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किस्सा-कहानी का हिस्सा बन गया राजा विराट का किला
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
Updated Sun, 10 Jul 2016 12:12 AM IST
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mudda belha ki virasat ka
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महाभारत में जिस राजा विराट के प्रसंग का उल्लेख खंड 17 में मिलता है उनका ऐतिहासिक किला पट्टी इलाके के बारडीह गांव में टीले के रूप में आज भी मौजूद है। लेकिन, बेहद जर्जर और अवशेष के रूप में। प्रशासनिक व पुरातत्व विभाग की उपेक्षा का शिकार यह स्थल अपनी पहचान खो चुका है। राजा विराट का किला अब किस्सा कहानियों का हिस्सा बन चुका है। हालत यह हो गई है कि इस ऐतिहासिक जगह तक जाने के लिए रास्ता तक नहीं है।
पट्टी के इतिहास पर जब नजर डालें तो राज विराट का नाम सबसे पहले उभरकर सामने आता है। कहा जाता है कि राजा विराट के नाम से विराट नगर महाभारत काल का एक प्रसिद्ध जनपद था। यहां विराट का राज्य था। उप्लव नगर इसकी राजधानी थी। जब पांडव अज्ञातवास कर रहे थे उस समय अर्जुन ने वृहन्नला नाम धारण कर अपने सभी भाइयों संग राज विराट के यहां नौकरी की थी। वृहन्नला ने राजा विराट की पुत्री उत्तरा को नृत्य व संगीत की शिक्षा दी थी। महाभारत में राज विराट के साले कीचक के वध का भी दृष्टांत मिलता है। जिसकी पुष्टि पुरातत्व विभाग ने की है। पट्टी इलाके के महदमा व दमदमा इलाके में पुरातत्व विभाग को महाभारत कालीन नरकंकाल के अवशेष यहां खुदाई के दौरान मिले थे। गांव में आज भी पुरातत्व विभाग बोर्ड व खुदाई स्थल को सुरक्षित रखने का प्रमाण मौजूद है। बावजूद इस ऐतिहासिक स्थल की देखभाल या उसे सहेजने अथवा सुरक्षित रखने का कार्य न तो प्रशासन कर रहा है न ही पुरातत्व विभाग ही इस दिशा में दिलचस्पी दिखा रहा है।
किले के बगल छह बीघा जमीन है अभिशप्त
राजा विराट के किले के बगल पांच से छह बीघा अभिशप्त जमीन पड़ी है। जिस पर आज भी खेती नहीं होती। कहावत है कि इस अभिशप्त जमीन को कोई भी अपने कब्जे में लेने का प्रयास करता है तो कुछ न कुछ अहित हो जाता है। लिहाजा आज भी वह जमीन वहां वैसे ही पड़ी हुई है। इस जमीन के आसपास कई तालाब भी हैं।
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जाने के लिए नहीं है रास्ता
राजा विराट के इस ऐतिहासिक किले पर जाने का कोई रास्ता नहीं है। इस टीले के आसपास झाड़-झंखाड़ उगे हुए हैं। बरसात के मौसम में ज्यादातर सांप, बिच्छु ही नजर आते हैं। सदियों तक तो यहां आने जाने का कोई साहस हीं नहीं करता था। लेकिन अब तो लोगों ने इस टीले को खेती के काबिल बना कर उस पर खेती भी शुरू कर दी है।
खाली पड़ी जमीन पर बन गई है यज्ञशाला
राजा विराट के किले के करीब ही एक खाली स्थान पर वाराणसी के जूना अखाड़े के नागा साधू सदस्य महंथ रामेश्वर पुरी ने यज्ञशाला का निर्माण करने के साथ शतचंडी यज्ञ समपन्न कराया और अब वहां एक शिवालय की स्थापना कर आश्रम भी बना लिया है। इस आश्रम में आसपास के गांव के ग्रामीण भजन कीर्तन व भंडारे में शािमल होने आया करते हैं। इस किले के करीब ही एक स्वंयसेवी संस्था विराट धाम नाम से एक मंदिर श्रृखंला भी तैयार कर रही है।
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पट्टी के इतिहास पर जब नजर डालें तो राज विराट का नाम सबसे पहले उभरकर सामने आता है। कहा जाता है कि राजा विराट के नाम से विराट नगर महाभारत काल का एक प्रसिद्ध जनपद था। यहां विराट का राज्य था। उप्लव नगर इसकी राजधानी थी। जब पांडव अज्ञातवास कर रहे थे उस समय अर्जुन ने वृहन्नला नाम धारण कर अपने सभी भाइयों संग राज विराट के यहां नौकरी की थी। वृहन्नला ने राजा विराट की पुत्री उत्तरा को नृत्य व संगीत की शिक्षा दी थी। महाभारत में राज विराट के साले कीचक के वध का भी दृष्टांत मिलता है। जिसकी पुष्टि पुरातत्व विभाग ने की है। पट्टी इलाके के महदमा व दमदमा इलाके में पुरातत्व विभाग को महाभारत कालीन नरकंकाल के अवशेष यहां खुदाई के दौरान मिले थे। गांव में आज भी पुरातत्व विभाग बोर्ड व खुदाई स्थल को सुरक्षित रखने का प्रमाण मौजूद है। बावजूद इस ऐतिहासिक स्थल की देखभाल या उसे सहेजने अथवा सुरक्षित रखने का कार्य न तो प्रशासन कर रहा है न ही पुरातत्व विभाग ही इस दिशा में दिलचस्पी दिखा रहा है।
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किले के बगल छह बीघा जमीन है अभिशप्त
राजा विराट के किले के बगल पांच से छह बीघा अभिशप्त जमीन पड़ी है। जिस पर आज भी खेती नहीं होती। कहावत है कि इस अभिशप्त जमीन को कोई भी अपने कब्जे में लेने का प्रयास करता है तो कुछ न कुछ अहित हो जाता है। लिहाजा आज भी वह जमीन वहां वैसे ही पड़ी हुई है। इस जमीन के आसपास कई तालाब भी हैं।
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जाने के लिए नहीं है रास्ता
राजा विराट के इस ऐतिहासिक किले पर जाने का कोई रास्ता नहीं है। इस टीले के आसपास झाड़-झंखाड़ उगे हुए हैं। बरसात के मौसम में ज्यादातर सांप, बिच्छु ही नजर आते हैं। सदियों तक तो यहां आने जाने का कोई साहस हीं नहीं करता था। लेकिन अब तो लोगों ने इस टीले को खेती के काबिल बना कर उस पर खेती भी शुरू कर दी है।
खाली पड़ी जमीन पर बन गई है यज्ञशाला
राजा विराट के किले के करीब ही एक खाली स्थान पर वाराणसी के जूना अखाड़े के नागा साधू सदस्य महंथ रामेश्वर पुरी ने यज्ञशाला का निर्माण करने के साथ शतचंडी यज्ञ समपन्न कराया और अब वहां एक शिवालय की स्थापना कर आश्रम भी बना लिया है। इस आश्रम में आसपास के गांव के ग्रामीण भजन कीर्तन व भंडारे में शािमल होने आया करते हैं। इस किले के करीब ही एक स्वंयसेवी संस्था विराट धाम नाम से एक मंदिर श्रृखंला भी तैयार कर रही है।