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जांच को भेजा ही नहीं विसरा, इंतजार में बीत गए 17 साल

Tue, 03 Dec 2019 12:51 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 03 Dec 2019 12:51 AM IST
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The investigation did not send any viscera, 17 years passed in waiting
रायबरेली। एक पीड़ित परिवार विसरा रिपोर्ट का इंतजार 17 साल से कर रहा है, लेकिन अब तक उसके हाथ सिर्फ निराशा ही लगी हैं। खाकी की लापरवाही का आलम ये है कि जांच के लिए विसरा भेजा ही नहीं गया। बस पीड़िता को विसरा रिपोर्ट आज कल आने का ढांढस बंधाया जाता रहा। इस ढिलाई की वजह से विसरा भी कोतवाली में ही नष्ट हो गया।
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अब यह जवाब किसी के पास नहीं है कि विसरा रिपोर्ट नहीं आएगी तो पीड़ित परिवार को इंसाफ कैसे मिलेगा। महराजगंज कोतवाली क्षेत्र के बछरावां रोड निवासी कौशल्या देवी के पति रामशंकर दयाल की 26 दिसंबर 2002 को संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी। पीड़ित परिवार ने जहर देकर रामशंकर को मारने का आरोप लगाया था।
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शव का 27 दिसंबर 2002 को पोस्टमार्टम के बाद विसरा संरक्षित किया गया था, लेकिन जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला नहीं भेजा गया। पूर्व डीजीसी (फौजदारी) ओपी यादव के मुताबिक पीड़िता कौशल्या देवी ने 2 नवंबर 2018 को पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर विसरा जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला भिजवाने की मांग की थी, लेकिन अभी किसी प्रगति की जानकारी नहीं दी गई है।
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ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिले में खाकी ही पीड़ित परिवारों को इंसाफ दिलाने में सबसे बड़ी बाधा बन रही है। विसरा को जांच के लिए भेजने तक में ढिलाई बरतती है। गौरतलब है कि रायबरेली जिले में 21 बिसरा जांच के लिए लखनऊ भेजे गए हैं, जिनकी रिपोर्ट अब तक नहीं आई है।
पूर्व डीजीसी (फौजदारी) ओपी यादव का कहना है कि प्वॉइजनिंग के कारण मृृत्यु की आशंका होने पर पोस्टमार्टम के पश्चात विसरा जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजा जाता है, लेकिन रिपोर्ट समय से प्राप्त न होने के कारण किसी निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन हो जाता है। ऊपरी अदालतों व पुलिस अधिकारियों के स्पष्ट निर्देश के बावजूद विधि विज्ञान प्रयोगशाला से रिपोर्ट प्रेषित करने में विलंब होता है, जो कि उचित नहीं है। इससे न्याय प्रभावित होता है।
महराजगंज कोतवाल लालचंद्र सरोज का कहना है कि करीब छह महीने तक विसरा ठीक रहता है, लेकिन कौशल्या देवी के पति की मौत के बाद लिया गया विसरा काफी समय होने के कारण नष्ट हो गया। इसलिए जिला अस्पताल में भर्ती के दौरान उपलब्ध दस्तावेज के आधार पर इस मामले में कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही है। यह मामला उनके समय का नहीं है। काफी पुराना है।
जिला अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अल्ताफ हुसैन का कहना है कि विसरा जार (बोतल) में रखा जाता है। उनका कहना है कि यदि विसरा का रख रखाव ठीकठाक हो तो वह एक साल से अधिक समय तक सुरक्षित रहता है। खासकर विसरा को नमक के घोल में बराबर रूप से रहना चाहिए। इससे विसरा सुरक्षित रहता है।
सही मायने में पोस्टमार्टम करने के लिए फोरेंसिक मेडिसिन एक्सपर्ट होना चाहिए, लेकिन यहां पर ऐसी व्यवस्था नहीं है। जिला अस्पताल में तैनात ईएमओ और अन्य चिकित्सकों से पोस्टमार्टम कराने का कार्य लिया जाता है। खास बात ये है कि पोस्टमार्टम हाउस में दो प्राइवेट कर्मियों को रखा गया है।

पोस्टमार्टम करने में इन्हीं कर्मियों की अहम भूमिका होती है। कहा जाता है कि प्राइवेट कर्मियों की जानकारी पर डॉक्टर भरोसा करके अपनी रिपोर्ट लिख देते हैं। चिकित्सक हाई प्रोफाइल मामले में ही पोस्टमार्टम करने में सतर्कता बरते हैं। उधर, एसीएमओ डॉ. एसके चक का कहना है कि रायबरेली ही नहीं, अन्य कई जिलों में फोरेंसिक मेडिसिन एक्सपर्ट नहीं है। अन्य चिकित्सकों से ही पोस्टमार्टम कराने का कार्य लिया जाता है।
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