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नदियां उफनाईं तो हाथ मलेगा प्रशासन

Wed, 19 Jun 2013 05:30 AM IST
Pratapgarh
Pratapgarh Updated Wed, 19 Jun 2013 05:30 AM IST
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प्रतापगढ़। बारिश हर दिन जिले के लोगाें की मुश्किल बढ़ा रही है। सबसे अधिक दिक्कत शहरियों को हो रही है। दो माह के भीतर सई और गंगा नदी में ही डूबने से दस लोगों की मौत हो चुकी है। ऐसे में बारिश में जिले की नदियां उफनाईं तो जिला प्रशासन हाथ मलेगा और जनपदवासी सिर्फ आंसू बहाएंगे।
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हर साल हादसों के बाद भी जिला प्रशासन बाढ़ की विभीषिका को लेकर गंभीर नहीं है। सई नदी के पीरूपुर घाट का हादसा लोग अभी तक भूले नहीं हैं। अंतू थाने की सीमा पर पीरूपुर में 25 सितंबर 2008 को नाव पलटने से 13 स्कूली बच्चाें समेत 16 लोगों की मौत हो गई थी। इस बीच उत्तरांचल में आई बाढ़ देखकर ही लोग कांप उठे हैं। जिला प्रशासन अगर इसी प्रकार सोता रहा तो जिले की नदियां फिर जानलेवा साबित हो सकती हैं। नदियों में काफी कम पानी होने की दशा में भी हाल की घटनाओं पर गौर करें तो जिला प्रशासन पूरी तरह से हाथ बांधे रहा। पखवारे भर के भीतर सई नदी में बेल्हा देवी मंदिर के पास ही तीन किशोरों की मौत हो चुकी है। बेल्हा देवी के पास डूबे आजाद नगर के किशोर का शव तो एक नाविक ने कुछ ही देर में निकाल लिया लेकिन कुछ ही दूरी पर रेलवे पुल के नीचे डूबे जोगापुर कांशीराम कालोनी के दो किशोरों के शव दूसरे दिन मिल सके।
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कुछ ऐसा ही हाल गंगा नदी में भी देखा गया। बारिश से पहले एक माह के भीतर गंगा में डूबने से साथ लोगों की मौत हो गई। कहीं भी बचाव का कोई उपाय नहीं दिखा। शव खोजने में भी जिला प्रशासन हाथ बांधे बैठा रहा। गंगा नदी में हौदेश्वर नाथ धाम पर दो लड़के डूबकर मरे और शाहाबाद घाट पर एक की मौत हुई। कालाकांकर और खमसरा घाट पर भी नदी में डूबने से दो-दो मौतें पिछले माह हो चुकी हैं। एक बार फिर बारिश सिर पर है और जिला प्रशासन सिर्फ कागजी किले तैयार कर रहा है।
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जिले की नदियों में हादसे होने के बाद जिला प्रशासन नाव और गोताखोराें की तलाश करता है। प्रशासन के पास न तो नाव है और न गोताखोर। हादसों के बाद नाव और गोताखोर इलाहाबाद से बुलाए जाते हैं। कुछ नदियों में चलने वाली नावें खोजने तक डूबने वालों के शव काफी दूर बह जाते हैं। पीरूपुर हादसे के बाद बाढ़ से निबटने के लिए नाव और गोताखोरों की व्यवस्था करने की बात कही गई थी लेकिन पांच साल बाद भी कोई व्यवस्था नहीं हो सकी।
पीरूपुर नाव हादसे के बाद तत्कालीन सांसद अक्षय प्रताप सिंह गोपाल जी ने स्टीमर खरीदने के लिए अपनी निधि से दस लाख रुपये देने की बात कही थी लेकिन उनकी घोषणा अमल में नहीं आ सकी। सांसद ने स्टीमर खरीद के लिए सांसद निधि से पैसा देने की बाबत तत्कालीन डीएम सेंथिल पांडियन सी को पत्र भी दिया था।
इनसेट
मानधाता से होकर गुजरी बकुलाही नदी और उदयपुर का मट्टन नाला भी जानलेवा हो जाता है। लगभग हर बारिश में यहां लोगों के डूबकर मरने की घटनाएं होती हैं। हादसों के बाद तो जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अफसर सक्रियता दिखाते हैं लेकिन बाद में भूल जाते हैं। मट्टन नाले से तो हर साल 8-10 गांव बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं। इस बार भी बारिश आने से पहले इन इलाकों के लोग परेशान हो उठे हैं।
जिले में बारिश अभी शुरू ही हुई है लेकिन सई नदी का जलस्तर बढ़ने लगा है। हरदोई झील से निकली सई नदी वैसे तो पूरे साल रायबरेली की मिलों का कचरा बहाती है। बारिश में ही इसमें उफान आता है। अभी तक नदी के एक किनारे से ही पानी बह रहा था लेकिन बारिश होने के साथ ही इसका जलस्तर बढ़ने लगा। दो दिन की बारिश में नदी का जलस्तर बेल्हादेवी धाम की सीढ़ियों तक आ पहुंचा।

प्रभारी जिलाधिकारी / मुख्य विकास अधिकारी राम अरज मौर्य ने कहा कि जिले में बाढ़ की कार्ययोजना तैयार की गई है। अभी बाढ़ की स्थिति नहीं है। पानी बढ़ने के बाद सभी नदियों के घाटों पर मुकम्मल व्यवस्था की जाएगी।
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