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नगदी खेती से आपदा की भरपाई की कोशिश
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Updated Sat, 26 Dec 2015 11:27 PM IST
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प्राकृतिक आपदा से हो रहे नुकसान व पैदावार कम होने से पट्टी क्षेत्र के किसानों ने अब पंरपरागत खेती से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है। वे धीरे-धीरे वे नगदी खेती की ओर रूख करना श्रुरू कर दिए हैं। इस खेती में किसानाें को भारी मुनाफा भी हो रहा है। पट्टी इलाके में टमाटर, बैगन, आलू के साथ केले की नगदी खेती पर किसानों ने जोर दे दिया है। इसके जरिए वे भारी मुनाफा भी कमा रहे हैं। इस दिशा में फायदा उठा रहे किसान दूसरे किसानों को भी प्रेरित कर रहे हैं।
परपंरागत गेहूं, धान, सरसों, आलू व मटर में लग रही लागत व परिश्रम के बाद भी अपेक्षानुसार उत्पादन न होन और समय-समय पर हो रही प्राकृतिक आपदाओं से नुकसान को देखते हुए कुछ किसान अब हाईब्रीड वाले पौधों के जरिए तकनीकी खेती की ओर बढ़ रहे हैं। पट्टी इलाके में बहुता गांव निवासी विनोद कुमार पांडेय उर्फ बबलू ने टमाटर व केले की खेती पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। इसी तरह अशोकपुर निवासी शेषमणि पांडेय शुगर फ्री आलू तथा मोलनापुर निवासी प्रेम गिरी बैगन तथा चौपई के मुन्ना तिवारी केले की खेती कर रहे हैं।
बहुता निवासी बबलू पांडेय ने बताया वह बंगलौर से बीज लाते हं,ै जबकि केले का पौधा जलगांव महाराष्ट्र से मंगाना पड़ता है। इसकी शुरुआत करने से पहले जलगांव, बंगलौर, लखीमपुर व बाराबंकी जिलों में जाकर तकनीकी खेती के बारे में जानकारी हासिल की। उन्हाेंने बताया कि टमाटर की फसल वर्ष भर में दो बार मिल जाती है। पहली अक्तूबर तथा दूसरी फसल फरवरी से तैयार होनी शुरू हो जाती है। तीन से चार माह में यह फसल पूरी तरह तैयार हो जाती है। जिसको आसपास की बड़ी मंडियों में भेजने के साथ खुदरा दुकानदारों को हाथों बेचकर मुनाफा अर्जित किया जाता है। उन्हाेंने इस प्रकार की खेती के लिए और भी किसानों को प्रेरित किया है।
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परपंरागत गेहूं, धान, सरसों, आलू व मटर में लग रही लागत व परिश्रम के बाद भी अपेक्षानुसार उत्पादन न होन और समय-समय पर हो रही प्राकृतिक आपदाओं से नुकसान को देखते हुए कुछ किसान अब हाईब्रीड वाले पौधों के जरिए तकनीकी खेती की ओर बढ़ रहे हैं। पट्टी इलाके में बहुता गांव निवासी विनोद कुमार पांडेय उर्फ बबलू ने टमाटर व केले की खेती पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। इसी तरह अशोकपुर निवासी शेषमणि पांडेय शुगर फ्री आलू तथा मोलनापुर निवासी प्रेम गिरी बैगन तथा चौपई के मुन्ना तिवारी केले की खेती कर रहे हैं।
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बहुता निवासी बबलू पांडेय ने बताया वह बंगलौर से बीज लाते हं,ै जबकि केले का पौधा जलगांव महाराष्ट्र से मंगाना पड़ता है। इसकी शुरुआत करने से पहले जलगांव, बंगलौर, लखीमपुर व बाराबंकी जिलों में जाकर तकनीकी खेती के बारे में जानकारी हासिल की। उन्हाेंने बताया कि टमाटर की फसल वर्ष भर में दो बार मिल जाती है। पहली अक्तूबर तथा दूसरी फसल फरवरी से तैयार होनी शुरू हो जाती है। तीन से चार माह में यह फसल पूरी तरह तैयार हो जाती है। जिसको आसपास की बड़ी मंडियों में भेजने के साथ खुदरा दुकानदारों को हाथों बेचकर मुनाफा अर्जित किया जाता है। उन्हाेंने इस प्रकार की खेती के लिए और भी किसानों को प्रेरित किया है।
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