फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Pratapgarh News ›   mudda belha ki virasat ka 13

रास न आईं फिरंगियों की बोलियां शान से सीने पर खाई थीं गोलियां

Fri, 15 Jul 2016 12:27 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़ Updated Fri, 15 Jul 2016 12:27 AM IST
विज्ञापन
mudda belha ki virasat ka 13
mudda belha ki virasat ka
मातृभूमि के मायने क्या होते हैं, इसका वजूद क्या होता है, इसकी रक्षा का जुनून क्या होता है? अगर इन सवालों का जवाब चाहते हैं तो एक बार कहला गांव जरूर आइए। अंग्रेजी हुकूमत के जुल्म-ओ-सितम और अपनी माटी में पैदा होने वाले अनाज पर लगने वाले भारी भरकम लगाने के विरोध में किसानों ने शान से सीने पर गोलियां खाईं। इसमें तीन लोगों ने अपनी माटी के लिए प्राण न्यौछावर कर दिए। कई लोग फिरंगियों की गोलियों से जख्मी हुए। देशभर में इस घटना की गूंज थी। अफसोस इस बात का है कि इतनी बड़ी कुर्बानी को शासन-प्रशासन और खुद को जनता का सेवक कहने वाले नेताओं ने बड़ी आसानी से भूला दिया। कभी शहीदों और उनके परिजनों की सुधि नहीं ली गई। शहीद स्थल को भी विकसित और संरक्षित नहीं किया जा सका।
विज्ञापन


अंग्रेजी हुकूमत में जब देशवासियों को तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रह था और ऊंची लगान व कर को लेकर किसानों का शोषण किया जा रहा था। उस समय कहला गांव ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। 16 फरवरी 1931 को कहला गांव के कालिका प्रसाद विश्वकर्मा, नाथकापूरा के रामदास उपाध्याय व कौलापुर के मथुरा प्रसाद यादव के नेतृत्व में अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक जनसभा आयोजित की गई थी। जिसमें अंग्रेजों की फौज ने सभास्थल पर पहुंचकर गांव के किसानों पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। इस घटना में सैकड़ों किसान जख्मी हुए थे। इसी भगदड़ के बीच मथुरा प्रसाद, कालिका प्रसाद और रामदास ने मातृभूमि के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। अंग्रेजी हुकूमत की इस बर्बरता के बाद भी यहां के किसानों का जोश ठंडा नही पड़ा और आंदोलन जारी रहा।
विज्ञापन


इस घटना की गूंज देशभर में सुनाई दी और चंद रोज बाद ही कमला नेहरू, पुरुषोत्तम दास टंडन आदि बड़े नेता कहला आ पहुंचे और बलिदानियों को श्रद्वांजलि देते हुए किसानों की एक बहुत बड़ी सभा की। हैरत की बात यह है कि स्वतंत्रता मिलने के बाद भी शहीद परिजनों की सुधि नही ली गई। हालांकि यहां के तमाम लोगों के प्रयास के बाद 16 फरवरी 1973 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शहीदों की याद में एक स्मारक की नींव रखी। उसी वर्ष आजादी की 27वीं वर्षगांठ पर इन शहीदों की याद में भारत सरकार ने शिलालेख स्थापित करवाया। इसके बाद शासन ने इस स्मारक के रखरखाव व सौंदर्यीकरण पर कोई ध्यान नही दिया। यहां तक कि शहीद होने वाले दिन पर पूर्व के वर्षों में लगने वाला शहीद मेला भी बंद हो गया। स्मारक पर फूल अर्पित करने की भी जरूरत शासन व जनप्रतिनिधि नहीं समझते। स्मारक पर लगे पत्थर रखरखाव के अभाव में जगह-जगह से उखड़ गए। प्रकाश की नाम पर कोई व्यवस्था नहीं है।  
विज्ञापन
विज्ञापन


जितना बुरा हाल इस शहीद स्थल का है, उससे भी ज्यादा बुरा हाल उन शहीदों के परिजनों का। सहायता के नाम पर सिर्फ वादों का झुनझुना ही थमाया गया। शहीद कालिका प्रसाद के परिजनों ने मुफलिसी व गरीबी का वह दौर देखा है जिससे हर कोई दुखी हुआ। कौलापुर गांव निवासी मथुरा प्रसाद यादव को भी कोई सुविधा नहीं मिली। विडंबना यह कि उनके घर जाने वाले मार्ग पर मानव रहित रेलवे क्रासिंग पर फाटक तक नहीं लगा। जिससे ट्रेन की चपेट में आकर कई लोगों की मौत हो चुकी है। शहीद स्थल कहला की उपेक्षा का दर्द यहां के हर शख्स की जुबान पर है। रामखेलावन, कन्हैया लाल, रामकैलाश, रामआसरे, ओमप्रकाश का कहना है कि शहीद स्थल की उपेक्षा का दर्द है। सरकार की ओर से अभी तक यहां के विकास के लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed