{"_id":"57cb11464f1c1b660b2cca0a","slug":"truth-of-mahabharat","type":"story","status":"publish","title_hn":"कहानी नहीं, सच है अजगरा से पांडवों के जुड़ाव का वृत्तांत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कहानी नहीं, सच है अजगरा से पांडवों के जुड़ाव का वृत्तांत
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़।
Updated Sun, 04 Sep 2016 12:12 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अजगरा से पांडवो के जुड़ाव का वृत्तांत अब महज एक कहानी नहीं रहेगा। दरअसल हाल ही में इसका एक ठोस लिखित प्रमाण मिला है जिसमें यह उल्लेख है कि द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में पांडवों का जिले से जुड़ाव था। पुरातत्व वेदियों को उस काल का एक दुलर्भ बलुवा प्रस्तर मिला है जिस पर ब्राह्मी लिपि में पांडवों का नाम लिखा है। दावा है कि प्रस्तर इस बात का प्रमाण है कि करीब दो हजार साल पूर्व अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां आए थे।
दरअसल, अजगरा और उसके आसपास का इलाका पांडव कालीन बताया जाता है। यहां दूसरे काल के भी अवशेष और पांडुलिपियां मिलने का दावा होता रहा है। वास्तव में यह प्रस्तर इन सब चीजों से हटकर और दुलर्भ है। प्रस्तर पर युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, सहदेव और नकुल के नामों का स्पष्ट उल्लेख ब्राह्मी लिपि में किया गया है। यह लिपि दो हजार साल पहले प्रचलन में थी। पुरातत्व वेत्ताओं का दावा है कि इसके पहले इतनी पुरानी लिपि अजगरा में नहीं मिली है। जिससे यह साबित होता है कि दो
हजार साल पहले पांडवों अजगरा आये थे।
एमडीपीजी कालेज में इतिहास के प्रोफेसर एवं पुरातत्व अधिकारी डॉ. पीयूषकांत शर्मा बताते हैं कि करीब एक दशक तक यह अभिलेख गुमनामी में रहा। इसके बारे में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर और पुरा लिपि के विशेषज्ञ एसएन राय के अलावा किसी को भी जानकारी नहीं थी। दुलर्भ प्रस्तर पर काफी शोध के बाद उस पर लिखी प्राचीन लिपि का उन्होंने अनुवाद तो किया, मगर उसे सावर्जनिक नहीं किया। वे इस प्रस्तर को कई साल तक अपने पास रखे रहे। उन्होंने और कई पुरातत्व जानकारों ने कई बार इस दुलर्भ प्रस्तर को प्रतापगढ़ लाने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे।
विज्ञापन
बताया जा रहा है कि प्रोफेसर एसएन राय की मृत्यु के कई साल बाद भी इस रहस्य परपर्दा पड़ा रहा। हालांकि हाल ही में प्रतापगढ़ के इतिहासकारों और पुरातत्व वेत्ताओं को वह दुलर्भ पांडवकालीन प्रस्तर और उस पर लिखी लिपि के अनुवाद का साक्ष्य मिला है। इसके बाद से ही उनमें उम्मीद जगी है कि बेल्हा के गौरव से जुड़े इस पौराणिक साक्ष्य को यहां लाया जाए। लोग अब इस साक्ष्य को इलाहाबाद म्यूजियम से अजगरा संग्रहालय में लाकर उसकी शोभा बढ़ाना चाहते हैं।
'मैंने सौंपा था प्रोफेसर को प्रस्तर'
पुरातत्वखोजी निर्झर प्रतापगढ़ी का दावा है कि इस दुलर्भ प्रस्तर को कई साल पहले उन्होंने प्रोफेसर एसएन राय को यह कहते हुए दिया था कि पढ़ने के बाद उसे लौटा दिया जाए। निर्झर प्रतापगढ़ी बताते हैं कि प्रोफेसर ने प्रस्तर को देखने के बाद उसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताया था। उन्होंने उसको अपने पास रखकर पढ़ने के बाद लौटाने का वादा किया था। मगर वह प्रस्तर अभी तक उनको नहीं मिला है। इसके लिये कई बार प्रयास किया जा चुका है।
विज्ञापन
दरअसल, अजगरा और उसके आसपास का इलाका पांडव कालीन बताया जाता है। यहां दूसरे काल के भी अवशेष और पांडुलिपियां मिलने का दावा होता रहा है। वास्तव में यह प्रस्तर इन सब चीजों से हटकर और दुलर्भ है। प्रस्तर पर युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, सहदेव और नकुल के नामों का स्पष्ट उल्लेख ब्राह्मी लिपि में किया गया है। यह लिपि दो हजार साल पहले प्रचलन में थी। पुरातत्व वेत्ताओं का दावा है कि इसके पहले इतनी पुरानी लिपि अजगरा में नहीं मिली है। जिससे यह साबित होता है कि दो
विज्ञापन
हजार साल पहले पांडवों अजगरा आये थे।
एमडीपीजी कालेज में इतिहास के प्रोफेसर एवं पुरातत्व अधिकारी डॉ. पीयूषकांत शर्मा बताते हैं कि करीब एक दशक तक यह अभिलेख गुमनामी में रहा। इसके बारे में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर और पुरा लिपि के विशेषज्ञ एसएन राय के अलावा किसी को भी जानकारी नहीं थी। दुलर्भ प्रस्तर पर काफी शोध के बाद उस पर लिखी प्राचीन लिपि का उन्होंने अनुवाद तो किया, मगर उसे सावर्जनिक नहीं किया। वे इस प्रस्तर को कई साल तक अपने पास रखे रहे। उन्होंने और कई पुरातत्व जानकारों ने कई बार इस दुलर्भ प्रस्तर को प्रतापगढ़ लाने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे।
विज्ञापन
बताया जा रहा है कि प्रोफेसर एसएन राय की मृत्यु के कई साल बाद भी इस रहस्य परपर्दा पड़ा रहा। हालांकि हाल ही में प्रतापगढ़ के इतिहासकारों और पुरातत्व वेत्ताओं को वह दुलर्भ पांडवकालीन प्रस्तर और उस पर लिखी लिपि के अनुवाद का साक्ष्य मिला है। इसके बाद से ही उनमें उम्मीद जगी है कि बेल्हा के गौरव से जुड़े इस पौराणिक साक्ष्य को यहां लाया जाए। लोग अब इस साक्ष्य को इलाहाबाद म्यूजियम से अजगरा संग्रहालय में लाकर उसकी शोभा बढ़ाना चाहते हैं।
'मैंने सौंपा था प्रोफेसर को प्रस्तर'
पुरातत्वखोजी निर्झर प्रतापगढ़ी का दावा है कि इस दुलर्भ प्रस्तर को कई साल पहले उन्होंने प्रोफेसर एसएन राय को यह कहते हुए दिया था कि पढ़ने के बाद उसे लौटा दिया जाए। निर्झर प्रतापगढ़ी बताते हैं कि प्रोफेसर ने प्रस्तर को देखने के बाद उसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताया था। उन्होंने उसको अपने पास रखकर पढ़ने के बाद लौटाने का वादा किया था। मगर वह प्रस्तर अभी तक उनको नहीं मिला है। इसके लिये कई बार प्रयास किया जा चुका है।