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Pilibhit News: तहसीलदार पद को ठोकर मारकर जलाई थी आजादी की मशाल
Thu, 14 Aug 2025 12:27 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पीलीभीत
संवाद न्यूज एजेंसी, पीलीभीत
Updated Thu, 14 Aug 2025 12:27 AM IST
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बीसलपुर। नगर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और प्रथम विधायक कुंवर भगवान सिंह ने तहसीलदार के पद को ठोकर मारकर आजादी की लड़ाई की मशाल जलाई थी। अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिली थी।
तहसील क्षेत्र के गांव बमरौली निवासी संजय सिंह ने बताया कि उनके चाचा कुंवर भगवान सिंह का जन्म 12 अप्रैल 1908 को हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। डिग्री मिलते ही उन्हें सीधे तहसीलदार के पद का नियुक्ति पत्र मिल गया, लेकिन उन्होंने तहसीलदार का पद ठुकरा दिया और आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे।
उनके दादा हीरा सिंह ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया था। उनके चाचा मेहताब सिंह ने 1916 में लखनऊ में कांग्रेस संगठन का कार्य प्रारंभ किया था। उनके बड़े भाई शंकर सिंह भी असहयोग आंदोलन में शामिल रहे।
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31 दिसंबर 1921 को कांग्रेस का एक विराट जलसा पीलीभीत शहर में उन्हीं के नेतृत्व में हुआ था। वर्ष 1930 के कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में वह गए थे और जेल यात्रा भी की थी। एक संपन्न जमींदार घराने के एक डिग्री धारी युवक का सरकारी अधिकारी पद त्याग कर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष के लिए निकल पड़ना उस समय वास्तव में बड़े साहस का कार्य था।
उनके साथ चल पड़ने के लिए नौजवानों की टीम तैयार हो गई थी। उन्होंने जिले में जंगल सत्याग्रह आंदोलन छेड़ा था। उस दौरान भगवान सिंह बाजारों में जलसे करते थे और क्रांतिकारी गीत गाते हुए जुलूस निकालकर स्वयंसेवकों की भर्ती करते थे। उस आंदोलन के दौरान उन्हें पूरनपुर में गिरफ्तार कर लिया गया था।
15 सितंबर 1930 को उन्हें छह माह की सजा सुना दी गई। उनके बड़े भाई पहले से ही जेल में थे। दोनों को बी क्लास का हकदार बताकर फैजाबाद जेल भेज दिया गया। जेल में ही बरेली के सेठ दामोदर दास से उनकी मुलाकात हुई। इसके बाद सभी बंदी मार्च 1931 को गांधी इरविन समझौता होने पर छोड़ दिए गए। चार जनवरी 1932 को कांग्रेस ने फिर सत्याग्रह की घोषणा कर दी थी। इस आंदोलन में 350 आजादी के दीवानों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 25 जनवरी को उन्हें पांच माह की सजा सुनाई गई। आजादी की लड़ाई में उन्होंने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया था। वहीं, भगवान सिंह का पत्रकारिता के क्षेत्र में भी योगदान रहा। वर्ष 1937 में उनके संपादन में हिंदी पत्र ग्राम सुधार छपा था। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1951 में पाक्षिक जंगल समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया था।
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बीसलपुर के प्रथम विधायक भी चुने गए
बालिग मताधिकार के अधीन वर्ष 1937 में हुए प्रथम विधानसभा चुनाव में जिले में कुल दो सीटें थीं। पहली सीट बीसलपुर से भगवान सिंह और दूसरी पीलीभीत पूरनपुर से पंडित रामेश्वर दयाल वैद्य चुनाव लड़े ओर विजयी हुए थे। दो जून वर्ष 1999 में भारत माता का यह लाल धरती की गोद में हमेशा के लिए सो गया।
गांव में अभी भी है कोठी
बमरौली गांव में अभी भी उनकी विशाल कोठी है। हालांकि कोठी काफी हद तक जर्जर हो चुकी है। वह अपनी इसी कोठी में ही स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर अंग्रेजों को देश से भगाने की योजनाएं बनाते थे।
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तहसील क्षेत्र के गांव बमरौली निवासी संजय सिंह ने बताया कि उनके चाचा कुंवर भगवान सिंह का जन्म 12 अप्रैल 1908 को हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। डिग्री मिलते ही उन्हें सीधे तहसीलदार के पद का नियुक्ति पत्र मिल गया, लेकिन उन्होंने तहसीलदार का पद ठुकरा दिया और आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे।
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उनके दादा हीरा सिंह ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया था। उनके चाचा मेहताब सिंह ने 1916 में लखनऊ में कांग्रेस संगठन का कार्य प्रारंभ किया था। उनके बड़े भाई शंकर सिंह भी असहयोग आंदोलन में शामिल रहे।
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31 दिसंबर 1921 को कांग्रेस का एक विराट जलसा पीलीभीत शहर में उन्हीं के नेतृत्व में हुआ था। वर्ष 1930 के कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में वह गए थे और जेल यात्रा भी की थी। एक संपन्न जमींदार घराने के एक डिग्री धारी युवक का सरकारी अधिकारी पद त्याग कर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष के लिए निकल पड़ना उस समय वास्तव में बड़े साहस का कार्य था।
उनके साथ चल पड़ने के लिए नौजवानों की टीम तैयार हो गई थी। उन्होंने जिले में जंगल सत्याग्रह आंदोलन छेड़ा था। उस दौरान भगवान सिंह बाजारों में जलसे करते थे और क्रांतिकारी गीत गाते हुए जुलूस निकालकर स्वयंसेवकों की भर्ती करते थे। उस आंदोलन के दौरान उन्हें पूरनपुर में गिरफ्तार कर लिया गया था।
15 सितंबर 1930 को उन्हें छह माह की सजा सुना दी गई। उनके बड़े भाई पहले से ही जेल में थे। दोनों को बी क्लास का हकदार बताकर फैजाबाद जेल भेज दिया गया। जेल में ही बरेली के सेठ दामोदर दास से उनकी मुलाकात हुई। इसके बाद सभी बंदी मार्च 1931 को गांधी इरविन समझौता होने पर छोड़ दिए गए। चार जनवरी 1932 को कांग्रेस ने फिर सत्याग्रह की घोषणा कर दी थी। इस आंदोलन में 350 आजादी के दीवानों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 25 जनवरी को उन्हें पांच माह की सजा सुनाई गई। आजादी की लड़ाई में उन्होंने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया था। वहीं, भगवान सिंह का पत्रकारिता के क्षेत्र में भी योगदान रहा। वर्ष 1937 में उनके संपादन में हिंदी पत्र ग्राम सुधार छपा था। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1951 में पाक्षिक जंगल समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया था।
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बीसलपुर के प्रथम विधायक भी चुने गए
बालिग मताधिकार के अधीन वर्ष 1937 में हुए प्रथम विधानसभा चुनाव में जिले में कुल दो सीटें थीं। पहली सीट बीसलपुर से भगवान सिंह और दूसरी पीलीभीत पूरनपुर से पंडित रामेश्वर दयाल वैद्य चुनाव लड़े ओर विजयी हुए थे। दो जून वर्ष 1999 में भारत माता का यह लाल धरती की गोद में हमेशा के लिए सो गया।
गांव में अभी भी है कोठी
बमरौली गांव में अभी भी उनकी विशाल कोठी है। हालांकि कोठी काफी हद तक जर्जर हो चुकी है। वह अपनी इसी कोठी में ही स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर अंग्रेजों को देश से भगाने की योजनाएं बनाते थे।