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काला पानी, बंट गई जलधारा, सई बेसहारा
ब्यूरो/अमर उजाला प्रतापगढ़
Updated Mon, 11 May 2015 11:26 PM IST
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हरदोई जनपद में झील से निकलने वाली सई नदी जिले के पश्चिम में अठेहा के मुस्तफाबाद गांव से प्रवेश कर करीब 70 किमी की दूरी तय करने के बाद जौनपुर में गोमती नदी में मिल जाती है। जिले के अंदर बहने वाली यह सबसे बड़ी नदी है। प्रतापगढ़ शहर के अलावा तमाम छोटे-छोटे कस्बे और गांव इस नदी के किनारे पड़ते हैं। कई गांवों के लोग तो इसके पानी को पीने तक के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इन दिनों इसका पानी इस कदर गंदा हो गया है कि पीना तो दूर इससे नहाना भी मुमकिन नहीं है। शहर में गायघाट से प्रवेश करने के बाद नदी में भारी गंदगी है। बेल्हा देवी मंदिर के दोनों तरफ दो बड़े नाले आकर नदी में गिरते हैं। इससे पूरे शहर की गंदगी सई में आ रही है।
मंदिर के सामने बने घाट गायब हो गए हैं। हर तरफ बजबजाते कूड़े के ढेर और पालीथिन पड़ी हुई है। हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु बेल्हा देवी मंदिर में पूजा और प्रसाद चढ़ाने आते हैं। यहीं भोजन भी बनता है। इसके बाद पत्तल और झूठन सामग्री नदी में फेंक दी जाती है। इतना ही फूल-माला और चुनरी भी नदी में प्रवाहित कर दी जाती है। नदी में लाश भी फेंकी जा रही है।
सोमवार को बेल्हा देवी पुल के आगे एक काफी पुरानी लाश नदी में पत्थर के सहारे अटकी पड़ी थी। पुल के आगे पत्थर और बालू के कारण बांध बन गया है। गंदगी और काई इस कदर जमी है कि यहां नदी पांच अलग-अलग धाराओं में बह रही है। इससे करीब दो किमी आगे कादीपुर घाट के पास नदी में घुटने भर भी पानी नहीं है। देखने पर नीचे की सतह साफ नजर आती है। नदी में चारों तरफ तरफ सिर्फ काई और झाड़ियां हैं। सौ मीटर से भी ज्यादा चौड़ी सई नदी यहां नहर बन गई है। इतना भी पानी नहीं है कि जानवर भी ठीक तरह से अपनी प्यास बुझा सके। शहर के अलावा ग्रामीण क्षेत्र में भूलियापुर, मोहनगंज, सांगीपुर, अठेहा समेत कई पमुख बाजार और कस्बे इस नदी के किनारे पड़ते हैं। वहां की सारी गंदगी भी नदी में बहाई जा रही है।
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सई नदी गंदगी और कूड़े-कचरे के कारण पटी हुई है। बेल्हा देवी मंदिर समेत शहर में इसके किनारे बने घाट पूरी तरह से गायब हो गए हैं, लेकिन जिला प्रशासन को कुछ नहीं दिखाई दे रहा है। नगरपालिका तो जैसे बेहोशी की हालत में है। किसी को घाटों की सफाई की फिक्र नहीं है। गंदगी के कारण घाटों पर लोगों का बैठना मुश्किल है। नगरपालिका के सफाई कर्मचारी कभी यहां दिखाई नहीं देते हैं।
बेल्हा देवी घाट पर सई नदी के किनारे हर साल गंगा दशहरा का कार्यक्रम धूमधाम से मनाया आता है। इस बार 28 मई को यह आयोजन होना है, लेकिन नदी और घाटों की जो हालत है, उसे देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि इस बार यहां गंगा दशहरा कैसे मनाया जाएगा। इस कार्यक्रम में सई की महाआरती के साथ घाट के किनारे ग्यारह हजार दीप जलाए जाते हैं। अगर हालात यही रहे तो इस बार दीप जलाने के लिए घाट ढूंढने पड़ेंगे।
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मंदिर के सामने बने घाट गायब हो गए हैं। हर तरफ बजबजाते कूड़े के ढेर और पालीथिन पड़ी हुई है। हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु बेल्हा देवी मंदिर में पूजा और प्रसाद चढ़ाने आते हैं। यहीं भोजन भी बनता है। इसके बाद पत्तल और झूठन सामग्री नदी में फेंक दी जाती है। इतना ही फूल-माला और चुनरी भी नदी में प्रवाहित कर दी जाती है। नदी में लाश भी फेंकी जा रही है।
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सोमवार को बेल्हा देवी पुल के आगे एक काफी पुरानी लाश नदी में पत्थर के सहारे अटकी पड़ी थी। पुल के आगे पत्थर और बालू के कारण बांध बन गया है। गंदगी और काई इस कदर जमी है कि यहां नदी पांच अलग-अलग धाराओं में बह रही है। इससे करीब दो किमी आगे कादीपुर घाट के पास नदी में घुटने भर भी पानी नहीं है। देखने पर नीचे की सतह साफ नजर आती है। नदी में चारों तरफ तरफ सिर्फ काई और झाड़ियां हैं। सौ मीटर से भी ज्यादा चौड़ी सई नदी यहां नहर बन गई है। इतना भी पानी नहीं है कि जानवर भी ठीक तरह से अपनी प्यास बुझा सके। शहर के अलावा ग्रामीण क्षेत्र में भूलियापुर, मोहनगंज, सांगीपुर, अठेहा समेत कई पमुख बाजार और कस्बे इस नदी के किनारे पड़ते हैं। वहां की सारी गंदगी भी नदी में बहाई जा रही है।
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सई नदी गंदगी और कूड़े-कचरे के कारण पटी हुई है। बेल्हा देवी मंदिर समेत शहर में इसके किनारे बने घाट पूरी तरह से गायब हो गए हैं, लेकिन जिला प्रशासन को कुछ नहीं दिखाई दे रहा है। नगरपालिका तो जैसे बेहोशी की हालत में है। किसी को घाटों की सफाई की फिक्र नहीं है। गंदगी के कारण घाटों पर लोगों का बैठना मुश्किल है। नगरपालिका के सफाई कर्मचारी कभी यहां दिखाई नहीं देते हैं।
बेल्हा देवी घाट पर सई नदी के किनारे हर साल गंगा दशहरा का कार्यक्रम धूमधाम से मनाया आता है। इस बार 28 मई को यह आयोजन होना है, लेकिन नदी और घाटों की जो हालत है, उसे देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि इस बार यहां गंगा दशहरा कैसे मनाया जाएगा। इस कार्यक्रम में सई की महाआरती के साथ घाट के किनारे ग्यारह हजार दीप जलाए जाते हैं। अगर हालात यही रहे तो इस बार दीप जलाने के लिए घाट ढूंढने पड़ेंगे।