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Raebareli News: वन गमन की कथा सुन हुए भाव विभोर
Mon, 24 Aug 2026 01:52 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रायबरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, रायबरेली
Updated Mon, 24 Aug 2026 01:52 AM IST
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अमावां कस्बा स्थित श्री झारखंडेश्वर मंदिर परिसर में श्रीराम कथा सुनते लोग।
अमावां। कस्बा स्थित श्री झारखंडेश्वर धाम में चल रही श्रीराम कथा में रविवार को वृंदावन से आई कथा प्रवाचक वेदांतिका द्विवेदी ने श्रीराम वन गमन का प्रसंग सुनाया। कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करके लोगाें का मन मोहा। प्रवाचक ने कहा कि भगवान श्रीराम के वनवास की कथा रामायण का सबसे भावुक और महत्वपूर्ण मोड़ है, जहां से प्रभु श्रीराम के मर्यादा पुरुषोत्तम बनने की यात्रा शुरू होती है। कहा कि वन गमन के बाद श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम राम बन गए।
राजा दशरथ अपने सबसे बड़े पुत्र श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते थे। पूरी अयोध्या नगरी इस उत्सव के आनंद में डूबी हुई थी। इसी बीच रानी कैकेयी की दासी मंथरा ने उनके कान भरे। मंथरा ने कैकेयी को डराया कि यदि राम राजा बन गए, तो कैकेयी की स्थिति एक दासी जैसी हो जाएगी। उनके पुत्र भरत का अधिकार छीन लिया जाएगा।
मंथरा की बातों में आकर रानी कैकेयी कोपभवन में चली गईं। जब राजा दशरथ उन्हें मनाने आए, तो कैकेयी ने उनसे वे दो वरदान मांगे जो राजा ने बरसों पहले देवासुर संग्राम के समय देने का वादा किया था। पहला वरदान भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए। दूसरा वरदान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास दिया जाए। यह सुनते ही राजा दशरथ गहरे सदमे में चले गए।
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जब श्रीराम को कोपभवन में बुलाकर कैकेयी ने इन वरदानों के बारे में बताया, तो श्रीराम ने बिना किसी संकोच, क्रोध या दुख के हंसते हुए पिता के वचनों की मर्यादा रखने के लिए 14 वर्ष का वनवास सहर्ष स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि पिता की आज्ञा का पालन करना एक पुत्र का सबसे बड़ा धर्म है। जब श्रीराम वन जाने लगे, तो माता सीता और उनके छोटे भाई लक्ष्मण ने भी उनके साथ जाने की जिद की।
माता सीता ने कहा कि पति के बिना महल के सारे सुख उनके लिए व्यर्थ हैं और पत्नी का स्थान पति के साथ ही होता है। भाई लक्ष्मण ने श्रीराम को अपना सब कुछ माना और उनकी सेवा के लिए वन जाने का निश्चय किया। कथा सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। मौके पर श्रवण कुमार मिश्रा, अमर द्विवेदी मौजूद रहे।
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राजा दशरथ अपने सबसे बड़े पुत्र श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते थे। पूरी अयोध्या नगरी इस उत्सव के आनंद में डूबी हुई थी। इसी बीच रानी कैकेयी की दासी मंथरा ने उनके कान भरे। मंथरा ने कैकेयी को डराया कि यदि राम राजा बन गए, तो कैकेयी की स्थिति एक दासी जैसी हो जाएगी। उनके पुत्र भरत का अधिकार छीन लिया जाएगा।
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मंथरा की बातों में आकर रानी कैकेयी कोपभवन में चली गईं। जब राजा दशरथ उन्हें मनाने आए, तो कैकेयी ने उनसे वे दो वरदान मांगे जो राजा ने बरसों पहले देवासुर संग्राम के समय देने का वादा किया था। पहला वरदान भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए। दूसरा वरदान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास दिया जाए। यह सुनते ही राजा दशरथ गहरे सदमे में चले गए।
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जब श्रीराम को कोपभवन में बुलाकर कैकेयी ने इन वरदानों के बारे में बताया, तो श्रीराम ने बिना किसी संकोच, क्रोध या दुख के हंसते हुए पिता के वचनों की मर्यादा रखने के लिए 14 वर्ष का वनवास सहर्ष स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि पिता की आज्ञा का पालन करना एक पुत्र का सबसे बड़ा धर्म है। जब श्रीराम वन जाने लगे, तो माता सीता और उनके छोटे भाई लक्ष्मण ने भी उनके साथ जाने की जिद की।
माता सीता ने कहा कि पति के बिना महल के सारे सुख उनके लिए व्यर्थ हैं और पत्नी का स्थान पति के साथ ही होता है। भाई लक्ष्मण ने श्रीराम को अपना सब कुछ माना और उनकी सेवा के लिए वन जाने का निश्चय किया। कथा सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। मौके पर श्रवण कुमार मिश्रा, अमर द्विवेदी मौजूद रहे।