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जागिए! वरना पीने के लिए भी नहीं मिलेगा पानी

Wed, 22 Mar 2017 12:29 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़ Updated Wed, 22 Mar 2017 12:29 AM IST
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water crisis in belha
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 जिले में पानी का संकट तेजी से गहरा रहा है। खपत से ज्यादा पानी हर दिन बर्बाद हो रहा है। जल संरक्षण के तमाम दावे फेल हो गए हैं और जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। जलनिगम और नगर पालिका के आंकड़ों के मुताबिक, जिले में हर दिन एक व्यक्ति को 135 लीटर पानी की जरूरत होती है। जिले की आबादी के हिसाब से हर दिन लोगों को 432 मिलियन लीटर पानी की जरूरत होती है। जबकि बेल्हा में 450 मिलियन लीटर पानी हर दिन बर्बाद हो रहा है। ऐसे में अगर नहीं चेते तो आने वाले दिनों में पीने के पानी का भी गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। जल के अतिदोहन से जिले के 12 ब्लाकों पर खतरे की घंटी बज चुकी है। बुधवार को विश्व जल दिवस है। ऐसे में संकल्प लें कि पानी की बर्बादी को हर हाल में रोका जाएगा।

जिले में पानी की समस्या वर्षों पुरानी है। कभी लोग गंगा और सई के निर्मल पानी से अपनी प्यास बुझाते थे। मिलों के प्रदूषित जल ने इसे इतना गंदा कर दिया कि अब इसका पानी जानवर भी पीने से कतराते हैं। शहर में हालात इतने खराब हैं कि दर्जनों मुहल्लों में खारे पानी से ही लोग प्यास बुझाते हैं। सई की सहायक नदियों की स्थिति यह है कि गर्मी आते ही यह सूखने की कगार पर पहुंच जाती है।
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शासन ने भी नदियों में जल प्रवाह को रोकने का कोई ठोस उपाय नहीं किया है। कहीं चेकडैम बने भी हैं तो गंवई राजनीति के चलते बेकार हो गए हैं। सरकारी आंकड़ों की मानें तो हर दिन एक व्यक्ति को औसतन 135 लीटर पानी की जरूरत होती है। जिसमे वह अपना हर काम आसानी से निपटा सके। यह छोटे शहर के साथ ही गांव के लोगों के लिए निर्धारित है। जिले की आबादी लगभग 32 लाख के करीब है। नगर पालिका, नगर पंचायतों के अलावा गांवों में रहने वाले लोगों को हर दिन 432 मिलियन लीटर पानी की जरूरत होती है। इसके लिए कुंआ, हैंडपंप, शहर में पाइप लाइन और सबमर्सिबल का प्रयोग किया जाता है। चिंता की बात यह है कि मानक से कहीं अधिक पानी बर्बाद किया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों में भले ही यह बातें दर्ज न हो लेकिन जिम्मेदार मान रहे हैं कि हर लगभग 450 मिलियन लीटर से अधिक पानी बर्बाद हो रहा है।
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मिलों के कारण घुलता जहर और सूखतीं नदियां

जिले की प्रमुख नदी सई है। सिंचाई के साथ ही यह हजारों गांवों का वाटर लेबल मेनटेन करती है। रायबरेली शहर की मिलों द्वारा इसमें मिलाया जाने वाला कारखानों का गंदा पानी इसकी निर्मलता को प्रभावित कर दे रहा है। किनारे पर स्थित देवी देवताओं मंदिरों के चरण पखारती नदी में जहर घुलने से श्रद्धालु भी अब इसके पानी से आचमन करना बंद कर दिए हैं। यही नहीं इस नदी में कचरा गिरने से यह उथली होती जा रही है। जगह-जगह कचरे के ढेर लग जाने से इसके प्रवाह में भी वह तेजी नहीं दिखती है। दर्जनों की संख्या में बने देवी देवताओं के ऐतिहासिक मंदिरों के चरण पखारती इस नदी के जल से श्रद्धालुओं ने अब आचमन भी बंद कर दिया है। इसके अलावा इसकी सहायक नदियां लोनी, सकरनी, बकुलाही, परेवा सहित नौ नदियां गर्मी आते ही सूखने की कगार पर पहुंच जाती हैं। बकुलाही में भी एक दशक पहले छेड़छाड़ के चलते पानी रुकता नहीं इससे सैकड़ों में पानी की समस्या उत्पन्न हो गई है। इसको प्राकृति स्वरूप देने के लिए कुछ लोगों ने आवाज उठाई तो शासन ने उन पर मुकदमे दर्ज करा दिए।

 
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