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मुजफ्फरनगर में किसानों का बवाल
अमर उजाला, दिल्ली
Updated Thu, 05 Dec 2013 03:23 PM IST
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उत्तर प्रदेश में गन्ने की कम कीमत को लेकर किसान सड़कों पर उतर आए हैं। इसका खामियाजा दिल्ली-देहरादून हाइवे को उठाना पड़ रहा है, जहां उन्होंने जाम लगा दिया है।
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भारतीय किसान यूनियन के तहत जारी विरोध प्रदर्शन में मुजफ्फरनगर में रेलगाड़ी रोक दी गई है। किसान गन्ने का मूल्य बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।
गन्ना पेराई शुरू कराने के लिए न तो वक्त रहते बातचीत शुरू की और न ही कार्रवाई की। इस ढील का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है।
एक और गन्ना किसान ने की खुदकुशी, क्या होगा आगे?
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सवाल उठा रहा है कि जो कदम अब उठाए गए हैं वह एक महीना पहले भी उठाए जा सकते थे। फिर क्यों लाखों किसानों को कोल्हू-क्रेशरों पर लुटने दिया? क्यों गेहूं की बुवाई में देरी कराई? पूरे देश को मिठास देने वाले प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए पेराई सत्र 2013-14 कड़वाहट लेकर आया।
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आमतौर पर अक्तूबर के आखिरी सप्ताह से नवंबर मध्य तक अधिकतर सभी चीनी मिलें पेराई शुरू कर देती हैं। इस बार पेराई सत्र में लगभग एक माह की देरी से गन्ना किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ है। दरअसल, गन्ना विभाग और सरकार ने गन्ना किसानों की दिक्कतों को शुरू से ही गंभीरता से नहीं लिया।
यूं कहें कि शुगर लॉबी शुरू से ही सरकार पर दबाव बनाने में कामयाब रही। चीनी मिलों ने तो अगस्त महीने में ही अल्टीमेटम दे दिया था कि मनमाफिक रेट या सरकारी पैकेज नहीं मिला तो मिलें नहीं चलाएंगे। लेकिन तीन माह तक सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। वार्ताओं के दौर भी नवंबर माह के आखिर में शुरू किए गए।
सरकार के रुख का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाईकोर्ट की लखनऊ खंठपीठ ने चार जुलाई को आदेश दिया कि छह सप्ताह में किसानों को बकाया गन्ना मूल्य भुगतान दिलाया जाए। इस आदेश के अनुपालन में गन्ना विभाग ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई।
मिलों की आरसी जारी करने का जो काम 30 नवंबर को किया गया, यदि वह हाईकोर्ट के आदेश के बाद किया जाता तो शायद स्थिति अलग होगी। चीनी का रेट पिछले साल की तुलना में गिरा है, मिलों को रियायतें दी जा सकती थीं लेकिन इसके लिए किसानों को पिसने की सजा देने का इंतजार किसलिए।
बकाया भुगतान न मिलने और मिलों के चलने में देरी से किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ा, प्रदेश भर में आंदोलन हुए, गन्ने की फसल जली, पशुओं को चारे के लिए तरसना पड़ा और हजारों हेक्टेयर जमीन में गेहूं की बुवाई न होने से किसानों को दोहरा नुकसान उठाना पड़ा है।