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आजादी का पर्व : दौलतपुर गांव में लड़ी गई थी लगान वसूली के खिलाफ लड़ाई
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ऊंचाहार (रायबरेली)। जब हिंदुस्तान गुलाम था तो अंग्रेज सैनिकों के आतंक से लोग परेशान थे। वे लगान वसूली के लिए गांववासियों पर कोड़े बरसाते थे। देश भर में किसान परेशान थे। इसे रोकने के लिए देश में जगह-जगह आंदोलन शुरू हो चुका था।
रायबरेली जनपद का ऊंचाहार ब्लॉक भी इससे अछूता नहीं था। लगान बंदी आंदोलन की लौ क्षेत्र के पनवारी मजरे दौलतपुर गांव में भी जल चुकी थी। किसानों ने लगान न देने की कसम खा ली थी। इसके लिए किसान कोई भी कुर्बानी देने को तैयार थे।
बात 13 जुलाई 1931 की है। लगान लेने दो अंग्रेज सिपाही गांव पहुंचे। किसानों को लगान देने के लिए कहा तो गांव के किसानों ने मना कर दिया। सिपाहियों ने दबाव बनाने की कोशिश की तो किसानों ने नारेबाजी शुरू कर दी।
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आक्रोशित फिरंगियों ने किसानों पर कोड़े बरसाने शुरू कर दिए। किसानों में अफरातफरी मच गई। इस दौरान खेत में जुताई कर रहे दो सगे भाई सीताराम व गयादीन ढाल बनकर सामने आ गए। गांव वालों पर कोड़ा बरसा रहे अंग्रेज सिपाहियों को ललकारा और लगान न देने की बात कही। आगबबूला फिरंगी दोनों भाइयों को कोड़े से पीटने को बढ़े, दोनों भाई मां भारती का जयकारा लगाते हुए भिड़ गए।
दोनों भाईयों ने बैल हांकने वाले चाबुक से अंग्रेजों की पिटाई शुरू कर दी। गोरो की चमड़ी उधड़ गई। वे जान बचाकर भागे और अधिकारियों को आपबीती सुनाई। थोड़ी देर बाद गांव में अंग्रेज सिपाहियों की गारद पहुंच गई।
इसके बावजूद भारत मां के वीर सपूत दोनों भाई सीना तान कर खड़े रहे। दोनों भाइयों की मार से सिपाहियों में खलबली मच गई। आखिरकार अंग्रेज सैनिकों ने दोनों भाइयों को गोली मारी दी। दोनों भाई वहीं शहीद हो गए। उनकी शहादत इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। जो युगों-युगों तक युवाओं को देशभक्ति की प्रेरणा देती रहेगी।
शहीद स्थल आज भी दिलाता है भाइयों की याद
लगान बंदी आंदोलन में मोर्चा लेने वाले दोनों भाइयों को जिस जगह गोली मारी गई, वहां शहीद स्थल बना हुआ है। वहां गांव के लोग प्रतिदिन पुष्प चढ़ाते हैं। क्षेत्र के लोगों को उनकी शहादत याद दिलाने के लिए गांव में स्मारक बनाया गया है। इस स्मारक पर हर वर्ष 10 जनवरी को श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाता है। स्थानीय प्रशासन के अधिकारी यहां आकर शहीद भाइयों को श्रद्धांजलि देते हैं। उनके परिवार की वर्तमान पीढ़ी के लोगों को सम्मानित किया जाता है। गांव के लोग अपनी पीढ़ी को दोनों भाइयों की शहादत की कहानी सुनाकर उनके जेहन में देशभक्ति का जज्बा पैदा करते हैं।
किसानों की जाती थी यातनाएं: रतीपाल शुक्ला
बौद्धिक विचार मंच के संयोजक रतीपाल शुक्ला ने बताया कि अंग्रेज जमींदारों को आगे कर किसानों का शोषण कर रहे थे। लगान न देने वाले किसानों को यातनाएं दी जा रही थी। पनवारी गांव में भी किसानों ने लगान न देने का संकल्प लिया था। लगान बंदी आंदोलन की लौ धीमी न पड़े, इसके लिए गांव के किसान कुर्बानी देने को तैयार थे। बस देशभक्ति का जुनून ही था, जो गयादीन वह सीताराम ने फिरंगियों खाल उधेड़ी और फिर अपनी शहादत देकर अमर हो गए। उन्होंने दोनों सगे भाइयों को श्रद्धांजलि भी दी।
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रायबरेली जनपद का ऊंचाहार ब्लॉक भी इससे अछूता नहीं था। लगान बंदी आंदोलन की लौ क्षेत्र के पनवारी मजरे दौलतपुर गांव में भी जल चुकी थी। किसानों ने लगान न देने की कसम खा ली थी। इसके लिए किसान कोई भी कुर्बानी देने को तैयार थे।
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बात 13 जुलाई 1931 की है। लगान लेने दो अंग्रेज सिपाही गांव पहुंचे। किसानों को लगान देने के लिए कहा तो गांव के किसानों ने मना कर दिया। सिपाहियों ने दबाव बनाने की कोशिश की तो किसानों ने नारेबाजी शुरू कर दी।
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आक्रोशित फिरंगियों ने किसानों पर कोड़े बरसाने शुरू कर दिए। किसानों में अफरातफरी मच गई। इस दौरान खेत में जुताई कर रहे दो सगे भाई सीताराम व गयादीन ढाल बनकर सामने आ गए। गांव वालों पर कोड़ा बरसा रहे अंग्रेज सिपाहियों को ललकारा और लगान न देने की बात कही। आगबबूला फिरंगी दोनों भाइयों को कोड़े से पीटने को बढ़े, दोनों भाई मां भारती का जयकारा लगाते हुए भिड़ गए।
दोनों भाईयों ने बैल हांकने वाले चाबुक से अंग्रेजों की पिटाई शुरू कर दी। गोरो की चमड़ी उधड़ गई। वे जान बचाकर भागे और अधिकारियों को आपबीती सुनाई। थोड़ी देर बाद गांव में अंग्रेज सिपाहियों की गारद पहुंच गई।
इसके बावजूद भारत मां के वीर सपूत दोनों भाई सीना तान कर खड़े रहे। दोनों भाइयों की मार से सिपाहियों में खलबली मच गई। आखिरकार अंग्रेज सैनिकों ने दोनों भाइयों को गोली मारी दी। दोनों भाई वहीं शहीद हो गए। उनकी शहादत इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। जो युगों-युगों तक युवाओं को देशभक्ति की प्रेरणा देती रहेगी।
शहीद स्थल आज भी दिलाता है भाइयों की याद
लगान बंदी आंदोलन में मोर्चा लेने वाले दोनों भाइयों को जिस जगह गोली मारी गई, वहां शहीद स्थल बना हुआ है। वहां गांव के लोग प्रतिदिन पुष्प चढ़ाते हैं। क्षेत्र के लोगों को उनकी शहादत याद दिलाने के लिए गांव में स्मारक बनाया गया है। इस स्मारक पर हर वर्ष 10 जनवरी को श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाता है। स्थानीय प्रशासन के अधिकारी यहां आकर शहीद भाइयों को श्रद्धांजलि देते हैं। उनके परिवार की वर्तमान पीढ़ी के लोगों को सम्मानित किया जाता है। गांव के लोग अपनी पीढ़ी को दोनों भाइयों की शहादत की कहानी सुनाकर उनके जेहन में देशभक्ति का जज्बा पैदा करते हैं।
किसानों की जाती थी यातनाएं: रतीपाल शुक्ला
बौद्धिक विचार मंच के संयोजक रतीपाल शुक्ला ने बताया कि अंग्रेज जमींदारों को आगे कर किसानों का शोषण कर रहे थे। लगान न देने वाले किसानों को यातनाएं दी जा रही थी। पनवारी गांव में भी किसानों ने लगान न देने का संकल्प लिया था। लगान बंदी आंदोलन की लौ धीमी न पड़े, इसके लिए गांव के किसान कुर्बानी देने को तैयार थे। बस देशभक्ति का जुनून ही था, जो गयादीन वह सीताराम ने फिरंगियों खाल उधेड़ी और फिर अपनी शहादत देकर अमर हो गए। उन्होंने दोनों सगे भाइयों को श्रद्धांजलि भी दी।