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कानपुर ,प्रयागराज, लखनऊ की संस्थाओं पर विकास कार्य की जिम्मेदारी
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प्रतापगढ़। हैंडपंप, सोलर लाइट, मिनी हाईमास्ट और हाईमास्ट लगवाने के लिए जनप्रतिनिधियों ने जिले की कार्यदायी संस्थाओं को नजरअंदाज कर कानपुर, प्रयागराज और लखनऊ की संस्थाओं को जिम्मेदारी देनी शुरू कर दी है। जिले की संस्थाओं को बजट मिलना बंद हो गया है। इससे इन संस्थाओं के पास अब कोई काम नहीं रह गया है।
जिले के जनप्रतिनिधियों को विकास कार्य कराने के लिए सरकारी मशीनरी पसंद नहीं आ रही है। हैंडपंप लगाने के लिए जलनिगम और यूपी एग्रो के साथ ही हाईमास्ट लगाने के लिए आरईएस और लोक निर्माण विभाग और नेडा जैसी संस्थाएं हैं। इसके बाद भी जिले की सरकारी मशीनरी से कार्य कराने के बजाय कानपुर, प्रयागराज और लखनऊ की संस्थाओं से सहयोग लिया जा रहा है। वित्तीय वर्ष के अंतिम दिन माननीयों के प्रस्ताव पर करोड़ों रुपये का भुगतान इन संस्थाओं को किया गया है। जबकि संस्थाओं की लापरवाही का आलम यह है कि 9.39 करोड़ रुपये का भुगतान होने के बाद भी विकास कार्य नहीं कराए गए हैं। रुपये डंप कर बैठीं संस्थाओं ने अभी तक आदर्श आचार संहिता का बहाना बताकर काम रोके रखा और अब वित्तीय वर्ष का अंतिम माह होने को बहाना है। हालां कि जो कार्य पूर्व में प्रारंभ हो जाता है, उस पर आचार संहिता का कोई प्रभाव नहीं होता है। मगर, वास्तविकता तो यह है कि कार्यदायी संस्थाओं के पास इतना काम होता है कि वे समय से पूरा नहीं कर पाती हैं। फिलहाल, जिले में हैंडपंप लगाने के लिए प्रयागराज की संस्था काम कर रही है। जबकि लखनऊ और कानपुर की संस्थाओं को हाईमास्ट और सोलर लाइट लगवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
माननीयों के प्रस्ताव पर अफसर लगाते हैं मुहर
जिले के माननीयों के प्रस्ताव पर अफसर मुहर लगाने के लिए विवश होते हैं। नेता पत्र लिखकर साफ तौ पर यह कहते हैं कि हमारी निधि की धनराशि इस संस्था को दे दी जाए। संस्थाएं जनप्रतिनिधियों के प्रस्ताव के मुताबिक कार्य कराती हैं। नेताओं की हनक के आगे अफसर उनकी गुणवत्ता परखना भूल जाते हैं।
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माननीयों के प्रस्ताव पर कार्यदायी संस्थाओं का चयन किया जाता है। विधायक निधि उनके प्रस्ताव पर ही खर्च की जा सकती है। ऐसे में उनकी पसंद को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। जो संस्थाएं कार्य कर रही हैं, उनकी गुणवत्ता खंगालने के बाद भी भुगतान किया जाएगा।
आरसी शर्मा, परियोजना अधिकारी
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जिले के जनप्रतिनिधियों को विकास कार्य कराने के लिए सरकारी मशीनरी पसंद नहीं आ रही है। हैंडपंप लगाने के लिए जलनिगम और यूपी एग्रो के साथ ही हाईमास्ट लगाने के लिए आरईएस और लोक निर्माण विभाग और नेडा जैसी संस्थाएं हैं। इसके बाद भी जिले की सरकारी मशीनरी से कार्य कराने के बजाय कानपुर, प्रयागराज और लखनऊ की संस्थाओं से सहयोग लिया जा रहा है। वित्तीय वर्ष के अंतिम दिन माननीयों के प्रस्ताव पर करोड़ों रुपये का भुगतान इन संस्थाओं को किया गया है। जबकि संस्थाओं की लापरवाही का आलम यह है कि 9.39 करोड़ रुपये का भुगतान होने के बाद भी विकास कार्य नहीं कराए गए हैं। रुपये डंप कर बैठीं संस्थाओं ने अभी तक आदर्श आचार संहिता का बहाना बताकर काम रोके रखा और अब वित्तीय वर्ष का अंतिम माह होने को बहाना है। हालां कि जो कार्य पूर्व में प्रारंभ हो जाता है, उस पर आचार संहिता का कोई प्रभाव नहीं होता है। मगर, वास्तविकता तो यह है कि कार्यदायी संस्थाओं के पास इतना काम होता है कि वे समय से पूरा नहीं कर पाती हैं। फिलहाल, जिले में हैंडपंप लगाने के लिए प्रयागराज की संस्था काम कर रही है। जबकि लखनऊ और कानपुर की संस्थाओं को हाईमास्ट और सोलर लाइट लगवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
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माननीयों के प्रस्ताव पर अफसर लगाते हैं मुहर
जिले के माननीयों के प्रस्ताव पर अफसर मुहर लगाने के लिए विवश होते हैं। नेता पत्र लिखकर साफ तौ पर यह कहते हैं कि हमारी निधि की धनराशि इस संस्था को दे दी जाए। संस्थाएं जनप्रतिनिधियों के प्रस्ताव के मुताबिक कार्य कराती हैं। नेताओं की हनक के आगे अफसर उनकी गुणवत्ता परखना भूल जाते हैं।
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माननीयों के प्रस्ताव पर कार्यदायी संस्थाओं का चयन किया जाता है। विधायक निधि उनके प्रस्ताव पर ही खर्च की जा सकती है। ऐसे में उनकी पसंद को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। जो संस्थाएं कार्य कर रही हैं, उनकी गुणवत्ता खंगालने के बाद भी भुगतान किया जाएगा।
आरसी शर्मा, परियोजना अधिकारी