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प्रोत्साहन के अभाव में दम तोड़ रहीं खेल प्रतिभाएं
प्रतापगढ़ अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 22 Aug 2016 12:11 AM IST
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स्पोर्ट्स ट्रायल
- फोटो : अमर उजाला
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उम्मीदें आसमान पर हैं। हौसले भी फौलादी हैं और ये जी-तोड़ मेहनत भी कर कर रही हैं। लेकिन इन सब पर संसाधनों और प्रोत्साहन का अभाव भारी पड़ रहा है। नतीजतन मुकाम तक पहुंचने से पहले ही प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं। यहां बात हो रही है उन बेटियों की, जो खेल के क्षेत्र में संघर्ष कर रहीं हैं। ओलंपिक में पीवी सिंधू और साक्षी मलिक के शानदार प्रदर्शन के बाद जिले की ऐसी बेटियों की उम्मीदें भी आसमान पर हैं। दरकार है तो बस उन संसाधनों की जिनका अभाव उनकी राह में मुश्किलें खड़ा कर रहा है।
जिला स्टेडियम में एथलेटिक्स के साथ-साथ कुश्ती और तलवारबाजी जैसे खेलों में माहिर होने के लिए हर दिन दर्जनों बेटियों जद्दोजहद कर रही हैं, लेकिन उन्हें सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। महिला कुश्ती का प्रशिक्षण ले रही जया पाल, शोभा पाल, स्वीटी पोद्दार, रंजीता, आरती सिंह, दिवा शुक्ला आदि महिला पहलवानों का कहना है कि कुश्ती सीखने के लिये हाल नहीं है। जिस छोटे से कमरे में कोचिंग दी जा रही है उसमें पंखा तक नहीं है। गरमी में खिलाड़ी पसीने से तर-बतर हो जाते हैं। जगह कम होने से मैट नहीं बिछ पा रही है। जिससे खिलाड़ी आए दिन चोटहिल हो रही हैं। अखाड़े के नाम पर शासन-प्रशासन ने मदद नहीं की।
कोच विनोद यादव ने बताया कि यहां कुश्ती का अभ्यास 2012-13 में शुरू हुआ। हालांकिप्रतियोगिताएं नहीं होती हैं। महिला एथलेटिक्स को मैदान की चौड़ाई कम होने का दंश झेलना पड़ रहा है। दौड़ में फर्राटा भरने से पहले ही खिलाड़ियों की लैंडिंग शुरू हो जाती है। शारदा सिंह, प्रीति सिंह, नीतूसिंह, शिवांगी शुक्ला, स्वेता उपाध्याय समेत प्रशिक्षण ले रहीं कई खिलाड़ियों ने कहा कि बारिश में पूरा मैदान पानी ओर कीचड़ से भर जाता है। ट्रैक मानक के अनुसार नहीं हैं। मानक चार सौ मीटर का है जबकि यहां का ट्रैक सिर्फ तीन सौ मीटर का है। कोच मनोज कुमार पाल बताते हैं इससे काफी दिक्कतें आ रही हैं। तलवारबाजी में प्रतिभावान खिलाड़ियों की कोई कमी नहीं है। लवली, मिश्रा, अलका सरोज, अनुष्का सिंह, शुभांगी पांडेय और श्रद्धा कसौधन जैसी अन्य तलवारबाजों के सामने उपकरण की दिक्कत आ रही है। जिस कोर्ट में इनको प्रशिक्षित किया जा रहा है उसमें प्रकाश की व्यवस्था नहीं है। इसलिये बाहर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कोच अजय सिंह का कहना है कि डिमांड निदेशालय भेजी जाती है, लेकिन कोई फायदा नहीं है।
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खिलाड़ी तो हैं मगर कोच नहीं
बैडमिंटन का जिले में बुरा हाल है। इस खेल के खिलाड़ी तो हैं, मगर उनको ट्रेनिंग देने के लिये बैडमिंटन कोच स्टेडियम में नहीं हैं। पिछले चार साल से बिना कोच के स्टेडियम की कोर्ट है। कोर्ट की लकड़ी भी सड़ गई है। लाइट की व्यवस्था नहीं है। चार साल पहले डिप्टी स्पोर्ट्स अफसर शैलेंद्र कुशवाहा आए थे। उनके जाने के बाद बैडमिंटन का प्रशिक्षण बंद कर दिया गया। जबकि जिलाधिकारी डॉ.आदर्श सिंह भी इसी कोर्र्ट में बैडमिंटन खेलने आते हैं।
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जिला स्टेडियम में एथलेटिक्स के साथ-साथ कुश्ती और तलवारबाजी जैसे खेलों में माहिर होने के लिए हर दिन दर्जनों बेटियों जद्दोजहद कर रही हैं, लेकिन उन्हें सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। महिला कुश्ती का प्रशिक्षण ले रही जया पाल, शोभा पाल, स्वीटी पोद्दार, रंजीता, आरती सिंह, दिवा शुक्ला आदि महिला पहलवानों का कहना है कि कुश्ती सीखने के लिये हाल नहीं है। जिस छोटे से कमरे में कोचिंग दी जा रही है उसमें पंखा तक नहीं है। गरमी में खिलाड़ी पसीने से तर-बतर हो जाते हैं। जगह कम होने से मैट नहीं बिछ पा रही है। जिससे खिलाड़ी आए दिन चोटहिल हो रही हैं। अखाड़े के नाम पर शासन-प्रशासन ने मदद नहीं की।
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कोच विनोद यादव ने बताया कि यहां कुश्ती का अभ्यास 2012-13 में शुरू हुआ। हालांकिप्रतियोगिताएं नहीं होती हैं। महिला एथलेटिक्स को मैदान की चौड़ाई कम होने का दंश झेलना पड़ रहा है। दौड़ में फर्राटा भरने से पहले ही खिलाड़ियों की लैंडिंग शुरू हो जाती है। शारदा सिंह, प्रीति सिंह, नीतूसिंह, शिवांगी शुक्ला, स्वेता उपाध्याय समेत प्रशिक्षण ले रहीं कई खिलाड़ियों ने कहा कि बारिश में पूरा मैदान पानी ओर कीचड़ से भर जाता है। ट्रैक मानक के अनुसार नहीं हैं। मानक चार सौ मीटर का है जबकि यहां का ट्रैक सिर्फ तीन सौ मीटर का है। कोच मनोज कुमार पाल बताते हैं इससे काफी दिक्कतें आ रही हैं। तलवारबाजी में प्रतिभावान खिलाड़ियों की कोई कमी नहीं है। लवली, मिश्रा, अलका सरोज, अनुष्का सिंह, शुभांगी पांडेय और श्रद्धा कसौधन जैसी अन्य तलवारबाजों के सामने उपकरण की दिक्कत आ रही है। जिस कोर्ट में इनको प्रशिक्षित किया जा रहा है उसमें प्रकाश की व्यवस्था नहीं है। इसलिये बाहर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कोच अजय सिंह का कहना है कि डिमांड निदेशालय भेजी जाती है, लेकिन कोई फायदा नहीं है।
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खिलाड़ी तो हैं मगर कोच नहीं
बैडमिंटन का जिले में बुरा हाल है। इस खेल के खिलाड़ी तो हैं, मगर उनको ट्रेनिंग देने के लिये बैडमिंटन कोच स्टेडियम में नहीं हैं। पिछले चार साल से बिना कोच के स्टेडियम की कोर्ट है। कोर्ट की लकड़ी भी सड़ गई है। लाइट की व्यवस्था नहीं है। चार साल पहले डिप्टी स्पोर्ट्स अफसर शैलेंद्र कुशवाहा आए थे। उनके जाने के बाद बैडमिंटन का प्रशिक्षण बंद कर दिया गया। जबकि जिलाधिकारी डॉ.आदर्श सिंह भी इसी कोर्र्ट में बैडमिंटन खेलने आते हैं।