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UP: रामपुर में चांदी के कलश में दफन हैं महात्मा गांधी की अस्थियां, कुछ अस्थियों को कोसी में किया था विसर्जित

Tue, 30 Jan 2024 12:31 PM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, रामपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रामपुर Published by: शाहरुख खान Updated Tue, 30 Jan 2024 12:31 PM IST
सार

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अस्थियां रामपुर में चांदी के कलश में दफन हैं। 11 फरवरी 1948 को नवाब रजा अली खां की स्पेशल ट्रेन से महात्मा गांधी की अस्थियां लाई गईं थीं। यहां गांधी समाधि बनवाई गई। कुछ अस्थियों को कोसी में विसर्जित किया गया था।

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Mahatma Gandhi Death anniversary Bapu ashes are buried in a silver urn in Rampur
Mahatma Gandhi Death anniversary - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली के साथ ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि रामपुर में भी है। 11 फरवरी 1948 को बापू की अस्थियां रामपुर लाई गई थीं। कुछ अस्थियों को कोसी नदी में विसर्जित कर दिया गया था। शेष अस्थियों को चांदी के कलश में रखकर दफन किया गया था और वहीं पर गांधी समाधि का निर्माण कराया गया। 
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महात्मा गांधी दो बार रामपुर आए थे। 30 जनवरी 1948 को जब बापू की हत्या की खबर रामपुर पहुंची तो शोक की लहर दौड़ गई। उस वक्त रामपुर रियासत का भारतीय गणराज्य में विलय नहीं हुआ था। 31 जनवरी 1948 को रामपुर के नवाब रजा अली खां ने 13 दिन के सरकारी शोक का एलान किया था। 
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दो फरवरी को जब बापू का दिल्ली में अंतिम संस्कार हुआ तो रामपुर के किले से उनको 23 तोपों की सलामी दी गई थी। 10 फरवरी को नवाब दिल्ली के राजघाट पहुंचे और महात्मा गांधी की चिता वेदी पर श्रद्धासुमन अर्पित किए। इसके बाद नवाब रजा अली खां ने बापू की अस्थियों को रामपुर ले जाने की इच्छा जताई। 
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अस्थियों को लाने के लिए रामपुर से अष्टधातु का कलश ले जाया गया था। 11 फरवरी को सुबह 9 बजे नवाब की स्पेशल ट्रेन से अस्थि कलश को रामपुर लाया गया। हजारों की भीड़ स्टेशन पर मौजूद थी। शांति मार्च के रूप में अस्थि कलश को स्टेशन से स्टेडियम लाया गया, जहां शहरवासियों ने बापू को श्रद्धांजलि दी। 

12 फरवरी 1948 को रामपुर में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया और स्टेडियम में शोकसभा आयोजित की गई थी। दोपहर तीन बजे कलश को हाथी पर रखकर कोसी नदी के घाट पर ले जाया गया, जहां नवाब ने कुछ अस्थियां कोसी में विसर्जित की थीं। 

 

शेष अस्थियों को चांदी के कलश में रखकर रियासती बैंड की मातमी धुन के बीच नवाब गेट के पास लाया। नवाब ने अपने हाथों से अस्थियों भरा कलश दफन किया था। इसी स्थान पर गांधी समाधि का निर्माण कराया गया। यहां बनी भव्य गांधी समाधि रामपुर की शान है। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गांधी जयंती पर यहां ध्वजारोहण किया जाता है।

पंडितों के तर्क के बाद रजा अली खां को मिली थीं बापू की अस्थियां
नवाब रजा अली खां ने जब दिल्ली पहुंचकर बापू की अस्थियां रामपुर ले जाने की इच्छा जताई थी तो उनको मना कर दिया गया था। पहले यह कहा गया था कि एक मुसलमान को बापू की अस्थियां क्यों दी जाएं। इसके बाद नवाब के साथ गए पंडितों ने तर्क पेश किए तब बापू की अस्थियां नवाब को सौंप दी गई थीं। रजा अली खां अपने साथ पंडित राम रतन, पंडित राम चंद्र, राम गोपाल शर्मा, पंडित राधे मोहन चौबे और मदन मोहन चौबे को दिल्ली ले गए थे। इस बात का जिक्र इतिहासकार शौकत अली खां ने अपनी किताब रामपुर का इतिहास में किया है।
 

बी अम्मा ने गांधी जी के लिए बनाई थी टोपी
दुनिया भर में मशहूर गांधी जी की टोपी का इतिहास भी रामपुर से जुड़ा हुआ है। नौकाकार खादी की यह टोपी रामपुर में तैयार की गई थी। यह टोपी खिलाफत आंदोलन की अगुवाई करने वाले मौलाना मोहम्मद अली जौहर की मां बी अम्मा ने तैयार की थी। यह टोपी बाद में दुनियाभर में गांधी टोपी के नाम से मशहूर हुई। लेखक महेंद्र सक्सेना ने अपनी किताब रामपुर को जानो में लिखा है कि 1919 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी रामपुर आए थे। उस वक्त रामपुर रियासत के नवाब सैयद हामिद अली खान बहादुर थे।

गांधीजी की नवाब से मुलाकात खासबाग में होनी थी। किताब में लिखा है कि जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी नवाब से मुलाकात करने के लिए निकल रहे थे, तब नवाब के एक अधिकारी महात्मा गांधी के पास पहुंचे और दरबार की एक परंपरा का हवाला देते हुए उन्हें बताया था कि नवाब से मिलने वाले अतिथि को सिर ढंकना होता है। इसके बाद रामपुर में ही महात्मा गांधी के लिए बी अम्मा ने नौकाकार टोपी तैयार की, जिसे पहनकर महात्मा गांधी नवाब से मुलाकात करने पहुंचे थे। यह टोपी महात्मा गांधी को खूब पसंद आई और दुनियाभर में मशहूर हो गई।
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