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बसों में अटकी रहती है बच्चों की जान
ब्यूरो/अमर उजाला प्रतापगढ़
Updated Tue, 14 Apr 2015 11:20 PM IST
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कान्वेंट और निजी स्कूलों में फीस बढ़ने के साथ ही संचालकों ने बसों के किराए में 200 से 400 रुपये बढ़ा दिया है। किराया अधिक वसूलने के बाद भी बसों में बच्चों के बैठने की जगह नहीं मिलती है। आलम यह रहता है कि 40 सीट वाली बसों में 75-80 बच्चों को ठूस दिया जाता है। बसों में भीड़ अधिक होने से घर पहुंचने तक बच्चों की जान थमी रहती है। संचालकों की इसी लापरवाही के चलते आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं।
जिले के 432 कान्वेंट और निजी स्कूलों में से 143 स्कूलों को बसों के संचालन की अनुमति मिली हुई है। डीजल की कीमतों में कई चरणों में लगभग 25 रुपये तक की कमी के बावजूद ज्यादातर स्कूलों ने बस किराए में बढ़ोतरी कर दी है। बसों का किराया बढ़ाने के बाद भी बच्चों को बैठने लिए सीट नहीं मिलती है। 40 सीटों वाली बसों पर बच्चों को ठूंस-ठूंसकर भरा जाता है। यह हम नहीं रिकार्ड कहते हैं। पिछले माह बाबागंज में एक बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। उसमें जब बच्चों की संख्या गिनी गई तो लोग दंग रह गए।
मौजूद लोगों ने बस में 73 बच्चे पाए थे। बस में जगह कम होने से कुछ बच्चे दरवाजे पर खड़े रहते हैं तो कुछ ड्राईवर की सीट के बगल खड़े रहते हैं। जिस दिन बस खराब हो जाती है उस दिन बच्चों का घर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। नियमानुसार बसों के शीशे के बाहर जाली या लोहे के राड लगी रहनी चाहिए, ताकि बच्चे गिरने न पाएं लेकिन यहां तो बसों में सुरक्षा गार्ड भी नहीं होते हैं।
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जिले के 432 कान्वेंट और निजी स्कूलों में से 143 स्कूलों को बसों के संचालन की अनुमति मिली हुई है। डीजल की कीमतों में कई चरणों में लगभग 25 रुपये तक की कमी के बावजूद ज्यादातर स्कूलों ने बस किराए में बढ़ोतरी कर दी है। बसों का किराया बढ़ाने के बाद भी बच्चों को बैठने लिए सीट नहीं मिलती है। 40 सीटों वाली बसों पर बच्चों को ठूंस-ठूंसकर भरा जाता है। यह हम नहीं रिकार्ड कहते हैं। पिछले माह बाबागंज में एक बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। उसमें जब बच्चों की संख्या गिनी गई तो लोग दंग रह गए।
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मौजूद लोगों ने बस में 73 बच्चे पाए थे। बस में जगह कम होने से कुछ बच्चे दरवाजे पर खड़े रहते हैं तो कुछ ड्राईवर की सीट के बगल खड़े रहते हैं। जिस दिन बस खराब हो जाती है उस दिन बच्चों का घर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। नियमानुसार बसों के शीशे के बाहर जाली या लोहे के राड लगी रहनी चाहिए, ताकि बच्चे गिरने न पाएं लेकिन यहां तो बसों में सुरक्षा गार्ड भी नहीं होते हैं।
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