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संशोधित.........
Updated Wed, 26 Jul 2017 01:19 AM IST
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शहीद राजेंद्र के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गए थे दुश्मन
रायबरेली। पाकिस्तानी सेना को धूल चटाकर देश की खातिर मर मिटने वाले शहीद राजेंद्र यादव की याद आज भी हर जिलेवासी की जुबां पर है। शहीद राजेंद्र यादव ने कारगिल युद्ध के दौरान दुर्गम पहाड़ियों पर देश के लिए अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी थी। जीत हासिल होने की बारी आई तो वह भारत माता की आंचल में सदा के लिए सो गए। लेकिन आज भी शहीद परिवार का उपेक्षा का शिकार है। परिवार की व्यथा सुनने को कौन कहे, जो वादे किए गए थे, वह अब तक पूरे नहीं हो पाए।
डलमऊ तहसील क्षेत्र के एक छोटे से गांव मुतवल्लीपुर में जन्में राजेंद्र यादव ने कारगिल युद्ध में अपनी वीरता का लोहा मनवाया था। वर्ष 1984 में थल सेना की कुमाऊं रेजीमेंट में सिपाही से भर्ती हुए राजेंद्र यादव ने अपनी काबिलियत और वीरता के दम पर जल्द ही नायक बना दिए गए थे। कारगिल की तुर्तुब सीमा की चौथी पहाड़ी पर दुश्मनों के मंसूबों को विफल करते हुए शहीद हो गए थे। शहीद के परिवार के लिए जो वादे किए गए थे, वह आज पूरे नहीं हो पाए। राजेंद्र की यादों को संजोने के लिए न तो मिनी स्टेडियम बन पाया और न ही मुराईबाग चौराहे पर उनकी मूर्ति लग पाई। जमीन देने की बात कही गई थी, जो पूरी नहीं हो पाई।
ललिता को अपने पति की शहादत पर गर्व
ललिता देवी को जहां पति की शहादत पर गर्व है, वहीं राजेंद्र को याद करते ही रो पड़ती हैं। शहर के राजकीय कॉलोनी में परिवार के साथ रहने वाली ललिता देवी कहती हैं कि देश की खातिर वे मर मिटे, इसका गर्व है। हर किसी को अपने देश के लिए ऐसा करना चाहिए। देश होगा तो तभी हम रहेंगे। पर उन्होंने इस बात का दुख है कि जो वादे किए गए थे वे पूरे नहीं हो पाए। उनके पास जमीन नहीं है। पांच बीघे जमीन देने की बात कही गई थी, जो नहीं मिल पाई। शहीद के दो बेटे अतुल व रजत ओर एक बेटी अनीता है। इसमें अतुल मर्चेट नेवी में है, जबकि रजत बछरावां डिग्री कॉलेज में बीकॉम द्वितीय वर्ष का छात्र है। वहीं बेटी अनीता यादव कालाकांकर से एमकॉम कर रही है। बच्चों को भी अपने पिता की शहादत पर गर्व है।
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भर आई मां की आंखें
शहीद बेटे राजेंद्र को याद करके मां सुंदारा देवी की आंखें भर आई। कहती हैं कि प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा शहीद के परिवार के भरण पोषण आदि के लिए किए गए वादे हवा-हवाई साबित हुई हैं। जहां एक और राजस्व विभाग के आला अधिकारियों को शहीद परिवार के नाम कृषि भूमि दिलाने कि कोरे वादे हैं, वही पैतृक गांव तक जाने वाली सड़क आज भी बदहाल पड़ी है। गांव में राजेंद्र यादव की तरह अन्य क्षेत्रीय नौजवानों के लिए देश की रक्षा के लिए स्वयं को तैयार करने के लिए मिनी स्टेडियम खोले जाने की घोषणा से अधिकारी बेसुध हो गए हैं। राजेंद्र के भाई रामदेव, जगदीश और उनके परिवार के लोगों का कहना है कि सेना में जाकर देश सेवा करन अच्छा लगता है, लेकिन उपेक्षा से कष्ट होता है।
देश की खातिर मर मिटने का था सभी में जज्बा
महिला जिला चिकित्सालय में तैनात वरिष्ठ डॉ. राजीव कुमार दीक्षित आज भी कारगिल युद्ध को नहीं भूले हैं। जिस समय कारगिल युद्ध हो रहा था, उस समय राजीव कुमार श्रीनगर स्थित सेना के अस्पताल में तैनात थे। कहते हैं कि एक के बाद एक घायल जवान आ रहे थे। हम लोग उन्हें बचाने की कोशिश कररहे थे। कई दिन तक सो नहीं पाए थे, लेकिन देश की खातिर कार्य करने का एक जज्बा था, जो डिगा नहीं। कहते हैं कि अस्पताल में जो जवान घायल होकरआते थे, उन्हें दर्द तो था। पर उनकी जुबान पर यही शब्द रहते थे कि जल्दी ठीक करो। हम लड़ने जाएंगे। पाकिस्तान को सबक सिखाना है। उन्होंने कई जवानों की इलाज करके जान बचाई। सभी में देश की खातिर मर मिटने का जज्बा था। वर्ष 2003 में राजीव कुमार दीक्षित सेना से रिटायर्ड हो गए। इस समय वे अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
हर किसी में जगे देश प्रेम की अलख
जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास अधिकारी एसके पांडेय कहते हैं कि आज सेना की वजह से हम सुरक्षित हैं। कारगिल युद्ध के शहीदों की शहादत पर हम सबको गर्व है। हर किसी में देश प्रेम की अलख होनी चाहिए। युवा पीढ़ी से आह्वान है कि वे देश हित में कार्य करें। इसके लिए जान भी देनी पडे़ तो पीछे न हटें। आज देश की सेना पहले से मजबूत हो गई। चीन भी भारत की सेना से घबरा गया है। खीरों क्षेत्र के रहने वाले रिटायर्ड फौैजी जितेंद्र सिंह, चंदनलाल यादव और रामनिवास कहते हैं कि देश की सुरक्षा के लिए सभी को तैयार रहना चाहिए। देश की भलाई के लिए सबको कार्य करना चाहिए। हम सब शहीद जवानों पर गर्व महसूस करते हैं।
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रायबरेली। पाकिस्तानी सेना को धूल चटाकर देश की खातिर मर मिटने वाले शहीद राजेंद्र यादव की याद आज भी हर जिलेवासी की जुबां पर है। शहीद राजेंद्र यादव ने कारगिल युद्ध के दौरान दुर्गम पहाड़ियों पर देश के लिए अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी थी। जीत हासिल होने की बारी आई तो वह भारत माता की आंचल में सदा के लिए सो गए। लेकिन आज भी शहीद परिवार का उपेक्षा का शिकार है। परिवार की व्यथा सुनने को कौन कहे, जो वादे किए गए थे, वह अब तक पूरे नहीं हो पाए।
डलमऊ तहसील क्षेत्र के एक छोटे से गांव मुतवल्लीपुर में जन्में राजेंद्र यादव ने कारगिल युद्ध में अपनी वीरता का लोहा मनवाया था। वर्ष 1984 में थल सेना की कुमाऊं रेजीमेंट में सिपाही से भर्ती हुए राजेंद्र यादव ने अपनी काबिलियत और वीरता के दम पर जल्द ही नायक बना दिए गए थे। कारगिल की तुर्तुब सीमा की चौथी पहाड़ी पर दुश्मनों के मंसूबों को विफल करते हुए शहीद हो गए थे। शहीद के परिवार के लिए जो वादे किए गए थे, वह आज पूरे नहीं हो पाए। राजेंद्र की यादों को संजोने के लिए न तो मिनी स्टेडियम बन पाया और न ही मुराईबाग चौराहे पर उनकी मूर्ति लग पाई। जमीन देने की बात कही गई थी, जो पूरी नहीं हो पाई।
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ललिता को अपने पति की शहादत पर गर्व
ललिता देवी को जहां पति की शहादत पर गर्व है, वहीं राजेंद्र को याद करते ही रो पड़ती हैं। शहर के राजकीय कॉलोनी में परिवार के साथ रहने वाली ललिता देवी कहती हैं कि देश की खातिर वे मर मिटे, इसका गर्व है। हर किसी को अपने देश के लिए ऐसा करना चाहिए। देश होगा तो तभी हम रहेंगे। पर उन्होंने इस बात का दुख है कि जो वादे किए गए थे वे पूरे नहीं हो पाए। उनके पास जमीन नहीं है। पांच बीघे जमीन देने की बात कही गई थी, जो नहीं मिल पाई। शहीद के दो बेटे अतुल व रजत ओर एक बेटी अनीता है। इसमें अतुल मर्चेट नेवी में है, जबकि रजत बछरावां डिग्री कॉलेज में बीकॉम द्वितीय वर्ष का छात्र है। वहीं बेटी अनीता यादव कालाकांकर से एमकॉम कर रही है। बच्चों को भी अपने पिता की शहादत पर गर्व है।
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भर आई मां की आंखें
शहीद बेटे राजेंद्र को याद करके मां सुंदारा देवी की आंखें भर आई। कहती हैं कि प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा शहीद के परिवार के भरण पोषण आदि के लिए किए गए वादे हवा-हवाई साबित हुई हैं। जहां एक और राजस्व विभाग के आला अधिकारियों को शहीद परिवार के नाम कृषि भूमि दिलाने कि कोरे वादे हैं, वही पैतृक गांव तक जाने वाली सड़क आज भी बदहाल पड़ी है। गांव में राजेंद्र यादव की तरह अन्य क्षेत्रीय नौजवानों के लिए देश की रक्षा के लिए स्वयं को तैयार करने के लिए मिनी स्टेडियम खोले जाने की घोषणा से अधिकारी बेसुध हो गए हैं। राजेंद्र के भाई रामदेव, जगदीश और उनके परिवार के लोगों का कहना है कि सेना में जाकर देश सेवा करन अच्छा लगता है, लेकिन उपेक्षा से कष्ट होता है।
देश की खातिर मर मिटने का था सभी में जज्बा
महिला जिला चिकित्सालय में तैनात वरिष्ठ डॉ. राजीव कुमार दीक्षित आज भी कारगिल युद्ध को नहीं भूले हैं। जिस समय कारगिल युद्ध हो रहा था, उस समय राजीव कुमार श्रीनगर स्थित सेना के अस्पताल में तैनात थे। कहते हैं कि एक के बाद एक घायल जवान आ रहे थे। हम लोग उन्हें बचाने की कोशिश कररहे थे। कई दिन तक सो नहीं पाए थे, लेकिन देश की खातिर कार्य करने का एक जज्बा था, जो डिगा नहीं। कहते हैं कि अस्पताल में जो जवान घायल होकरआते थे, उन्हें दर्द तो था। पर उनकी जुबान पर यही शब्द रहते थे कि जल्दी ठीक करो। हम लड़ने जाएंगे। पाकिस्तान को सबक सिखाना है। उन्होंने कई जवानों की इलाज करके जान बचाई। सभी में देश की खातिर मर मिटने का जज्बा था। वर्ष 2003 में राजीव कुमार दीक्षित सेना से रिटायर्ड हो गए। इस समय वे अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
हर किसी में जगे देश प्रेम की अलख
जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास अधिकारी एसके पांडेय कहते हैं कि आज सेना की वजह से हम सुरक्षित हैं। कारगिल युद्ध के शहीदों की शहादत पर हम सबको गर्व है। हर किसी में देश प्रेम की अलख होनी चाहिए। युवा पीढ़ी से आह्वान है कि वे देश हित में कार्य करें। इसके लिए जान भी देनी पडे़ तो पीछे न हटें। आज देश की सेना पहले से मजबूत हो गई। चीन भी भारत की सेना से घबरा गया है। खीरों क्षेत्र के रहने वाले रिटायर्ड फौैजी जितेंद्र सिंह, चंदनलाल यादव और रामनिवास कहते हैं कि देश की सुरक्षा के लिए सभी को तैयार रहना चाहिए। देश की भलाई के लिए सबको कार्य करना चाहिए। हम सब शहीद जवानों पर गर्व महसूस करते हैं।