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सात समंदर पार गगन चूम रही रामपुर की पतंग
अमर उजाला ब्यूरो/ रामपुर
Updated Fri, 11 May 2018 12:15 AM IST
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रामपुर में किले के पास पतंग बनाता कारीगर। अमर उजाला
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कभी जगह-जगह रामपुर का चाकू लहराया जाता था लेकिन अब रामपुर की पतंगें विदेशी मुल्कों के आसमान में लहरा रही हैं। रामपुर की डिजाइनर और साधारण पतंगों की मांग सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में है। इंग्लैंड, आयरलैंड, स्कॉटलैंड, रूटलैंड में बड़े पैमाने पर रामपुर की पतंग जा रही है। यही नहीं तमाम राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियों में भी रामपुर की पतंगों ने अहम स्थान बनाया है।
पतंगबाजी के क्षेत्र में भी रामपुर नए आयाम स्थापित कर रहा है। यहां पतंग व्यवसाय से करीब पांच हजार लोग जुड़े हुए हैं। आठ बड़े-बड़े कारखाने हैं, जबकि करीब सौ छोटे -छोटे कारीगर हैं। रामपुर की पतंग सिर्फ हिंदुस्तान ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी पसंद की जा रही है। खासकर, यूके (यूनाइटेड किंगडम)। आयरलैंड, इंग्लैंड, रूटलैंड, स्कॉटलैंड में बड़े पैमाने पर रामपुर की पतंग का निर्यात हो रहा है। पतंग कारीगर तौसीफ मियां की मानें तो हिन्दुस्तान के तो हर कोने में रामपुर की पतंग की धाक है, लेकिन अब विदेशों में भी रामपुर की पतंग की काफी मांग है। ब्रिटेन और अमेरिका में भी यहां की पतंगों को पसंद किया जा रहा है।
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आकर्षण बढ़ा रहा पतंगों पर कागज का पेचवर्क ः रामपुर। पतंग का कारोबार अब धीरे-धीरे डिजाइनिंग की ओर बढ़ रहा है। यहां तुक्कल पतंग (तीन कमान वाली), गोल तुक्कल पतंग (9 ठड्डे और एक कमान वाली), मछली शेप, बर्ड शेप, स्टार शेप, गुड्डा शेप व कागज पर कागज से किए गए पेचवर्क वाली पतंगें बनाई जा रही हैं। पेचवर्क से बनने वाली एक पतंग में एक- एक सप्ताह तक लग जाता है। पतंगों के कई डिजाइन तो ऐसे हैं, जिन्हें बनाने में तीन माह तक का समय लगता है।
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पेचवर्क से सजाई गई एक पतंग की कीमत 80 रुपये से लेकर दो हजार रुपये तक होती है। अधिकांशतया पेचवर्क के डिजाइन की पतंग प्रदर्शनी की शोभा बढ़ाने के काम आती हैं, जिन्हें संग्रह के लिए लोग पसंद करते हैं।
एक साथ सौ पतंगे उड़ा सकते हैं तौसीफ मियांः रामपुर। कागजी पेचवर्क से पतंगों में रंग भर रहे तौसीफ मियां बताते हैं कि कागज के पेचवर्क से पतंग को डिजाइनर बनाने का काम सिर्फ उन्हीं का परिवार करता है। यह काम उनके दादा चांद मियां ने शुरू किया था। वह तीन कमान वाली तुक्कल पतंग बनाने में माहिर थे। इस कला की बदौलत एक माह के लिए अमेरिका भी गए। 1985 में उन्हें श्रेष्ठ शिल्प के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इस कला को तौसीफ के पिता आसिफ मियां ने आगे बढ़ाया।
1990 में आसिफ मियां को कपड़ा मंत्रालय की ओर से इस कला के लिए सम्मानित किया गया। अब तौसीफ मियां कागज के पेचवर्क से पतंगों को सजा रहे हैं। सिर्फ डिजाइनिंग ही नहीं, बल्कि वह पतंग उड़ाने में भी माहिर है। एक साथ सौ पतंगें उड़ा सकते हैं। इसके लिए भी दिल्ली, कोलकाता समेत तमाम बड़े शहरों में कई आयोजनों में शामिल हुए हैं।
पांच करोड़ तक पहुंचा कारोबार ः रामपुर। शहर में पतंग का कारोबार अब पांच करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। विदेशों में बड़ी पतंगों की मांग के बाद यह इजाफा हुआ है। इसमें से करीब दो करोड़ रुपये का कारोबार सिर्फ हिंदुस्तान के विभिन्न प्रदेशों में होता है, जहां देश के हर कोने में रामपुर की पतंगों के शौकीन हैं।