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कभी नहीं भूलेंगे यह दर्द
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we will never forget this pian
- फोटो : PRATAPGARH
मुंबई, दिल्ली, गुजरात से निकले मजदूर तमाम दुश्वारियों और मुश्किलों से लड़ते हुए घर पहुंचने के लिए तपती दोपहरी में जद्दोजहद कर रहे हैं। सिर पर गठरी, कंधे पर बच्चों का बोझ और पैरों में छाले पड़ गए हैं, लेकिन उनकी हिम्मत बनी हुई है। कपड़े पसीने से तरबतर है। सफर की थकावट से शरीर जवाब दे रहा है। घर पहुंचने की ललक में
वह सारे दर्द भूल चुके हैं। हाइवे पर मजदूर पैदल ही चले जा रहे थे। कुछ प्रवासी मजदूरों को ट्रक वालों ने रास्ते में धोखा दे दिया। फिर भी घर जाने की जिद ठान रखी है। शनिवार को मुंबई, गुजरात, दिल्ली से आने वाले प्रवासी मजदूरों का दर्द अमर उजाला की टीम ने अयोध्या-प्रयागराज व लखनऊ-वाराणसी राजमार्ग पर नजदीक से देखा। हालांकि शनिवार को राहत की बात यह रही कि औरेया में हुए हादसे के बाद मुख्यमंत्री की सख्ती को देखते हुए पुलिसकर्मी मजदूरों को वाहनों पर बैठाकर उनके घरों तक पहुंचाने का इंतजाम करते दिखे।
जिले के रानीगंज कैथौला के उमेश कुमार मुंबई में रहता था। करीब दस दिन के झंझावत के बाद वह श्रमिक स्पेशल ट्रेन से अपने घर पहुंचा। वह अपने दो मासूम बच्चों के साथ पत्नी को लेकर पैदल ही कटरामेदनीगंज चौराहे पर पहुंचा। पूछने पर बोला कि क्या करूं भाई साहब, पापी पेट का सवाल है। राहत मिलने के बाद फिर मुंबई जाना ही पड़ेगा। ताकि परिवार का गुजर बसर कर सकूं। तभी पांच साल की मासूम बेटी विद्या बोल पड़ी, नाही पापा अब हम बंबई न जाब। यह सुन उसका पिता भी निरुत्तर हो गया।
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गुजरात के वापी से चार दिन पहले ट्रक पकड़कर घर के लिए निकले अमेठी के पीपरपुर निवासी सुशील कुमार पत्नी काजल के साथ आ रहे थे। भुपियामऊ में ट्रक ने उतार दिया। इसके बाद पैदल ही घर के लिए चल पड़े। पुलिस चौकी के करीब मासूम बेटी खुशी को भूख लगी। उसकी भूख काजल से बर्दाश्त नहीं हुई। वह कुछ दूर स्थित हैंडपंप की ओर गई। दूध की बोतल में पानी भरा और उसे लाकर बेटी खुशी को थमा दिया। दूध की बोतल पकड़ते ही वह पीने लगी। कुछ देर बोतल को मुंह से लगाती और पिर निकाल देती। हालांकि परिवार के लोग उसे लेने के लिए आ रहे थे। सुशील बोला कि रास्ते में मजदूरों से लदे वाहन दुर्घटनाग्रस्त दिखे थे। कई हृदयविदारक घटनाएं देखते हुए निकले। जिंदा रहने तक घर पहुंचने की लोगों ने जिद ठान रखी है। साथ मौजूद लक्ष्मण बोला कि वहां क्या करता। पुलिस की लाठी खानी पड़ रही थी। ऐसे में घर ही बेहतर है।
बिहार प्रांत के अररिया जनपद के रहने वाले विसंजय पटवा, पप्पू समेत दस मजदूर रायबरेली जनपद में रेलवे के ठेकों पर काम करते थे। लाकडाउन के बाद काम बंद हो गया। खाने पीने की समस्या सामने आने लगी। संक्रमित मरीजों के मिलने का सिलसिला भी तेज हो गया। ऐसे में सूरत से सभी पैदल ही घर के लिए चल पड़े। सामान की पोटली सिर पर रखे हुए सभी पैदल ही भुपियामऊ तक पहुंचे थे। इस इंतजार में बैठे थे कि शायद चौराहे से वाराणसी जाने के लिए कोई वाहन मिल जाए। पप्पू ने बताया कि वाहन मिलता है तो ठीक है। नहीं तो पैदल ही घर जाएंगे। अब उन्हें कोई रोक नहीं सकता। भूखों मरने से तो बेहतर है कि पैदल चलकर ही मर जाएं। ताकि उनका शरीर घर तक पहुंच जाए।
अयोध्या के पालीटेक्निक चौराहा निवासी अनूप सिंह अपने परिवार के साथ गुजरात के वापी शहर में रहते थे। वहां टेंपो चलाकर परिवार का गुजर-बसर करते थे। लाकडाउन में उनके सामने भी समस्याएं आ खड़ी हुईं। शुरुआती दौर में व्यवस्था कुछ दिनों में सामान्य होने की अनूप सिंह को उम्मीद थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। नतीजा पांच दिन पहले अपना टेंपो निकाला। बच्चों के साथ जिले के ही चार लोगों को और बैठा लिया। फिर घर के लिए कूच कर दिया। रास्ते में मजदूरों से भरे वाहन दुर्घटनाग्रस्त नजर आए। कई लोग खून से लथपथ भी दिखे। फिर भी हौसला नहीं डिगा। ईश्वर का नाम लेकर सफर जारी रखा। भुपियामऊ में आराम करने के लिए रुके अनूप सिंह ने बताया कि अब तो दूरी भी 150 किमी के करीब रह गई है। देर रात तक घर पहुंच जाऊंगा, लेकिन यह सफर व समय जिंदगी भर याद रहेगा।
प्रयागराज जनपद के नैनी निवासी अमृत कुमार अपनी मां संतोषा देवी के साथ अयोध्या में रहकर मजदूरी करता था। अमृतक के मासूम बेटा व एक बेटी की परवरिश उसकी मां करती थी। पत्नी के साथ न होने के कारण परिवार की देखभाल भी संतोषा के जिम्मे ही थी। शनिवार को मां-बेटे दोनों बच्चों व सामान का बोझ कंधों पर टांगकर घर पैदल ही चले जा रहे थे। कुसमी के करीब मिले मां-बेटे बोले कि कोई वाहन नहीं मिला। पैदल ही घर जा रहे हैं। चिलचिलाती धूप में बच्चों को बार-बार प्यास सता रही थी। फिर भी घर पहुंचने की जिद दोनों ने ठान रखी थी। वाहन का इंतजार करने से अच्छा पैदल चलते रहना ही मुनासिब समझ रहे थे।
जिले में पैदल आने वाले प्रवासी मजदूरों को दुर्घटना से बचाने के लिए सीमा पर ही रोका जाता रहा। सभी की थर्मल स्क्रीनिंग के बाद वाहनों से भेजा जा रहा था। भुपियामऊ चौराहे पर एएसपी पूर्वी सुरेंद्र प्रसाद, सीओ रानीगंज डा. अतुल अंजान त्रिपाठी, सीओ सिटी अभय कुमार पांडेय समेत भारी पुलिस बल चौराहे पर मौजूद रहकर बाहर से आने वाले लोगों को ट्रक, मैजिक समेत दूसरे वाहनों से उनके घरों तक भेजते रहे। पुलिस अधीक्षक अभिषेक सिंह भी भुपियामऊ पहुंचकर पैदल आने वालों को साधनों से क्वारंटीन सेंटर भेजवाया। वहां से वाहनों से सभी को भेजा गया। राजमार्ग या दूसरे रास्तों से चलने वाले मजदूरों की खोजबीन में पुलिसकर्मी लगे रहे।
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वह सारे दर्द भूल चुके हैं। हाइवे पर मजदूर पैदल ही चले जा रहे थे। कुछ प्रवासी मजदूरों को ट्रक वालों ने रास्ते में धोखा दे दिया। फिर भी घर जाने की जिद ठान रखी है। शनिवार को मुंबई, गुजरात, दिल्ली से आने वाले प्रवासी मजदूरों का दर्द अमर उजाला की टीम ने अयोध्या-प्रयागराज व लखनऊ-वाराणसी राजमार्ग पर नजदीक से देखा। हालांकि शनिवार को राहत की बात यह रही कि औरेया में हुए हादसे के बाद मुख्यमंत्री की सख्ती को देखते हुए पुलिसकर्मी मजदूरों को वाहनों पर बैठाकर उनके घरों तक पहुंचाने का इंतजाम करते दिखे।
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जिले के रानीगंज कैथौला के उमेश कुमार मुंबई में रहता था। करीब दस दिन के झंझावत के बाद वह श्रमिक स्पेशल ट्रेन से अपने घर पहुंचा। वह अपने दो मासूम बच्चों के साथ पत्नी को लेकर पैदल ही कटरामेदनीगंज चौराहे पर पहुंचा। पूछने पर बोला कि क्या करूं भाई साहब, पापी पेट का सवाल है। राहत मिलने के बाद फिर मुंबई जाना ही पड़ेगा। ताकि परिवार का गुजर बसर कर सकूं। तभी पांच साल की मासूम बेटी विद्या बोल पड़ी, नाही पापा अब हम बंबई न जाब। यह सुन उसका पिता भी निरुत्तर हो गया।
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गुजरात के वापी से चार दिन पहले ट्रक पकड़कर घर के लिए निकले अमेठी के पीपरपुर निवासी सुशील कुमार पत्नी काजल के साथ आ रहे थे। भुपियामऊ में ट्रक ने उतार दिया। इसके बाद पैदल ही घर के लिए चल पड़े। पुलिस चौकी के करीब मासूम बेटी खुशी को भूख लगी। उसकी भूख काजल से बर्दाश्त नहीं हुई। वह कुछ दूर स्थित हैंडपंप की ओर गई। दूध की बोतल में पानी भरा और उसे लाकर बेटी खुशी को थमा दिया। दूध की बोतल पकड़ते ही वह पीने लगी। कुछ देर बोतल को मुंह से लगाती और पिर निकाल देती। हालांकि परिवार के लोग उसे लेने के लिए आ रहे थे। सुशील बोला कि रास्ते में मजदूरों से लदे वाहन दुर्घटनाग्रस्त दिखे थे। कई हृदयविदारक घटनाएं देखते हुए निकले। जिंदा रहने तक घर पहुंचने की लोगों ने जिद ठान रखी है। साथ मौजूद लक्ष्मण बोला कि वहां क्या करता। पुलिस की लाठी खानी पड़ रही थी। ऐसे में घर ही बेहतर है।
बिहार प्रांत के अररिया जनपद के रहने वाले विसंजय पटवा, पप्पू समेत दस मजदूर रायबरेली जनपद में रेलवे के ठेकों पर काम करते थे। लाकडाउन के बाद काम बंद हो गया। खाने पीने की समस्या सामने आने लगी। संक्रमित मरीजों के मिलने का सिलसिला भी तेज हो गया। ऐसे में सूरत से सभी पैदल ही घर के लिए चल पड़े। सामान की पोटली सिर पर रखे हुए सभी पैदल ही भुपियामऊ तक पहुंचे थे। इस इंतजार में बैठे थे कि शायद चौराहे से वाराणसी जाने के लिए कोई वाहन मिल जाए। पप्पू ने बताया कि वाहन मिलता है तो ठीक है। नहीं तो पैदल ही घर जाएंगे। अब उन्हें कोई रोक नहीं सकता। भूखों मरने से तो बेहतर है कि पैदल चलकर ही मर जाएं। ताकि उनका शरीर घर तक पहुंच जाए।
अयोध्या के पालीटेक्निक चौराहा निवासी अनूप सिंह अपने परिवार के साथ गुजरात के वापी शहर में रहते थे। वहां टेंपो चलाकर परिवार का गुजर-बसर करते थे। लाकडाउन में उनके सामने भी समस्याएं आ खड़ी हुईं। शुरुआती दौर में व्यवस्था कुछ दिनों में सामान्य होने की अनूप सिंह को उम्मीद थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। नतीजा पांच दिन पहले अपना टेंपो निकाला। बच्चों के साथ जिले के ही चार लोगों को और बैठा लिया। फिर घर के लिए कूच कर दिया। रास्ते में मजदूरों से भरे वाहन दुर्घटनाग्रस्त नजर आए। कई लोग खून से लथपथ भी दिखे। फिर भी हौसला नहीं डिगा। ईश्वर का नाम लेकर सफर जारी रखा। भुपियामऊ में आराम करने के लिए रुके अनूप सिंह ने बताया कि अब तो दूरी भी 150 किमी के करीब रह गई है। देर रात तक घर पहुंच जाऊंगा, लेकिन यह सफर व समय जिंदगी भर याद रहेगा।
प्रयागराज जनपद के नैनी निवासी अमृत कुमार अपनी मां संतोषा देवी के साथ अयोध्या में रहकर मजदूरी करता था। अमृतक के मासूम बेटा व एक बेटी की परवरिश उसकी मां करती थी। पत्नी के साथ न होने के कारण परिवार की देखभाल भी संतोषा के जिम्मे ही थी। शनिवार को मां-बेटे दोनों बच्चों व सामान का बोझ कंधों पर टांगकर घर पैदल ही चले जा रहे थे। कुसमी के करीब मिले मां-बेटे बोले कि कोई वाहन नहीं मिला। पैदल ही घर जा रहे हैं। चिलचिलाती धूप में बच्चों को बार-बार प्यास सता रही थी। फिर भी घर पहुंचने की जिद दोनों ने ठान रखी थी। वाहन का इंतजार करने से अच्छा पैदल चलते रहना ही मुनासिब समझ रहे थे।
जिले में पैदल आने वाले प्रवासी मजदूरों को दुर्घटना से बचाने के लिए सीमा पर ही रोका जाता रहा। सभी की थर्मल स्क्रीनिंग के बाद वाहनों से भेजा जा रहा था। भुपियामऊ चौराहे पर एएसपी पूर्वी सुरेंद्र प्रसाद, सीओ रानीगंज डा. अतुल अंजान त्रिपाठी, सीओ सिटी अभय कुमार पांडेय समेत भारी पुलिस बल चौराहे पर मौजूद रहकर बाहर से आने वाले लोगों को ट्रक, मैजिक समेत दूसरे वाहनों से उनके घरों तक भेजते रहे। पुलिस अधीक्षक अभिषेक सिंह भी भुपियामऊ पहुंचकर पैदल आने वालों को साधनों से क्वारंटीन सेंटर भेजवाया। वहां से वाहनों से सभी को भेजा गया। राजमार्ग या दूसरे रास्तों से चलने वाले मजदूरों की खोजबीन में पुलिसकर्मी लगे रहे।

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