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कहीं बहरा न बना दें ये धूमधड़ाका
ब्यूरो/अमर उजाला, पीलीभीत
Updated Sun, 05 Jun 2016 12:19 AM IST
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घर में मंगल कार्य हो अथवा मैरिज हाल में शादी ब्याह। खुशी के मौके पर हम नियम कानून को ताक पर रखकर खूब शोर शराबा करते हैं। इस मौके पर अक्सर ऊंची आवाज के पटाखे एवं आतिशबाजी छोड़कर भी खुश होते हैं लेकिन अपनी इस खुशी में अब समाज पर क्या प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं यह भूल जाते हैं। कानों को सुनने की क्षमता से दोगुने तिगुने शोर से बहरापन, गर्भपात, वृद्धों के दिलों की धड़कन बढने की समस्याएं हो सकती हैं।
मनुष्य के सुख सुविधाओं की वस्तुएं ही पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है। हवा और पानी दूषित होने के साथ साथ आवश्यकता से अधिक शोरगुल भी हमारे जीवन को प्रभावित कर रहा है। सड़कों पर प्रेशर हार्न बजाकर निकलते वाहन हो अथवा प्रचार को लाउडस्पीकर लगाकर धूम रहे रिक्शे। धार्मिक स्थलों एवं कार्यक्रमों में कई प्रकार के ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रयोग हो या बारातघरों में देर रात तक तेज आवाज में बजने वाला डीजे। इन सब में 100 से 200 डेसीबल तक आवाज निकलती है जबकि साधारण मनुष्य को सुनने की क्षमता 50-60 डेसीबल तक होती है। अब आप खुद कल्पना कर सकते हैं कि सुनने की क्षमता से अधिक का शोरगुल आपके कानों पर क्या प्रभाव डाल रहा है। ध्वनि प्रदूषण से बहरापन होने के खतरे के साथ साथ महिलाओं के गर्भपात, नवजात बच्चों व वृद्धों के दिलों की धड़कन बढने और उनका हार्टफेल होने तक का खतरा रहता है।
हमें खुद होना
चाहिए जागरूक
ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रभाव हम सभी के जीवन पर पड़ता है लेकिन हम इसे रोकने को आगे नहीं आते। जरूरी है कि दूसरों से उम्मीद करने से पहले हमें स्वयं इसके लिए आगे आना होगा।
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प्रशासन भी निभा रहा औपचारिकता
शहर में प्रचार के लिए लाउडस्पीकर लगाना हो अथवा किसी धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन। सभी के लिए प्रशासन की अनुमति लेनी आवश्यक है। वहीं शादी बारातों में भी रात 11 बजे तक बाद डीजे और आतिशबाजी पर प्रतिबंध है लेकिन प्रशासन ने इसे रोकने को अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाएं हैं।
ध्वनि मापन की इकाई डेसीबल है। एक मनुष्य को 50-60 डेसीबिल तक सुनने की क्षमता होती है लेकिन आज चोरों ओर इससे कहीं अधिक शोर हो रहा है। पटाखों में 200-250 डेसीबल तक आवाज होती है जो काफी नुकसानदायक है।
लक्ष्मीकांत शर्मा, विज्ञान अध्यापक
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मनुष्य के सुख सुविधाओं की वस्तुएं ही पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है। हवा और पानी दूषित होने के साथ साथ आवश्यकता से अधिक शोरगुल भी हमारे जीवन को प्रभावित कर रहा है। सड़कों पर प्रेशर हार्न बजाकर निकलते वाहन हो अथवा प्रचार को लाउडस्पीकर लगाकर धूम रहे रिक्शे। धार्मिक स्थलों एवं कार्यक्रमों में कई प्रकार के ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रयोग हो या बारातघरों में देर रात तक तेज आवाज में बजने वाला डीजे। इन सब में 100 से 200 डेसीबल तक आवाज निकलती है जबकि साधारण मनुष्य को सुनने की क्षमता 50-60 डेसीबल तक होती है। अब आप खुद कल्पना कर सकते हैं कि सुनने की क्षमता से अधिक का शोरगुल आपके कानों पर क्या प्रभाव डाल रहा है। ध्वनि प्रदूषण से बहरापन होने के खतरे के साथ साथ महिलाओं के गर्भपात, नवजात बच्चों व वृद्धों के दिलों की धड़कन बढने और उनका हार्टफेल होने तक का खतरा रहता है।
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हमें खुद होना
चाहिए जागरूक
ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रभाव हम सभी के जीवन पर पड़ता है लेकिन हम इसे रोकने को आगे नहीं आते। जरूरी है कि दूसरों से उम्मीद करने से पहले हमें स्वयं इसके लिए आगे आना होगा।
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प्रशासन भी निभा रहा औपचारिकता
शहर में प्रचार के लिए लाउडस्पीकर लगाना हो अथवा किसी धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन। सभी के लिए प्रशासन की अनुमति लेनी आवश्यक है। वहीं शादी बारातों में भी रात 11 बजे तक बाद डीजे और आतिशबाजी पर प्रतिबंध है लेकिन प्रशासन ने इसे रोकने को अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाएं हैं।
ध्वनि मापन की इकाई डेसीबल है। एक मनुष्य को 50-60 डेसीबिल तक सुनने की क्षमता होती है लेकिन आज चोरों ओर इससे कहीं अधिक शोर हो रहा है। पटाखों में 200-250 डेसीबल तक आवाज होती है जो काफी नुकसानदायक है।
लक्ष्मीकांत शर्मा, विज्ञान अध्यापक