{"_id":"578a80b54f1c1b027d14106e","slug":"awaas-vikas-yojana1","type":"story","status":"publish","title_hn":"शहर में सर्किल रेट से दस गुना महंगी जमीन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शहर में सर्किल रेट से दस गुना महंगी जमीन
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
Updated Sun, 17 Jul 2016 12:23 AM IST
विज्ञापन
- फोटो : Demo pic
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शहर की जमीन इतनी महंगी हो गई है कि आम आदमी के लिए प्लाट खरीदकर मकान बनवाना संभव नहीं है। भूमाफिया की मिलीभगत के चलते सर्किल रेट से दस गुना अधिक दर पर प्लाट बेचे जा रहे हैं। साधारणतया एक विस्वा जमीन की कीमत दस -बारह लाख रुपये है। छोटी नौकरी और छोटा व्यवसाय करने वाले लोगों के लिए इतना रुपया एकत्रित करना टेढ़ी खीर है। शहर के किसी भी मुहल्ले में खाली पड़ी जमीन किसी न किसी भूमाफिया की है। यह भूमाफिया मोटी रकम कमाने के चक्कर में आपस में सांठ-गांठ कर रखे हैं कि इससे कम रुपये में प्लाट नहीं बेचना है। इससे शहर में प्लाटिंग की जमीन दस से बारह लाख रुपये विस्वा बिक रही है। इतनी महंगी जमीन लेकर एक साधारण आदमी अपना मकान नहीं बना सकता है।
एक विस्वा जमीन में मकान बनवाने के लिए करीब 15 लाख रुपये की आवश्यकता पड़ती है। कोई साधारण व्यक्ति दस लाख रुपये की जमीन खरीदे और 15 लाख रुपये मकान बनाने में खर्च करे, या संभव नहीं होता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि राष्ट्रीयकृत बैंक साधारण लोगों को ऋण भी नहीं देते हैं। बैंक की पहली शर्त होती है कि जो व्यक्ति ऋण ले रहा है वह आयकर दाता है या नहीं। अगर नहीं है तो उसे ऋण देने को तैयार नहीं होते हैं। जबकि आवास विकास परिषद किश्तों में रुपये जमा कराता है। प्रत्येक महीने होने वाले किश्त की कटौती के चलते आम आदमी पर बोझ नहीं पड़ता है। दरअसल जमीन की कीमत डीलरों ने बढ़ा दी है। भूमाफिया ने अपने दलाल सेट कर रखें है, जो ग्राहक लेकर जाते हैं। उसे भी कमीशन देते हैं। इससे महंगी जमीन बेचने को मजबूर होते हैं। डीलरों के इस खेल में आवास विकास परिषद की दाल नहीं गल पा रही है।
विज्ञापन
एक विस्वा जमीन में मकान बनवाने के लिए करीब 15 लाख रुपये की आवश्यकता पड़ती है। कोई साधारण व्यक्ति दस लाख रुपये की जमीन खरीदे और 15 लाख रुपये मकान बनाने में खर्च करे, या संभव नहीं होता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि राष्ट्रीयकृत बैंक साधारण लोगों को ऋण भी नहीं देते हैं। बैंक की पहली शर्त होती है कि जो व्यक्ति ऋण ले रहा है वह आयकर दाता है या नहीं। अगर नहीं है तो उसे ऋण देने को तैयार नहीं होते हैं। जबकि आवास विकास परिषद किश्तों में रुपये जमा कराता है। प्रत्येक महीने होने वाले किश्त की कटौती के चलते आम आदमी पर बोझ नहीं पड़ता है। दरअसल जमीन की कीमत डीलरों ने बढ़ा दी है। भूमाफिया ने अपने दलाल सेट कर रखें है, जो ग्राहक लेकर जाते हैं। उसे भी कमीशन देते हैं। इससे महंगी जमीन बेचने को मजबूर होते हैं। डीलरों के इस खेल में आवास विकास परिषद की दाल नहीं गल पा रही है।
विज्ञापन