उजाला
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एक दिन की खामोशी के बाद सपा में उठे सियासी तूफान ने एक बार फिर शहर के सपाइयों को बेचैन कर दिया है। कार्यकर्ता से लेकर राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों की निगाह लखनऊ में दिनभर चले सियासी घटनाक्रम पर टिकी रही। लोग पार्टी के भविष्य को लेकर तरह-तरह के कयास लगाते रहे।
समाजवादी पार्टी में सत्ता के संग्राम का सियासी ड्रामा पिछले कई दिन से चल रहा है। टिकटों के वितरण को लेकर गर्मायी सियासत में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पार्टी से बर्खास्तगी भी हो चुकी है। पिता पुत्र के बीच बढ़ते इस विवाद को शांत कराने के लिए नगर विकास मंत्री आजम खां भी बेहद दुखी थे। उन्होंने दोनों के बीच कल ही मध्यस्थता कराई थी, जिसके बाद सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच समझौता हो गया था। मगर, यह समझौता भी 24 घंटे नहीं चल सका और रविवार को सपा के अधिवेशन में जिस तरह के फैसले होते रहे और पार्टी में उलटफेर होता रहा। उसके बाद रविवार को एक बार फिर सपाइयों के चेहरे पर बेचैनी साफ झलक रही थी।
समाजवादी पार्टी से जुड़े बड़े नेता से लेकर आम कार्यकर्ता चरचा तो करते नजर आए, लेकिन खुलकर कोई सामने नहीं आया। सपा दफ्तर में भी यहां इक्का दुक्का कार्यकर्ता आते और वापस चले जाते। होटलों से लेकर चौराहों तक अखिलेश को पार्टी से बाहर निकाले जाने को लेकर चरचा होती रही। सरकारी तंत्र की भी नजर लखनऊ बवाल पर टिकी रही, लेकिन स्थानीय सपाई किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने से बचते रहे। तमाम सपाइयों को अब भविष्य को लेकर भी चिंता सताने लगी है।
समाजवादी पार्टी में सत्ता के संग्राम का सियासी ड्रामा पिछले कई दिन से चल रहा है। टिकटों के वितरण को लेकर गर्मायी सियासत में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पार्टी से बर्खास्तगी भी हो चुकी है। पिता पुत्र के बीच बढ़ते इस विवाद को शांत कराने के लिए नगर विकास मंत्री आजम खां भी बेहद दुखी थे। उन्होंने दोनों के बीच कल ही मध्यस्थता कराई थी, जिसके बाद सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच समझौता हो गया था। मगर, यह समझौता भी 24 घंटे नहीं चल सका और रविवार को सपा के अधिवेशन में जिस तरह के फैसले होते रहे और पार्टी में उलटफेर होता रहा। उसके बाद रविवार को एक बार फिर सपाइयों के चेहरे पर बेचैनी साफ झलक रही थी।
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समाजवादी पार्टी से जुड़े बड़े नेता से लेकर आम कार्यकर्ता चरचा तो करते नजर आए, लेकिन खुलकर कोई सामने नहीं आया। सपा दफ्तर में भी यहां इक्का दुक्का कार्यकर्ता आते और वापस चले जाते। होटलों से लेकर चौराहों तक अखिलेश को पार्टी से बाहर निकाले जाने को लेकर चरचा होती रही। सरकारी तंत्र की भी नजर लखनऊ बवाल पर टिकी रही, लेकिन स्थानीय सपाई किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने से बचते रहे। तमाम सपाइयों को अब भविष्य को लेकर भी चिंता सताने लगी है।
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