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Pilibhit News: मतदाताओं से मांगते थे वोट, देते थे शाकाहारी रहने का संदेश
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परशुराम गंगवार का फाइल फोटो ।
यादों के झरोखे से
मेनका गांधी को हराकर सांसद बने डॉ. परशुराम गंगवार चुनाव के बाद भी चलाते थे क्लीनिक
सत्यवान अवस्थी
बीसलपुर। वर्ष 1991 के 10वीं लोकसभा के चुनाव में मेनका गांधी को हराकर सांसद बने बीसलपुर के रंपुरा निवासी डॉ. परशुराम गंगवार चुनाव प्रचार में मतदाताओं से वोट मांगते और उन्हें शाकाहारी रहने का संदेश देते थे। चुनाव प्रचार के समय वह बाइक और पैदल गांवों ेमें जाकर वोट मांगते थे।
पिता के चुनाव प्रचार की बातें साझा करते हुए गांव रंपुरा नत्थू निवासी डॉ. दिनेश गंगवार ने बताया कि उनके पिता डॉ. परशुराम गंगवार बाबा जय गुरुदेव के शिष्य थे। चुनाव जीतने के बाद भी वह पहले की तरह कस्बा बरखेड़ा में अपना क्लीनिक चलाते रहे।
जिन मरीजों के पास पैसे नहीं होते, उन्हें भी दवाई देते थे। जरूरत पड़ने पर मरीजों के घर जाकर उनका उपचार करते। चुनाव के समय भी कुछ समय क्लीनिक पर रुककर मरीजों को दवाई देने के बाद ही प्रचार पर जाते थे। बताया कि चुनाव जीतने के बाद जब वह पहली बार संसद पहुंचे तो देश भर के सांसदों ने उन्हें काफी कौतूहल से देखा।
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सांसदों को विश्वास नहीं हो रहा था कि उन्होंने मेनका गांधी जैसी हस्ती को हरा दिया। उस समय पीलीभीत सीट का चुनाव दिल्ली से आए वरिष्ठ भाजपा नेता मूलचंद्र चावला की देखरेख में हुआ था। चुनाव के समय डॉ. परशुराम सुबह छह बजे क्षेत्र में निकल जाते। जिन गांवों में बाइक नहीं जा पाती थी, वहां पैदल जाते थे। (संवाद)
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ठेकेदार ने दिया कमीशन तो भड़क गए थे सांसद
डॉ. दिनेश गंगवार ने बताया कि सांसद बनने के बाद एक बार एक ठेकेदार पिता परशुराम गंगवार को कमीशन राशि देने आया। कमीशन देखकर वह भड़क गए और ठेकेदार का लाइसेंस निरस्त कराने की बात कह दी। वह सांसद बनने के बाद भी छोटे-छोटे कार्यों के लिए आमजन के साथ सरकारी कार्यालयों में पहुंच जाते थे। लोगों की शिकायत पर उन्होंने बरखेड़ा थाने का घेराव भी किया था। उनके और साथियों के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी।
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मेनका गांधी को हराकर सांसद बने डॉ. परशुराम गंगवार चुनाव के बाद भी चलाते थे क्लीनिक
सत्यवान अवस्थी
बीसलपुर। वर्ष 1991 के 10वीं लोकसभा के चुनाव में मेनका गांधी को हराकर सांसद बने बीसलपुर के रंपुरा निवासी डॉ. परशुराम गंगवार चुनाव प्रचार में मतदाताओं से वोट मांगते और उन्हें शाकाहारी रहने का संदेश देते थे। चुनाव प्रचार के समय वह बाइक और पैदल गांवों ेमें जाकर वोट मांगते थे।
पिता के चुनाव प्रचार की बातें साझा करते हुए गांव रंपुरा नत्थू निवासी डॉ. दिनेश गंगवार ने बताया कि उनके पिता डॉ. परशुराम गंगवार बाबा जय गुरुदेव के शिष्य थे। चुनाव जीतने के बाद भी वह पहले की तरह कस्बा बरखेड़ा में अपना क्लीनिक चलाते रहे।
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जिन मरीजों के पास पैसे नहीं होते, उन्हें भी दवाई देते थे। जरूरत पड़ने पर मरीजों के घर जाकर उनका उपचार करते। चुनाव के समय भी कुछ समय क्लीनिक पर रुककर मरीजों को दवाई देने के बाद ही प्रचार पर जाते थे। बताया कि चुनाव जीतने के बाद जब वह पहली बार संसद पहुंचे तो देश भर के सांसदों ने उन्हें काफी कौतूहल से देखा।
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सांसदों को विश्वास नहीं हो रहा था कि उन्होंने मेनका गांधी जैसी हस्ती को हरा दिया। उस समय पीलीभीत सीट का चुनाव दिल्ली से आए वरिष्ठ भाजपा नेता मूलचंद्र चावला की देखरेख में हुआ था। चुनाव के समय डॉ. परशुराम सुबह छह बजे क्षेत्र में निकल जाते। जिन गांवों में बाइक नहीं जा पाती थी, वहां पैदल जाते थे। (संवाद)
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ठेकेदार ने दिया कमीशन तो भड़क गए थे सांसद
डॉ. दिनेश गंगवार ने बताया कि सांसद बनने के बाद एक बार एक ठेकेदार पिता परशुराम गंगवार को कमीशन राशि देने आया। कमीशन देखकर वह भड़क गए और ठेकेदार का लाइसेंस निरस्त कराने की बात कह दी। वह सांसद बनने के बाद भी छोटे-छोटे कार्यों के लिए आमजन के साथ सरकारी कार्यालयों में पहुंच जाते थे। लोगों की शिकायत पर उन्होंने बरखेड़ा थाने का घेराव भी किया था। उनके और साथियों के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी।