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प्रतिभाए हैं, सुविधाए नहीं, कहां से निकलेंगे सचिन-सहवाग
Wed, 29 May 2019 12:10 AM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 29 May 2019 12:10 AM IST
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स्टेडियम का जर्जर भवन। अमर उजाला
- फोटो : pratapgarh
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जिले में क्रिकेट खिलाडिय़ों के लिए न सुविधाएं हैं न संसाधन। एक ही मैदान में क्रिकेट के अलावा दूसरे खेल में भी होते हैं। कुल 97 बच्चों ने पंजीकरण कराया है, लेकिन उन्हें ट्रेनिंग देने के लिए एकमात्र कोच हैं।
इन खिलाडिय़ों को हर माह दो बैट और 24 बॉल खेलने के लिए स्टेडियम की ओर से दी जाती हैं। दस बीघे की जमीन में बने स्टेडियम में आठ से ज्यादा खेल होते हैं। हर खेल में 50 से ज्यादा खिलाड़ी है।
ऐसे में सुबह-शाम जब खिलाड़ी जुटते हैं तो ग्राउंड छोटा पड़ जाता है। वह सही से प्रैक्टिस नहीं कर पाते हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत क्रिकेट खिलाडिय़ों को होती है। रणजी खेल चुके कोच आदित्य शुक्ल ने बताया कि पहले स्कूलों और कॉलेजों के साथ जिला स्तर पर क्रिकेट प्रतियोगिताएं होती थीं। जिसमें होनहार खिलाडिय़ों को अपनी प्रतिभाएं दिखाने का अवसर मिलता था।
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ऐसे आयोजन से अच्छे खिलाड़ी भी सामने आ जाते थे। मगर अब ऐसा नहीं हो रहा है। कानपुर, लखनऊ और प्रयागराज की तरह अच्छे हास्टल न होने के कारण प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं। क्रिकेट के मैदान के नाम पर महज जिला स्पोट्र्स स्टेडियम ही है, मगर मैदान छोटा है।
जिले से दस खिलाड़ी खेल चुके हैं रणजी ट्राफी में
जिले से रणजी खेलने वाले लोगों की लंबी फेहरिस्त रही है। इनमें आदित्य शुक्ला, धनंजय सिंह, स्व. तनवीर अख्तर, देवेंद्र सिंह, कुमार गौरव, सुनील शुक्ला, विशाल शुक्ला, अंबा प्रसाद, दीपक यादव और सौरभ यादव शामिल हैं।
रणजी खेलने वाले प्रमुख खिलाड़ी
आदित्य शुक्ला वर्ष 1997 से 2001 तक
धनंजय सिंह वर्ष 1999 से 2001 तक
कुमार गौरव वर्ष 1997 से 2003
सुनील शुक्ला 2002 से 2005 तक
विशाल शुक्ला 2000 से 2003
स्व. तनबीर अख्तर 1995 में
स्व. देवेंद्र सिंह 2001 में
सौरभ यादव 2015 में
प्रतियोगिता कराने के लिए लेना पड़ता है जन सहयोग
स्टेडियम में बड़ी प्रतियोगिता कराने के लिए जन सहयोग लेना पड़ता है। जनप्रतिनिधि या फिर जिले के लोग सहयोग करते हैं तब जाकर क्रिकेट का कोई बड़ा आयोजन हो पाता है।
संसाधनों के अभाव में बच्चे खेल नहीं पा रहे हैं। उनकी प्रतिभा सामने नहीं आ पा रही है। हौसला तो है मगर अव्यवस्था के चलते वह आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। दीपक यादव, रणजी खिलाड़ी
स्टेडियम को बढ़ाया जाए। जिससे क्रि केट सीखने के लिए आने वाले बच्चों को सही से मौका मिल पाए। तब होनहार बच्चों की प्रतिभा सामने आएगी। जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से कई बार स्टेडियम को बढ़वाने की मांग की गई है।
आदित्य शुक्ला, कोच स्टेडियम
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इन खिलाडिय़ों को हर माह दो बैट और 24 बॉल खेलने के लिए स्टेडियम की ओर से दी जाती हैं। दस बीघे की जमीन में बने स्टेडियम में आठ से ज्यादा खेल होते हैं। हर खेल में 50 से ज्यादा खिलाड़ी है।
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ऐसे में सुबह-शाम जब खिलाड़ी जुटते हैं तो ग्राउंड छोटा पड़ जाता है। वह सही से प्रैक्टिस नहीं कर पाते हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत क्रिकेट खिलाडिय़ों को होती है। रणजी खेल चुके कोच आदित्य शुक्ल ने बताया कि पहले स्कूलों और कॉलेजों के साथ जिला स्तर पर क्रिकेट प्रतियोगिताएं होती थीं। जिसमें होनहार खिलाडिय़ों को अपनी प्रतिभाएं दिखाने का अवसर मिलता था।
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ऐसे आयोजन से अच्छे खिलाड़ी भी सामने आ जाते थे। मगर अब ऐसा नहीं हो रहा है। कानपुर, लखनऊ और प्रयागराज की तरह अच्छे हास्टल न होने के कारण प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं। क्रिकेट के मैदान के नाम पर महज जिला स्पोट्र्स स्टेडियम ही है, मगर मैदान छोटा है।
जिले से दस खिलाड़ी खेल चुके हैं रणजी ट्राफी में
जिले से रणजी खेलने वाले लोगों की लंबी फेहरिस्त रही है। इनमें आदित्य शुक्ला, धनंजय सिंह, स्व. तनवीर अख्तर, देवेंद्र सिंह, कुमार गौरव, सुनील शुक्ला, विशाल शुक्ला, अंबा प्रसाद, दीपक यादव और सौरभ यादव शामिल हैं।
रणजी खेलने वाले प्रमुख खिलाड़ी
आदित्य शुक्ला वर्ष 1997 से 2001 तक
धनंजय सिंह वर्ष 1999 से 2001 तक
कुमार गौरव वर्ष 1997 से 2003
सुनील शुक्ला 2002 से 2005 तक
विशाल शुक्ला 2000 से 2003
स्व. तनबीर अख्तर 1995 में
स्व. देवेंद्र सिंह 2001 में
सौरभ यादव 2015 में
प्रतियोगिता कराने के लिए लेना पड़ता है जन सहयोग
स्टेडियम में बड़ी प्रतियोगिता कराने के लिए जन सहयोग लेना पड़ता है। जनप्रतिनिधि या फिर जिले के लोग सहयोग करते हैं तब जाकर क्रिकेट का कोई बड़ा आयोजन हो पाता है।
संसाधनों के अभाव में बच्चे खेल नहीं पा रहे हैं। उनकी प्रतिभा सामने नहीं आ पा रही है। हौसला तो है मगर अव्यवस्था के चलते वह आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। दीपक यादव, रणजी खिलाड़ी
स्टेडियम को बढ़ाया जाए। जिससे क्रि केट सीखने के लिए आने वाले बच्चों को सही से मौका मिल पाए। तब होनहार बच्चों की प्रतिभा सामने आएगी। जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से कई बार स्टेडियम को बढ़वाने की मांग की गई है।
आदित्य शुक्ला, कोच स्टेडियम