{"_id":"6101ac1c8ebc3e09063b1d10","slug":"wild-animal-pilibhit-news-bly4546485160","type":"story","status":"publish","title_hn":"जंगल सिकुड़ने से आबादी में पहुंच रहे बाघ, बढ़ रही मानव संघर्ष की घटनाएं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जंगल सिकुड़ने से आबादी में पहुंच रहे बाघ, बढ़ रही मानव संघर्ष की घटनाएं
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पीलीभीत। हर साल बाघों के संरक्षण को लेकर टाइगर रिजर्व बड़े-बड़े दावे करता है, मगर धरातल पर उनके संरक्षण के लिए कोई काम नहीं होता है। जिस कारण बाघ जंगल से बाहर आबादी वाले इलाकों में पहुंचता है। जहां शिकार के चक्कर में बाघ-मानव संघर्ष बढ़ रहा है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व की चौड़ाई कम होने और जंगल में मानव की घुसपैठ होने के बाद हो रहे अवैध कटान से जंगल सिकुड़ता जा रहा है। जिस कारण बाघ आबादी की ओर से रुख करते हुए गन्ने की फसल वाले खेतों को अपना नया ठिकाना बना रहे हैं।
जिले में नौ जून 2014 को पीलीभीत टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। इस जंगल के क्षेत्रफल की बात करें तो 71288 हेक्टेयर जंगल में खुटार रेेंज के 1736.90 हेक्टेयर को मिलाकर कुल 73024.90 हेक्टेयर के वनक्षेत्र के एरिया को टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। उस दौरान महज 14 बाघ टाइगर जंगल में मौजूद थे, लेकिन धीरे-धीरे बाघों की संख्या बढ़ना शुरू हो गई। आज विश्व बाघ संरक्षण दिवस मनाया जाएगा। पूरी दुनिया में बाघों की संख्या बढ़ने पर खुशी मनाने के साथ इनके संरक्षण को लेकर भी बड़ी-बड़ी बातें होगी, मगर यह सब कार्यक्रम तक ही सीमित रहता है। प्राकृतिक वन संपदा और बेहतर जलवायु से भरपूर 73 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फैले जनपद के जंगलों में बंगाल टाइगर श्रेणी के बाघ पाए जाते हैं। मौजूदा समय में 65 से अधिक बाघ होने की बात कही जा रही है। नई गणना में बाघों की संख्या इसके पार भी जा सकती है, लेकिन अभी तक बाघ संरक्षण के नाम पर कोई कदम नहीं उठाया गया है। इसके चलते इसलिए 2012 से अमरिया क्षेत्र में 12 बाघों का कुनबा जंगल से बाहर गन्ने के खेत और नदी किनारे भटक रहे हैं। विशेषज्ञों की मानें तो जंगल सिर्फ लंबाई में है चौड़ाई बहुत कम है। इस हिसाब से 65 बाघों की संख्या अधिक है। जबकि एक बाघ को विचरण करने के लिए कम से कम 70-80 किलोमीटर का एरिया चाहिए होता है, जबकि बाघिन के लिए 40-50 किलोमीटर का एरिया होता हैै। जंगल में पांच रेंज हैं जिनमें माला, महोफ और हरिपुर रेंज में बाघों की संख्या अधिक है, जबकि दियूरिया और बराही में यह संख्या बेहद कम हैे। जंगल में ग्रासलैंड कम है। उसके सूखने के बाद जानवर आबादी की ओर भागते हैं, ऐसे में जब बाघ को आहार नहीं मिल पाता है, तो वह शिकार के लिए उसके पीछे जाता है। ऐसे में उस वक्त उसके सामने आने वाले व्यक्ति का ही शिकार करता है। एक स्थान पर संख्या अधिक होने से भी समस्या आ रही है। (संवाद)
बाघों के लिए कहीं अधिक खूंखार है आदमी
जंगल सिकुड़ने के साथ ही जंगल में मानव का प्रवेश भी कहीं न कहीं बाघों के लिए घातक हो रहा है। कई बार जंगल में फंदे और खाबड़ लगी मिली थी। जंगल में कई शिकारी भी पकड़े जा चुके हैं। इसके अलावा जंगल से होने वाला लकड़ी का अवैध कटान भी बाघों के लिए बढ़ी परेशानी बना हुआ है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व 2014-15 में वन्य जीव के हत्या के मामले में 110 लोगों को जेल भेजा गया था। जिसमें विभाग की ओर से 95 केस पंजीकृत कराए गए थे। पकड़े गए नौ शिकारियों से बाघ के कई अंग बरामद हुए थे। इसके बाद भी विभाग की ओर से मानव प्रवेश को रोकने के लिए कोई रणनीति तय नहीं हो सकी है।
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बाघ संरक्षण के लिए रिवाल्विंग और रेस्क्यू सेंटर बनेगा मददगार
बाघ संरक्षण के लिए जिले में पीलीभीत टाइगर रिजर्व की ओर से दावा किया जा रहा है। बाघों के संरक्षण के लिए गश्त बढ़ रही है। इसके अलावा ऑपरेशन मानसून के तहत भी गश्त चल रही है। बाघ संरक्षण के लिए विभाग की ओर से 2019 में शासन को रिवाल्विंग और रेस्क्यू सेंटर का प्रस्ताव भेजा गया था। रेस्क्यू सेंटर के लिए पूरनपुर रेंज गोपालपुर में जगह निर्धारित की गई है। रेस्क्यू सेंटर में अगर कोई बाघ हमले या संघर्ष में घायल होता है, तो उसका रेस्क्यू सेंटर में भी इलाज किया जाएगा। अभी तक बाघों को इलाज के लिए बरेली आईवीआरआई या प्रदेश के दूसरे चिड़ियाघरों में भेजा जाता है। जबकि रिवाल्विंग सेंटर में अगर कोई बाघ, तेंदुआ और भालू किसी मानव पर हमला करता है। तो उसे सुधारने के लिए वहां रखा जाएगा। जहां उसे जंगल के वातावरण और उसके वास्तविक भोजन की आदत डालने के बाद उसे जंगल में छोड़ा जाएगा।
पिछले 10 साल से बाघों के लिए काम कर रहे बिलाल मिया
पीलीभीत टाइगर रिजर्व के साथ बाघों के संरक्षण और तमाम जानवरों की शोध करने वाले वर्ल्ड लाइफ फोटोग्राफर बिलाल मिया पिछले दस साल पहले जंगल में अपनी सेवा दे रहे हैं। जंगल में बाघों पर विभिन्न शोध करने के बाद उन्होंने जंगल के ऊपर सफरनामा नाम से पुस्तक लिखी है। जिसमें जंगल के सौ साल का इतिहास दृश्याया गया है। उनका कहना है कि बाघ संरक्षण के लिए पहले जंगल के आसपास रह रहे ग्रामीणों को जागरूक करें उनकी समस्याओं का निदान होना चाहिए। बाघों के संरक्षण के लिए बाघों के गले में जीपीएस बेल्ट होना चाहिए। तकि उसकी लोकेशन का पता रह सके। मानव वन्य जीव संघर्ष रोकने के लिए जंगल व आबादी की सीमा क्षेत्र में तार फेंसिंग अति आवश्यक है।
बाघों के संरक्षण के लिए पीलीभीत टाइगर रिजर्व की ओर से लगातार प्रयास जारी है। रात्रि गश्त भी कराई जा रही है। इसके अलावा रिवाल्विंग और रेस्क्यू सेंटर का प्रस्ताव भी भेजा गया है। जो बाघ आबादी वाले इलाकों में घूम रहे है, जिन्हें जल्द ही जंगल में शिफ्ट कराया जाएगा। बरसात के मौसम में ऑपरेशन मानसून के तहत मोबाइल पेट्रोलिंग कराई जा रही है- नवीन खंडेलवाल, डिप्टी डायरेक्टर, टाइगर रिजर्व
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जिले में नौ जून 2014 को पीलीभीत टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। इस जंगल के क्षेत्रफल की बात करें तो 71288 हेक्टेयर जंगल में खुटार रेेंज के 1736.90 हेक्टेयर को मिलाकर कुल 73024.90 हेक्टेयर के वनक्षेत्र के एरिया को टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। उस दौरान महज 14 बाघ टाइगर जंगल में मौजूद थे, लेकिन धीरे-धीरे बाघों की संख्या बढ़ना शुरू हो गई। आज विश्व बाघ संरक्षण दिवस मनाया जाएगा। पूरी दुनिया में बाघों की संख्या बढ़ने पर खुशी मनाने के साथ इनके संरक्षण को लेकर भी बड़ी-बड़ी बातें होगी, मगर यह सब कार्यक्रम तक ही सीमित रहता है। प्राकृतिक वन संपदा और बेहतर जलवायु से भरपूर 73 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फैले जनपद के जंगलों में बंगाल टाइगर श्रेणी के बाघ पाए जाते हैं। मौजूदा समय में 65 से अधिक बाघ होने की बात कही जा रही है। नई गणना में बाघों की संख्या इसके पार भी जा सकती है, लेकिन अभी तक बाघ संरक्षण के नाम पर कोई कदम नहीं उठाया गया है। इसके चलते इसलिए 2012 से अमरिया क्षेत्र में 12 बाघों का कुनबा जंगल से बाहर गन्ने के खेत और नदी किनारे भटक रहे हैं। विशेषज्ञों की मानें तो जंगल सिर्फ लंबाई में है चौड़ाई बहुत कम है। इस हिसाब से 65 बाघों की संख्या अधिक है। जबकि एक बाघ को विचरण करने के लिए कम से कम 70-80 किलोमीटर का एरिया चाहिए होता है, जबकि बाघिन के लिए 40-50 किलोमीटर का एरिया होता हैै। जंगल में पांच रेंज हैं जिनमें माला, महोफ और हरिपुर रेंज में बाघों की संख्या अधिक है, जबकि दियूरिया और बराही में यह संख्या बेहद कम हैे। जंगल में ग्रासलैंड कम है। उसके सूखने के बाद जानवर आबादी की ओर भागते हैं, ऐसे में जब बाघ को आहार नहीं मिल पाता है, तो वह शिकार के लिए उसके पीछे जाता है। ऐसे में उस वक्त उसके सामने आने वाले व्यक्ति का ही शिकार करता है। एक स्थान पर संख्या अधिक होने से भी समस्या आ रही है। (संवाद)
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बाघों के लिए कहीं अधिक खूंखार है आदमी
जंगल सिकुड़ने के साथ ही जंगल में मानव का प्रवेश भी कहीं न कहीं बाघों के लिए घातक हो रहा है। कई बार जंगल में फंदे और खाबड़ लगी मिली थी। जंगल में कई शिकारी भी पकड़े जा चुके हैं। इसके अलावा जंगल से होने वाला लकड़ी का अवैध कटान भी बाघों के लिए बढ़ी परेशानी बना हुआ है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व 2014-15 में वन्य जीव के हत्या के मामले में 110 लोगों को जेल भेजा गया था। जिसमें विभाग की ओर से 95 केस पंजीकृत कराए गए थे। पकड़े गए नौ शिकारियों से बाघ के कई अंग बरामद हुए थे। इसके बाद भी विभाग की ओर से मानव प्रवेश को रोकने के लिए कोई रणनीति तय नहीं हो सकी है।
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बाघ संरक्षण के लिए रिवाल्विंग और रेस्क्यू सेंटर बनेगा मददगार
बाघ संरक्षण के लिए जिले में पीलीभीत टाइगर रिजर्व की ओर से दावा किया जा रहा है। बाघों के संरक्षण के लिए गश्त बढ़ रही है। इसके अलावा ऑपरेशन मानसून के तहत भी गश्त चल रही है। बाघ संरक्षण के लिए विभाग की ओर से 2019 में शासन को रिवाल्विंग और रेस्क्यू सेंटर का प्रस्ताव भेजा गया था। रेस्क्यू सेंटर के लिए पूरनपुर रेंज गोपालपुर में जगह निर्धारित की गई है। रेस्क्यू सेंटर में अगर कोई बाघ हमले या संघर्ष में घायल होता है, तो उसका रेस्क्यू सेंटर में भी इलाज किया जाएगा। अभी तक बाघों को इलाज के लिए बरेली आईवीआरआई या प्रदेश के दूसरे चिड़ियाघरों में भेजा जाता है। जबकि रिवाल्विंग सेंटर में अगर कोई बाघ, तेंदुआ और भालू किसी मानव पर हमला करता है। तो उसे सुधारने के लिए वहां रखा जाएगा। जहां उसे जंगल के वातावरण और उसके वास्तविक भोजन की आदत डालने के बाद उसे जंगल में छोड़ा जाएगा।
पिछले 10 साल से बाघों के लिए काम कर रहे बिलाल मिया
पीलीभीत टाइगर रिजर्व के साथ बाघों के संरक्षण और तमाम जानवरों की शोध करने वाले वर्ल्ड लाइफ फोटोग्राफर बिलाल मिया पिछले दस साल पहले जंगल में अपनी सेवा दे रहे हैं। जंगल में बाघों पर विभिन्न शोध करने के बाद उन्होंने जंगल के ऊपर सफरनामा नाम से पुस्तक लिखी है। जिसमें जंगल के सौ साल का इतिहास दृश्याया गया है। उनका कहना है कि बाघ संरक्षण के लिए पहले जंगल के आसपास रह रहे ग्रामीणों को जागरूक करें उनकी समस्याओं का निदान होना चाहिए। बाघों के संरक्षण के लिए बाघों के गले में जीपीएस बेल्ट होना चाहिए। तकि उसकी लोकेशन का पता रह सके। मानव वन्य जीव संघर्ष रोकने के लिए जंगल व आबादी की सीमा क्षेत्र में तार फेंसिंग अति आवश्यक है।
बाघों के संरक्षण के लिए पीलीभीत टाइगर रिजर्व की ओर से लगातार प्रयास जारी है। रात्रि गश्त भी कराई जा रही है। इसके अलावा रिवाल्विंग और रेस्क्यू सेंटर का प्रस्ताव भी भेजा गया है। जो बाघ आबादी वाले इलाकों में घूम रहे है, जिन्हें जल्द ही जंगल में शिफ्ट कराया जाएगा। बरसात के मौसम में ऑपरेशन मानसून के तहत मोबाइल पेट्रोलिंग कराई जा रही है- नवीन खंडेलवाल, डिप्टी डायरेक्टर, टाइगर रिजर्व