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हे सुरुज देव, देईहैं अशीष...
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़।
Updated Sun, 06 Nov 2016 11:40 PM IST
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डाला छठ पर रविवार शाम सई किनारे बेल्हा देवी तट पर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। पुत्र और परिवार की सुख समृद्धि के लिए महिलाओं ने अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर आशीष सहेजा। सैकड़ों की भीड़ घाट पर जमा रही। सई नदी के जल में खड़े होकर डूबते सूर्य देवता और छठी मइया को अर्घ्य दिया। सैकड़ों की संख्या में नदी में उतरी व्रतधारियों ने सूप में मौसमी फल-फूल, मिष्ठान नारियल, ठेकुवा, पोहा, गन्ने का प्रसाद चढ़ाया। मनोकामना पूरी होने पर कोशी भरने की परंपरा निभाई गई। नदी में मेले और गन्ने से बनाए गए मंडप आकर्षक का केंद्र बने रहे। घाट पर देवी जागरण की धूम रही। रात को नदी का दीयो से जगमगा उठा। मानों तारे जमीं पर उतर आए हो। महिला पुलिस फोर्स का इंतजाम दिखा। छठ पूजा समिति के लोेग मेले की व्यवस्था को संभाले नजर आए।
वैसे तो डाला छठ की शुरुआत तीन दिन पहले नहाय खाय के साथ हो गई थी। शनिवार को खरना के साथ निर्जला व्रत रखकर महिलाओं ने छठ पूजा की विधिवत शुरुआत की। छठेें दिन रविवार को बेल्हादेवी मंदिर पर सई नदी के घाट पर छठ मइया की पूजा धूमधाम से गाजे-बाजे और आतिशबाजी के साथ हुई। दिन भर निर्जला व्रत रखने वाली महिलाएं गाजे-बाजे के साथ मंदिर पर पहुंची। सई नदी की बालू से कलश की स्थापना की गई। सूप में सारा सामान सजाकर सूर्य के डूबने का इंतजार करने लगी। सूर्य लाल पड़ने लगा तो महिलाएं और पुरुष सूप हाथ में लेकर सई नदी में उतरने के बाद पश्चिम की तरफ मुंह करके खड़े हो गए। महिलाएं सूप लेकर पानी में परिक्रमा करने लगीं। पांच बार सूर्य की परिक्रमा कर बेटों और घरवालों से सूप पर अर्घ्य दिलवाया। अर्घ्य देकर आशीष सहेजने के लिए घरवालों के साथ दूसरे भी आते रहे। डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर आरती उतारी गई। घाट की पूजा संपन्न करने के बाद घर पहुंचकर कोशी भरने की पूजा हुई। सोमवार को रात में चार बजे सई नदी के घाट पर पहुंच कर नए फल,फूल इत्यादि से इसी तरह पूजा होगी। इस बार उगते सूर्य को अर्घ्य देकर उनकी पूजा की जाएगी।
आसामान में छाई धुंध में सूर्य की आंख मिचौली ने सई नदी जल में खड़ी महिलाओं को कुछ देर तक संशय में डाल दिया था। शाम पांच बजे के बाद सूर्य दिखाई देना बंद हो गया। उसके दोबारा निकलने के इंतजार में महिलाओं ने सूर्य को प्रसन्न करने के लिये कुछ इस तरह से वंदना शुरू कर दी, उगऊ-उगऊ सूरज काहे लगौले देर हो...। कहां छिप गइले सूरज देवता....।
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सेल्फी लेने को लगी रही होड़
पूजा के समय सई नदी के तट पर सेल्फी लेने वालाें की कमी नहीं रही। पत्नी और बच्चों के संग लोग मोबाइल से सेल्फी लेते नजर आये। इसके लिये लोग नदी के जल में भी कूदने से बाज नहीं आए।
ग्रामीण अंचल में भी छठ पूजा की धूमः शिवगढ़। क्षेत्र के कठार व अन्य इलाके की महिलाओं ने रविवार की शाम सई नदी के जामताली घाट पर भगवान सूर्य देव को अर्घ्य दिया। छठ पूजा को लेकर ग्रामीणांचलों में काफी उत्साह रहा। लोग गाजे बाजे के साथ घाट पर पहुंचे। इस दौरान उपवास रखने वाली महिला और पुरुषों ने घाट पर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देकर अपने लिए मंगलकामना की। साथ ही विधि विधान से छठ माता की आराधना की।
केले और गन्ने का होता है विशेष महत्व
मंडप में सजे केले और गन्ने का विशेष महत्व होता है। बिहार के पंडित रामराज चौबे दोनो के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भगवान विष्णु की पूजा में केले के पत्ते का विशेष महत्व होता है। एकादशी में भगवान विष्णु शयन से उठते हैं। उगते और डूबते सूर्य की किरणों में भी उनका अंश माना जाता है। गन्ने को नई फसल के रूप में चढ़ाया जाता है। इसके पीछे साल अच्छी फसलों के पैदावार का तर्क बताया। इसलिये केले और गन्ने का महत्व है।
कोेशी भरकर छठ मइया को किया प्रसन्न
मनौती पूरी होने से प्रसन्न व्रतधारी महिलाओं ने हंसी-खुशी मिट्टी से बनी कोशी भरकर छठ मइया को प्रसन्न किया। आज ही के दिन मनौती पूरी होने के बाद कोशी भरने की परंपरा निभाई गई। इसी तरह से मनौती पूरी होने पर महिलाएं मंदिर के प्रवेश द्वार से लेटकर घाट तक पहुंची। उधर मां बेल्हादेवी घाट पर देवी जागरण हुआ। इस दौरान देवी के जयकारे की गूंज से पूरा बेल्हा घाट गुंजायमान रहा। महिलाएं छठ मइया का गीत गाते हुए मंदिर पहुंचीं।
भारी पड़ी आस्था, दूषित जल में भी लगाई डुबकी
प्रतापगढ़। सई नदी का जल भले ही दूषित है, मगर उस पर आस्था भारी पड़ी। रविवार को छठ पूजा पर सूर्य को अर्घ्य देने सैकड़ों की संख्या में उमड़ी महिलाओं की भीड़ ने बेहिचक सई के पानी का अचमन किया। इतना ही आस्था से लवरेज व्रतधारी महिलाओं ने परिवार संग उसमें स्नान कर काया को पवित्र करने से भी नहीं चूकी। संग आये परिवार को भी सई गंगा के जल का छिड़ककर पवित्र किया गया।
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वैसे तो डाला छठ की शुरुआत तीन दिन पहले नहाय खाय के साथ हो गई थी। शनिवार को खरना के साथ निर्जला व्रत रखकर महिलाओं ने छठ पूजा की विधिवत शुरुआत की। छठेें दिन रविवार को बेल्हादेवी मंदिर पर सई नदी के घाट पर छठ मइया की पूजा धूमधाम से गाजे-बाजे और आतिशबाजी के साथ हुई। दिन भर निर्जला व्रत रखने वाली महिलाएं गाजे-बाजे के साथ मंदिर पर पहुंची। सई नदी की बालू से कलश की स्थापना की गई। सूप में सारा सामान सजाकर सूर्य के डूबने का इंतजार करने लगी। सूर्य लाल पड़ने लगा तो महिलाएं और पुरुष सूप हाथ में लेकर सई नदी में उतरने के बाद पश्चिम की तरफ मुंह करके खड़े हो गए। महिलाएं सूप लेकर पानी में परिक्रमा करने लगीं। पांच बार सूर्य की परिक्रमा कर बेटों और घरवालों से सूप पर अर्घ्य दिलवाया। अर्घ्य देकर आशीष सहेजने के लिए घरवालों के साथ दूसरे भी आते रहे। डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर आरती उतारी गई। घाट की पूजा संपन्न करने के बाद घर पहुंचकर कोशी भरने की पूजा हुई। सोमवार को रात में चार बजे सई नदी के घाट पर पहुंच कर नए फल,फूल इत्यादि से इसी तरह पूजा होगी। इस बार उगते सूर्य को अर्घ्य देकर उनकी पूजा की जाएगी।
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आसामान में छाई धुंध में सूर्य की आंख मिचौली ने सई नदी जल में खड़ी महिलाओं को कुछ देर तक संशय में डाल दिया था। शाम पांच बजे के बाद सूर्य दिखाई देना बंद हो गया। उसके दोबारा निकलने के इंतजार में महिलाओं ने सूर्य को प्रसन्न करने के लिये कुछ इस तरह से वंदना शुरू कर दी, उगऊ-उगऊ सूरज काहे लगौले देर हो...। कहां छिप गइले सूरज देवता....।
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सेल्फी लेने को लगी रही होड़
पूजा के समय सई नदी के तट पर सेल्फी लेने वालाें की कमी नहीं रही। पत्नी और बच्चों के संग लोग मोबाइल से सेल्फी लेते नजर आये। इसके लिये लोग नदी के जल में भी कूदने से बाज नहीं आए।
ग्रामीण अंचल में भी छठ पूजा की धूमः शिवगढ़। क्षेत्र के कठार व अन्य इलाके की महिलाओं ने रविवार की शाम सई नदी के जामताली घाट पर भगवान सूर्य देव को अर्घ्य दिया। छठ पूजा को लेकर ग्रामीणांचलों में काफी उत्साह रहा। लोग गाजे बाजे के साथ घाट पर पहुंचे। इस दौरान उपवास रखने वाली महिला और पुरुषों ने घाट पर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देकर अपने लिए मंगलकामना की। साथ ही विधि विधान से छठ माता की आराधना की।
केले और गन्ने का होता है विशेष महत्व
मंडप में सजे केले और गन्ने का विशेष महत्व होता है। बिहार के पंडित रामराज चौबे दोनो के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भगवान विष्णु की पूजा में केले के पत्ते का विशेष महत्व होता है। एकादशी में भगवान विष्णु शयन से उठते हैं। उगते और डूबते सूर्य की किरणों में भी उनका अंश माना जाता है। गन्ने को नई फसल के रूप में चढ़ाया जाता है। इसके पीछे साल अच्छी फसलों के पैदावार का तर्क बताया। इसलिये केले और गन्ने का महत्व है।
कोेशी भरकर छठ मइया को किया प्रसन्न
मनौती पूरी होने से प्रसन्न व्रतधारी महिलाओं ने हंसी-खुशी मिट्टी से बनी कोशी भरकर छठ मइया को प्रसन्न किया। आज ही के दिन मनौती पूरी होने के बाद कोशी भरने की परंपरा निभाई गई। इसी तरह से मनौती पूरी होने पर महिलाएं मंदिर के प्रवेश द्वार से लेटकर घाट तक पहुंची। उधर मां बेल्हादेवी घाट पर देवी जागरण हुआ। इस दौरान देवी के जयकारे की गूंज से पूरा बेल्हा घाट गुंजायमान रहा। महिलाएं छठ मइया का गीत गाते हुए मंदिर पहुंचीं।
भारी पड़ी आस्था, दूषित जल में भी लगाई डुबकी
प्रतापगढ़। सई नदी का जल भले ही दूषित है, मगर उस पर आस्था भारी पड़ी। रविवार को छठ पूजा पर सूर्य को अर्घ्य देने सैकड़ों की संख्या में उमड़ी महिलाओं की भीड़ ने बेहिचक सई के पानी का अचमन किया। इतना ही आस्था से लवरेज व्रतधारी महिलाओं ने परिवार संग उसमें स्नान कर काया को पवित्र करने से भी नहीं चूकी। संग आये परिवार को भी सई गंगा के जल का छिड़ककर पवित्र किया गया।