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Raebareli News: जिसका जमीर मर गया, समझो वह मर गया...
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अली मियाॅ काॅलोनी स्थित आवास में आयोजित कवि गोष्ठी में मौजूद कविगण।
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रायबरेली। साहित्यिक संस्था हिंदी-उर्दू मंच के तत्वावधान में शुक्रवार को अली मियां कॉलोनी स्थित काशाना-ए-अदब में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कवियों और शायरों ने पहले से निर्धारित पंक्ति तुझसे मिले बगैर दिसंबर गुजर गया... पर केंद्रित रचनाएं प्रस्तुत कीं।
कवि जय चक्रवर्ती ने कहा- वह कह रहा था लाएंगे हर सिम्त रोशनी, ये क्या हुआ कि और अंधेरा पसर गया। अध्यक्षता कर रहे उस्ताद शायर नाज प्रतापगढ़ी ने पढ़ा- कल इक फकीर बात यह कह कर गुजर गया, जिसका जमीर मर गया समझो वह मर गया। हसन अब्बास जायसी ने कहा- लगता है जैसे मुझको गुनहगार कर गया, तुझसे मिले बगैर दिसंबर गुजर गया। लईक अंसारी ने कहा- सूरज कभी हदों से जो अपनी गुजर गया, वह धूप बनके मुझपे गिरा और बिखर गया। आफाक सुल्तानपुरी ने पढ़ा- जिस रास्ते से मेरा पयंबर गुजर गया, उस रास्ते का बिगड़ा मुकद्दर संवर गया।
शिव बहादुर सिंह दिलबर ने कहा- यह तब की बात है कि मैं आजाद जब रहा, दिल ने कहा जिधर को मैं दिलबर उधर गया। शब्बीर अहमद सूरी ने कहा- साकी न मयकदे में मिला दिन गुजर गया, थोड़ा सा जो सुरूर था वह भी उतर गया। सलमान आगा जायसी ने पढ़ा- मंजिल की जुस्तजू में इधर और उधर गया, नाकामियों ने साथ न छोड़ा जिधर गया। आशिक रायबरेलवी ने कहा- आंखों से ऐसे कर्ब का मंजर गुजर गया, जख्मे जिगर पे जैसे कि नश्तर गुजर गया। अशोक श्रीवास्तव ने कहा- मंजिल थी सामने न उठे वक्त पर कदम, दिल से मेरे मलाल न ये उम्र भर गया।
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रमाकांत ने कहा- संदेश था यही कि सुनो हाशिये की भी, पत्थर बना के खुद को मैं शीशा नगर गया। शमसुद्दीन अजहर ने पढ़ा- इज्जत तो बस उसी की है जिसका वजूद है, पैमाना मयकदे में जो टूटा बिखर गया। रमजान अली सफीर ने कहा- मंजिल न पा सकेगा जमाने में वह कभी, दुश्वार रास्तों से अगर कोई डर गया। अबरार अहमद, राजेंद्र बहादुर सिंह, प्रदीप प्यारे, राघवेंद्र सिंह ने भी काव्यपाठ किया। संचालन सुधीर बेकस ने किया। इस मौके पर सत्यप्रकाश त्रिवेदी, अशेष बाजपेयी, अब्सार अहमद, अल्ताफ हुसैन, मो. नईम, मो. अहमद आदि उपस्थित रहे।
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कवि जय चक्रवर्ती ने कहा- वह कह रहा था लाएंगे हर सिम्त रोशनी, ये क्या हुआ कि और अंधेरा पसर गया। अध्यक्षता कर रहे उस्ताद शायर नाज प्रतापगढ़ी ने पढ़ा- कल इक फकीर बात यह कह कर गुजर गया, जिसका जमीर मर गया समझो वह मर गया। हसन अब्बास जायसी ने कहा- लगता है जैसे मुझको गुनहगार कर गया, तुझसे मिले बगैर दिसंबर गुजर गया। लईक अंसारी ने कहा- सूरज कभी हदों से जो अपनी गुजर गया, वह धूप बनके मुझपे गिरा और बिखर गया। आफाक सुल्तानपुरी ने पढ़ा- जिस रास्ते से मेरा पयंबर गुजर गया, उस रास्ते का बिगड़ा मुकद्दर संवर गया।
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शिव बहादुर सिंह दिलबर ने कहा- यह तब की बात है कि मैं आजाद जब रहा, दिल ने कहा जिधर को मैं दिलबर उधर गया। शब्बीर अहमद सूरी ने कहा- साकी न मयकदे में मिला दिन गुजर गया, थोड़ा सा जो सुरूर था वह भी उतर गया। सलमान आगा जायसी ने पढ़ा- मंजिल की जुस्तजू में इधर और उधर गया, नाकामियों ने साथ न छोड़ा जिधर गया। आशिक रायबरेलवी ने कहा- आंखों से ऐसे कर्ब का मंजर गुजर गया, जख्मे जिगर पे जैसे कि नश्तर गुजर गया। अशोक श्रीवास्तव ने कहा- मंजिल थी सामने न उठे वक्त पर कदम, दिल से मेरे मलाल न ये उम्र भर गया।
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रमाकांत ने कहा- संदेश था यही कि सुनो हाशिये की भी, पत्थर बना के खुद को मैं शीशा नगर गया। शमसुद्दीन अजहर ने पढ़ा- इज्जत तो बस उसी की है जिसका वजूद है, पैमाना मयकदे में जो टूटा बिखर गया। रमजान अली सफीर ने कहा- मंजिल न पा सकेगा जमाने में वह कभी, दुश्वार रास्तों से अगर कोई डर गया। अबरार अहमद, राजेंद्र बहादुर सिंह, प्रदीप प्यारे, राघवेंद्र सिंह ने भी काव्यपाठ किया। संचालन सुधीर बेकस ने किया। इस मौके पर सत्यप्रकाश त्रिवेदी, अशेष बाजपेयी, अब्सार अहमद, अल्ताफ हुसैन, मो. नईम, मो. अहमद आदि उपस्थित रहे।