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बूथों की सुरक्षा करने वालों की अनदेखी

Sun, 24 Mar 2019 07:39 PM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Sun, 24 Mar 2019 07:39 PM IST
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बूथों की सुरक्षा करने वालों की अनदेखी
बूथों की सुरक्षा करने वालों की अनदेखी
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चौकीदारों, होमगार्डों से भी कम मिलता है मानदेय
अमर उजाला ब्यूरो
प्रतापगढ़। लोकसभा चुनाव में बूथों की सुरक्षा के लिए 11 घंटेमुस्तैद रहने वाले सिपाहियों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। चौकीदारों से भी कम मानदेय सिपाहियों को दिया जा रहा है। अपने साथ हो रहे सौतेले व्यवहार से सिपाही खिन्न हैं।
लोकसभा चुनाव के लिए कर्मचारियों के साथ ही पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाती है। अफसर हर विधानसभा क्षेत्र में दूसरे इलाके के कर्मचारियों को ड्यूटी पर भेजते हैं। जनपद में 2616 बूथों पर चुनाव कराने के लिए तैनात होने वाले मतदान कर्मियों को नाश्ता और खाना के लिए मानदेय का भुगतान बूथ पर ही इस बार दिया जाएगा। चुनाव आयोग के निर्देश के मुताबिक जोनल और स्टेटिक मजिस्ट्रेटों को 1500 रुपये, पीठासीन अधिकारियों को 1550 रुपये, मतदान अधिकारी प्रथम 1150, मतदानकर्मी द्वितीय 900, तृतीय के लिए 600 रुपये निर्धारित किया गया है। इन्हें सेक्टर प्रभारी बूथों पर ही मानदेय देंगे। चुनाव ड्यूटी करने वाले चौकीदारों व होमगार्डों को हर दिन 200 रुपये दिया जाता है। जबकि बूथों की सुरक्षा में अपने जान की बाजी लगाने वाले पुलिसकर्मियों को सबसे कम मानदेय 150 रुपये दिया जा रहा है। इस संबंध में एएसपी अवनीश मिश्रा का कहना है कि आयोग ने जो मानदेय निर्धारित किया है, वही सिपाहियों को दिया जाता है। यह निर्णय तो आयोग का है।
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चुनावी बहार, कार्यकर्ता हो रहे तैयार
पार्टी से नहीं मतलब, प्रत्याशी की हैसियत देख हो रहा जुड़ाव
प्रतापगढ़। साइकिल पर झोला टांगकर पोस्टर लगाने और बिल्ला बांटने वाले कार्यकर्ताओं के दिन लद गए। अब कार्यकर्ता प्रत्याशी की जेब देखकर उससे जुड़ रहे हैं और चुनाव को सीजनल बिजनेस समझ रहे हैं।
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हर नेता क्षेत्र के कोने-कोने में अपनी मजबूत पैठ बनाने के लिए कार्यकर्ताओं की तलाश करता है। ऐसे लोग मिलते भी हैं जो हर चुनाव में अपने नेता के लिए पसीना बहाते हैं। पहले एक कार्यकर्ता साइकिल लेकर निकलता था तो हफ्तों बाद अपने नेता के पास आकर इलाके का हाल चाल बताता था। गांव में किसी के यहां पानी पीकर तो कहीं परिचित के घर खाना खाकर अभियान में जुटा रहता था। पिछले कुछ चुनावों से नेता के जीतने के बाद निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की बातें सामने आने लगी हैं। ऐसे में कार्यकर्ता भी अपनी निष्ठा और समर्पण भूल गए हैं। अब वह हर काम के लिए अलग से रेट तय करने लगे हैं। साथ रहकर अगर हर सभा में जिंदाबाद बोलना है तो उसका रेट अलग है। मीटिंगों के आयोजन की व्यवस्था करने वाली टीम में जुड़ने के लिए अलग से पैसा तय किया जा रहा है। चुनाव प्रचार से जुड़ने वाले हर शख्स के मन में सिर्फ यही बात है कि पांच साल में एक, दो बार आने वाले इस सीजनल कारोबार में वह कितना जुगाड़ कर लेता है।
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