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रियासत के दौरान 1774 में हुई थी मदरसा आलिया की स्थापना
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रामपुर। मदरसा ए आलिया (राजकीय ओरिएंटल कालेज) आध्यात्मिक शिक्षा अरबी, फारसी एवं साहित्यिक ज्ञान का केंद्र रहा है। यह देश का पहला ऐसा मदरसा था, जहां इस्लामिक देशों से भी बच्चे आकर शिक्षा हासिल करते थे। यही वजह थी कि राजनाथ सिंह के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने मदरसे को अरबी, फारसी विश्वविद्यालय बनाने का ऐलान किया था और तब इसके लिए एक करोड़ रुपये भी मंजूर किए थे।
मदरसा ए आलिया की स्थापना 1774 में विद्या सागर मौलाना अब्दुल अली फिरंगी की निगरानी में हुई थी। प्राचीन समय से ही मदरसे को एक विश्वविद्यालय के लिहाज से जाना जाता था। इस मदरसे को मिस्त्र के जामिया अजहर यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिया हमदर्द एवं जामिया मिल्लिया इस्लामिया दिल्ली से मान्यता प्राप्त थी। यहां की डिग्री को फाजिल को बीएससी के समकक्ष माना जाता था। लिहाजा, यहां मलेशिया, इंडोनेशिया समेत तमाम इस्लामिक देशों के छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे। 15 मई 1949 को रियासत के विलय के दौरान मर्जर एक्ट में भी यह प्रावधान किया गया था कि इस मदरसे को कभी बंद नहीं किया जाएगा और इसके संचालन का संपूर्ण खर्च सरकार वहन करेगी। मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने भी इस विद्यालय में शिक्षण कार्य किया है। यहां अरबी, फारसी की दुर्लभ पांडुलिपियां एवं बहुमूल्य किताबें थीं। लिहाजा, मदरसे का महत्व काफी अधिक था। इसी वजह से मुख्यमंत्री रहते हुए तत्कालीन राजनाथ सिंह की सरकार ने मदरसे को अरबी, फारसी विश्वविद्यालय बनाने का ऐलान किया था और एक करोड़ रुपये भी मंजूर किए थे।
प्रदेश में सपा की सरकार आने के बाद मदरसे की बिल्डिंग को जौहर ट्रस्ट के नाम कर दिया गया था। तभी मदरसे का किताबी खजाना भी तभी गायब हो गया था, जिसमें कुछ फर्नीचर भी शामिल था। तब भी इसको लेकर काफी शिकायतें की गईं थीं, लेकिन तब कोई कार्रवाई नहीं हो सकी थी।
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मदरसा ए आलिया की स्थापना 1774 में विद्या सागर मौलाना अब्दुल अली फिरंगी की निगरानी में हुई थी। प्राचीन समय से ही मदरसे को एक विश्वविद्यालय के लिहाज से जाना जाता था। इस मदरसे को मिस्त्र के जामिया अजहर यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिया हमदर्द एवं जामिया मिल्लिया इस्लामिया दिल्ली से मान्यता प्राप्त थी। यहां की डिग्री को फाजिल को बीएससी के समकक्ष माना जाता था। लिहाजा, यहां मलेशिया, इंडोनेशिया समेत तमाम इस्लामिक देशों के छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे। 15 मई 1949 को रियासत के विलय के दौरान मर्जर एक्ट में भी यह प्रावधान किया गया था कि इस मदरसे को कभी बंद नहीं किया जाएगा और इसके संचालन का संपूर्ण खर्च सरकार वहन करेगी। मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने भी इस विद्यालय में शिक्षण कार्य किया है। यहां अरबी, फारसी की दुर्लभ पांडुलिपियां एवं बहुमूल्य किताबें थीं। लिहाजा, मदरसे का महत्व काफी अधिक था। इसी वजह से मुख्यमंत्री रहते हुए तत्कालीन राजनाथ सिंह की सरकार ने मदरसे को अरबी, फारसी विश्वविद्यालय बनाने का ऐलान किया था और एक करोड़ रुपये भी मंजूर किए थे।
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प्रदेश में सपा की सरकार आने के बाद मदरसे की बिल्डिंग को जौहर ट्रस्ट के नाम कर दिया गया था। तभी मदरसे का किताबी खजाना भी तभी गायब हो गया था, जिसमें कुछ फर्नीचर भी शामिल था। तब भी इसको लेकर काफी शिकायतें की गईं थीं, लेकिन तब कोई कार्रवाई नहीं हो सकी थी।
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