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Pilibhit News: माधोटांडा में होली के दूसरे दिन रहती है महिलाओं की सत्ता
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माधोटांडा में होली खेलती महिलाएं । फाइल फोटो
पुराने समय से चली आ रही परंपरा को आज भी निभा रहीं महिलाएं
संंवाद न्यूज एजेंसी
कलीनगर। रजवाड़े के रूप में प्रसिद्ध रहे माधोटांडा गांव में प्राचीन काल से महिलाओं की ओर से विशेष होली मनाई जाती रही है। होली के दूसरे दिन महिलाओं का सड़कों पर राज रहता है। वे सड़कों पर निकलकर जमकर रंग खेलती हैं। महिलाओं के सम्मान में पुरुष गांव से बाहर या खेतों में चले जाते हैं। इस बार भी महिलाएं जोश के साथ रजवाड़े की होली की तैयारी में जुटी हैं।
माधोटांडा में दशकों पुुरानी परंपरा आज भी कायम है। कस्बा निवासी शीला सिंह व महेशा देवी बताती है कि समय के साथ थोड़ा परिवर्तन जरूर आया है, लेकिन आज भी होली के दूसरे दिन महिलाएं मंदिर में एकत्र होकर होली जरूर खेलती हैं।
बताया कि दुल्हड़ी वाले दिन पुरुषों की होली होती है। टोलियों के रूप में निकले लोग घर-घर जाकर होली खेलते हैं। दूसरे दिन महिलाओं की सत्ता रहती है। परंपरा के अनुसार महिलाएं रंग-गुलाल लेकर कस्बे के ठाकुरद्वारा मंदिर परिसर में माधव मुकुंद महाराज के मंदिर में एकत्र होती हैं। घर-घर जाकर लोगों को रंग लगाती हैं। इसके बाद महिलाओं की टोलियां मुख्य मार्ग पर पहुंच कर गुजरने वाले वाहनों को रोकती हैं।
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चालकों और परिचालकों से फगुआ वसूलती हैं। होली की बधाई भी देती हैं। फगुआ देने से इन्कार करने पर वाहन चालकों को महिलाओं की खरी-खोटी सुननी पड़ती है। हालांकि पिछले चार सालों में कई पुरानी महिलाओं की मृत्यु हो जाने के कारण फगुआ वसूलने की परंपरा कम हो गई है।
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संंवाद न्यूज एजेंसी
कलीनगर। रजवाड़े के रूप में प्रसिद्ध रहे माधोटांडा गांव में प्राचीन काल से महिलाओं की ओर से विशेष होली मनाई जाती रही है। होली के दूसरे दिन महिलाओं का सड़कों पर राज रहता है। वे सड़कों पर निकलकर जमकर रंग खेलती हैं। महिलाओं के सम्मान में पुरुष गांव से बाहर या खेतों में चले जाते हैं। इस बार भी महिलाएं जोश के साथ रजवाड़े की होली की तैयारी में जुटी हैं।
माधोटांडा में दशकों पुुरानी परंपरा आज भी कायम है। कस्बा निवासी शीला सिंह व महेशा देवी बताती है कि समय के साथ थोड़ा परिवर्तन जरूर आया है, लेकिन आज भी होली के दूसरे दिन महिलाएं मंदिर में एकत्र होकर होली जरूर खेलती हैं।
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बताया कि दुल्हड़ी वाले दिन पुरुषों की होली होती है। टोलियों के रूप में निकले लोग घर-घर जाकर होली खेलते हैं। दूसरे दिन महिलाओं की सत्ता रहती है। परंपरा के अनुसार महिलाएं रंग-गुलाल लेकर कस्बे के ठाकुरद्वारा मंदिर परिसर में माधव मुकुंद महाराज के मंदिर में एकत्र होती हैं। घर-घर जाकर लोगों को रंग लगाती हैं। इसके बाद महिलाओं की टोलियां मुख्य मार्ग पर पहुंच कर गुजरने वाले वाहनों को रोकती हैं।
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चालकों और परिचालकों से फगुआ वसूलती हैं। होली की बधाई भी देती हैं। फगुआ देने से इन्कार करने पर वाहन चालकों को महिलाओं की खरी-खोटी सुननी पड़ती है। हालांकि पिछले चार सालों में कई पुरानी महिलाओं की मृत्यु हो जाने के कारण फगुआ वसूलने की परंपरा कम हो गई है।