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Pratapgarh News: पंचायतों में महिलाओं को कमान तो मिली, पर कामकाज संभाल रहे पुरुष
Wed, 29 Nov 2023 08:58 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रतापगढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रतापगढ़
Updated Wed, 29 Nov 2023 08:58 PM IST
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पंचायतों में महिलाओं को अधिकार और आरक्षण तो मिला पर काम करने की आजादी अब तक नहीं मिल सकी है। गांव की सरकार में अधिकतर महिला जन प्रतिनिधियों की बागडोर उनके परिवार के पुरुषों के हाथ में है। ऐसे में न तो उन्हें फैसले लेने की आजादी, न ही दफ्तरों तक जाने की छूट है। जिले में 1148 ग्राम पंचायतों में 468 महिला प्रधान हैं, किंतु ब्लॉक और जिले की बैठकों में गिनी-चुनी महिला प्रधान ही दिखाई देती हैं।
जिले की 1148 ग्राम पंचायतों में 468 महिला प्रधान हैं, जबकि 1825 क्षेत्र पंचायत सदस्यों में 718 महिला बीडीसी और जिला पंचायत की 52 सीटों में 18 महिलाएं जिला पंचायत सदस्य हैं। ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत की बैठकों में महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर पुरुष प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
मुहर लगाने के साथ ही जिले की अधिकतर महिला प्रधानों की दस्तखत भी पुरुष ही करते हैं। जिले में कई ग्राम पंचायतें ऐसी भी हैं, जहां अनुसूचित और पिछड़ी जाति की महिलाएं हैं, ऐसे में गांव का दबंग ही प्रधान बना बैठा है। यही नहीं प्रधान का फर्जी दस्तखत बनाकर दबंग खाते का संचालन तक कर रहे हैं। बैंक अफसरों को जानकारी होने के बाद भी कोई पहल नहीं हुई है।
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इनसेट-- -- -- -
जिले में कुल ग्राम प्रधानों की संख्या-1148
महिला प्रधानों की संख्या-468
इनसेट-- -- -- -- -
23 वर्ष पुराना शासनादेश, मगर नहीं होता है अमल
शासन ने 10 मार्च 1993 को जिलाधिकारियों और मंडलायुक्तों को पत्र लिखकर कहा था कि दफ्तरों में महिला प्रधानों के साथ उनके पति या परिवारीजनों का आना रोका जाए। बैठकों में महिला प्रतिनिधियों को ही बुलाया जाय, मगर ऐसा नहीं हो रहा है।
इनसेट-- -- -- -- --
सीडीओ ने पुरुष प्रतिनिधियों के शामिल होने पर लगाई थी पाबंदी
जिला पंचायत की बैठक में महिला प्रतिनिधियों के रुप में पुरुषों के बैठक में शामिल होने को लेकर हंगामा करने के बाद तत्कालीन सीडीओ ने महिला जिला पंचायत सदस्यों के स्थान पर आने वाले पुरुषों को बाहर कर दिया था। मगर यह व्यवस्था दो-तीन बैठकों के बाद ही खत्म हो गई। आलम यह है कि जिला पंचायत की बैठकों में गिनी-चुनी महिला सदस्य ही आती हैं।
-- -- -- -- -- -- --
इन गांवों में महिला प्रधान, फिर भी पु्रुष चला रहे सरकार
0 कुंडा ब्लॉक के लौंदा ग्राम पंचायत की प्रधान शालिनी देवी हैं, मगर यह जिम्मेदारी उनके जेठ धीरेंद्र सिंह चला रहे हैं। ग्राम पंचायत सदस्य महेंद्र द्विवेदी ने बताया कि ग्राम पंचायत की बैठक हो या विकास कार्यो का प्रस्ताव तैयार करना हो, सारा कार्य प्रधान के जेठ ही देखते हैं। इससे महिला प्रधान को घर से बाहर निकलने का मौका नहीं मिलता है।
0 सांगीपुर विकास खंड के दौलतपुर गांव की प्रधान ऊषा देवी हैं। ग्राम पंचायत सदस्य उस्मान का आरोप है कि प्रधान कभी घर से बाहर नहीं निकलती हैं, उनके पति गणेश सिंह प्रधानी का सारा कार्य देखते हैं। ग्राम पंचायत से ब्लॉक और जिले की जिम्मेदारी निभाते हैं।
0 बेलखरनाथधाम ब्लॉक के बिबियाकरनपुर की प्रधान श्यामादेवी हैं मगर प्रधानी उनके बेटे कपिलेश्वर उर्फ पिंटू देखते हैं। गांव के ही सुरेंद्र कुमार शुक्ल का आरोप है कि महिला प्रधान कभी भी ब्लॉक में नहीं आती हैं। बैठकों में उनके पुत्र शामिल होकर उनकी दस्तखत बना देते हैं।
0 गौरा ब्लॉक के बेहदौल खुर्द गांव में रीना प्रधान हैं, मगर कामकाज उनके पति शिव शंकर संभालते हैं। पटहटिया कला गांव की प्रधान सोनिका देवी हैं लेकिन पूरा काम उनके पति घनश्याम देखते हैं। यही नहीं वह प्रधान संघ के अध्यक्ष भी बने हुए हैं।
वर्जन-- -- -- -- --
ग्राम पंचायत की बैठक चुनी हुई महिला प्रतिनिधियों की मौजूदगी में ही कराने को कहा गया है। शासन ने पत्र जारी करके प्रधान प्रतिनिधि पर पूरी तरह रोक लगा रखी है।
आलोक कुमार सिन्हा, डीपीआरओ
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जिले की 1148 ग्राम पंचायतों में 468 महिला प्रधान हैं, जबकि 1825 क्षेत्र पंचायत सदस्यों में 718 महिला बीडीसी और जिला पंचायत की 52 सीटों में 18 महिलाएं जिला पंचायत सदस्य हैं। ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत की बैठकों में महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर पुरुष प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
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मुहर लगाने के साथ ही जिले की अधिकतर महिला प्रधानों की दस्तखत भी पुरुष ही करते हैं। जिले में कई ग्राम पंचायतें ऐसी भी हैं, जहां अनुसूचित और पिछड़ी जाति की महिलाएं हैं, ऐसे में गांव का दबंग ही प्रधान बना बैठा है। यही नहीं प्रधान का फर्जी दस्तखत बनाकर दबंग खाते का संचालन तक कर रहे हैं। बैंक अफसरों को जानकारी होने के बाद भी कोई पहल नहीं हुई है।
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जिले में कुल ग्राम प्रधानों की संख्या-1148
महिला प्रधानों की संख्या-468
इनसेट
23 वर्ष पुराना शासनादेश, मगर नहीं होता है अमल
शासन ने 10 मार्च 1993 को जिलाधिकारियों और मंडलायुक्तों को पत्र लिखकर कहा था कि दफ्तरों में महिला प्रधानों के साथ उनके पति या परिवारीजनों का आना रोका जाए। बैठकों में महिला प्रतिनिधियों को ही बुलाया जाय, मगर ऐसा नहीं हो रहा है।
इनसेट
सीडीओ ने पुरुष प्रतिनिधियों के शामिल होने पर लगाई थी पाबंदी
जिला पंचायत की बैठक में महिला प्रतिनिधियों के रुप में पुरुषों के बैठक में शामिल होने को लेकर हंगामा करने के बाद तत्कालीन सीडीओ ने महिला जिला पंचायत सदस्यों के स्थान पर आने वाले पुरुषों को बाहर कर दिया था। मगर यह व्यवस्था दो-तीन बैठकों के बाद ही खत्म हो गई। आलम यह है कि जिला पंचायत की बैठकों में गिनी-चुनी महिला सदस्य ही आती हैं।
इन गांवों में महिला प्रधान, फिर भी पु्रुष चला रहे सरकार
0 कुंडा ब्लॉक के लौंदा ग्राम पंचायत की प्रधान शालिनी देवी हैं, मगर यह जिम्मेदारी उनके जेठ धीरेंद्र सिंह चला रहे हैं। ग्राम पंचायत सदस्य महेंद्र द्विवेदी ने बताया कि ग्राम पंचायत की बैठक हो या विकास कार्यो का प्रस्ताव तैयार करना हो, सारा कार्य प्रधान के जेठ ही देखते हैं। इससे महिला प्रधान को घर से बाहर निकलने का मौका नहीं मिलता है।
0 सांगीपुर विकास खंड के दौलतपुर गांव की प्रधान ऊषा देवी हैं। ग्राम पंचायत सदस्य उस्मान का आरोप है कि प्रधान कभी घर से बाहर नहीं निकलती हैं, उनके पति गणेश सिंह प्रधानी का सारा कार्य देखते हैं। ग्राम पंचायत से ब्लॉक और जिले की जिम्मेदारी निभाते हैं।
0 बेलखरनाथधाम ब्लॉक के बिबियाकरनपुर की प्रधान श्यामादेवी हैं मगर प्रधानी उनके बेटे कपिलेश्वर उर्फ पिंटू देखते हैं। गांव के ही सुरेंद्र कुमार शुक्ल का आरोप है कि महिला प्रधान कभी भी ब्लॉक में नहीं आती हैं। बैठकों में उनके पुत्र शामिल होकर उनकी दस्तखत बना देते हैं।
0 गौरा ब्लॉक के बेहदौल खुर्द गांव में रीना प्रधान हैं, मगर कामकाज उनके पति शिव शंकर संभालते हैं। पटहटिया कला गांव की प्रधान सोनिका देवी हैं लेकिन पूरा काम उनके पति घनश्याम देखते हैं। यही नहीं वह प्रधान संघ के अध्यक्ष भी बने हुए हैं।
वर्जन
ग्राम पंचायत की बैठक चुनी हुई महिला प्रतिनिधियों की मौजूदगी में ही कराने को कहा गया है। शासन ने पत्र जारी करके प्रधान प्रतिनिधि पर पूरी तरह रोक लगा रखी है।
आलोक कुमार सिन्हा, डीपीआरओ