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राहुलनगर में बाढ़ का पानी तो निकल गया, अब फैलने लगीं संक्रामक बीमारियां
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पूरनपुर। शारदा नदी के किनारे बसे गांव राहुलनगर में बाढ़ का पानी तो कम हो गया है, मगर अब यहां संक्रामक बीमारियां फैलने लगी हैं। इससे गांव के लोग दहशत में है। गांव के अधिकांश परिवारों में बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे बुखार, जुकाम और खांसी से पीड़ित हैं। कोरोना के चलते तमाम लोग जांच तक नहीं करा रहे हैं। उन्हें डर है कि जांच कराने पर कहीं कोरोना न निकल आए। स्वास्थ्य विभाग की ओर से अब तक किसी भी टीम ने गांव जाकर बीमारियों का पता लगाने की कोशिश नहीं की। वहीं, किसानों की फसलें बाढ़ में तबाह हो चुकी हैं। जमीन नदी की भेंट चढ़ चुकी है। गांव वाले अपनी जमीन का मोह त्यागकर कहीं दूसरी जगह बसने का कदम भी नहीं उठा पा रहे हैं। हर साल बरसात में उजड़ना और फिर आकर यहीं बस जाना इनकी नियति बन चुका है।
ग्राम पंचायत चंदिया हजारा के गांव राहुलनगर समेत आसपास के गांवों की आबादी विस्थापित बांग्लाभाषी परिवारों की है। दशकों पहले उन्हें नदी के किनारे की जमीन सरकार द्वारा आवंटित की गई थी। कड़ी मेहनत और मशक्कत कर इन परिवारों ने जंगल में रहने की जगह बनाई। जमीन को उपजाऊ बनाया। मगर, वर्षों के संघर्ष के बाद भी बड़ी संख्या में ये परिवार आज भी वहीं पर हैं, जहां से उन्होंने अपना सफर शुरू किया था। गांवों में खड़ंजा नहीं। बरसात के पानी की निकासी को नालियां नहीं बनी हैं। अधिकांश मकान कच्चे और खपरैल वाले हैं। गांवों के पास ही में बियावान जंगल है। रात में अगर अस्पताल की जरूरत पड़े तो पूरनपुर तहसील पहुंचना इनके लिए कोई पहाड़ पार करने के बराबर है। इसकी वजह यह है कि राहुलनगर से तहसील मुख्यालय जाने वाली सड़क गड्ढायुक्त है। रास्ते में हर जगह सड़क पर पानी और कीचड़ भरा है। शारदा में जब बाढ़ आती है या जलस्तर बढ़ता है तो गांव के दर्जनों परिवार कई दिनों तक घरों के बाहर ऊंचाई पर बने मचानों में रहकर किसी तरह अपने दिन काटते हैं। अगर जलस्तर ज्यादा बढ़ा तो गांव से पलायन करना पड़ता है। बाढ़ में गांव वालों को पानी का खतरा तो अपनी जगह है, मगर दूसरा खतरा जंगली जानवरों का भी है।
अक्सर अपना रुख बदल लेती है शारदा
शारदा नदी की खासियत यह है कि वह अपने बहाव का रुख बदल देती हैं। शारदा के बहाव पर आज तक अंकुश नहीं लगाया जा सका। हर साल शारदा नदी के आसपास बसे लोग अपनी तबाही को बहुत नजदीक से देखते हैं। पहाड़ों पर बारिश के बाद बनबसा बैराज से पानी आगे बढ़ने के बाद ही शारदा के तेवर तल्ख होने लगते हैं।
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जमीन और घर का मोह कैसे छोड़ दूं। मेरे पास कोई और साधन नहीं है। हम पहले ही उजड़ने के बाद विस्थापित के रूप में यहां आकर बसे हैं। बाढ़ आने पर सुबह रोटी बन गई तो शाम को मुश्किल है। बाढ़ के समय मजदूरी भी नहीं मिलती। परिवार कैसे पलता है, यह ऊपर वाला ही जनता है। सरकार को हमारी सुध लेनी चाहिए। - ईश्वर, राहुलनगर।
हर साल बाढ़ से यही हालात रहते हैं। फसलें बर्बाद हो जाती हैं। पूरे साल की मेहनत पर पानी फिर जाता है। साल भर घर को संवारने पर लगी धनराशि एक झटके में बाढ़ में बह जाती है। परिवार के भरण पोषण के लिए बाढ़ की बाधाओं को पार कर किसी तरह दूरदराज के गांवों में मजदूरी करने जाना पड़ता है। - संजू रॉय, राहुलनगर
गांव में पानी भरने पर ऊंचे स्थानों पर रात जागकर काटनी पड़ती है। पानी निकलने के बाद घरों और गांव में कीचड़ हो जाती है। दलदल में मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है। बुखार, खांसी समेत चर्म रोगों का दंश झेलना पड़ता है। रात के समय वन्य जीवों का भी खतरा बना रहता है। लेकिन शासन-प्रशासन को कोई फर्क नहीं पड़ता। - राकेश विश्वास, राहुलनगर
बाढ़ से बचने के लिए एक महीने पहले से तैयारी करते हैं। खाने का सामान जुटाते हैं। नदी का पानी गांव में कब घुस आए, यही दहशत बनी रहती है। पिछले दो सालों से हमारी फसलें नदी की भेंट चढ़ रही हैं। इस बार तो कोरोना के चलते मजदूरी भी नहीं मिल रही। बरसात के दिन ग्रामीणों पर बहुत भारी पड़ते हैं। - रामप्रसाद मंडल, राहुलनगर
बीमार होने पर 25 किलोमीटर दूर तहसील मुख्यालय जाना पड़ता है। रास्ते दलदल और कीचड़ से भरे हैं। ऐसे में यह सफर पहाड़ पर चढ़ने जैसा कठिन होता है। राशन की दुकान गांव में नहीं है। राशन लेने भी पांच किलोमीटर पैदल चलते हैं। बाढ़ के समय नेता और अफसर आते हैं। हमारे साथ फोटो भी खिंचाते हैं पर मदद कुछ नहीं करते। - अनीता रॉय, राहुलनगर
बाढ़ में बुखार, खांसी समेत कई संक्रामक बीमारियों की फैलने की आशंका रहती है। राहुलनगर क्षेत्र की एएनएम को आवश्यक दवाएं उपलब्ध करा दी गई हैं। मलेरिया बुखार, विटामिन की टैबलेट समेत अन्य दवाईयां एएनएम के पास है। क्लोरीन की टैबलेट बांटने के भी निर्देश दिए गए हैं, ताकि लोग पानी शुद्ध करके पी सकें। - डॉ. प्रेम सिंह, प्रभारी चिकित्साधिकारी।
ग्रामीण बोले- जान पर बन आई, नहीं ली स्वास्थ्य विभाग ने सुध
बीसलपुर। तहसील क्षेत्र में देवहा, कटना, माला, अमेड़ी रपटुआ और खन्नौत नदी के किनारे बसे 50 से अधिक गांवों में बाढ़ के चलते संक्रामक रोगों के फैलने की आशंका बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव का शायद ही कोई परिवार हो जहां लोग बुखार, जुकाम से पीड़ित न हों, लेकिन अब तक किसी भी बाढ़ प्रभावित गांव में स्वास्थ्य विभाग की टीम नहीं पहुंची है। संवाद
देवहा नदी में बाढ़ आते ही तलहटी में बसे हमारे गांव में पानी आ जाता है। पानी निकलने के बाद संक्रामक रोग फैलने लगते हैं। इस बार भी गांव में पानी भर चुका है। कोरोना का दौर चल रहा है। स्वास्थ्य विभाग की टीम को कम से कम इस समय तो आकर देखना चाहिए था। - शरदपाल सिंह, पूर्व प्रधान, गांव खांडेपुर।
हमारा गांव देवहा नदी से बिल्कुल सटा हुआ है। नदी का जलस्तर बढ़ते ही गांव में पानी आने लगता है। फसलें तबाह हो जाती हैं। इस बार भी संक्रामक रोग फैलने लगे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने अभी तक गांव आकर नहीं देखा। न ही इस संबंध में कोई तैयारियां की हैं। - ताराचंद गंगवार, गांव किशनी।
नदियों के किनारे बसे गांव के लोगों को बाढ़ के समय फैलने वाली संक्रामक बीमारियों के बारे में सतर्क कर दिया गया है। बाढ़ चौकी पर कार्यरत स्वास्थ्य कर्मचारियों को दवाएं उपलब्ध करा दी गई हैं। देवहा नदी के किनारे खांडेपुर और चुर्रासकतपुर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के स्टाफ से भी गांव जाकर हालात देखने को कहा गया है। स्वास्थ्य केंद्रों पर दवाइयां भी उपलब्ध करा दी गई हैं। - डॉ. ठाकुरदास, अधीक्षक, सीएचसी बीसलपुर
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ग्राम पंचायत चंदिया हजारा के गांव राहुलनगर समेत आसपास के गांवों की आबादी विस्थापित बांग्लाभाषी परिवारों की है। दशकों पहले उन्हें नदी के किनारे की जमीन सरकार द्वारा आवंटित की गई थी। कड़ी मेहनत और मशक्कत कर इन परिवारों ने जंगल में रहने की जगह बनाई। जमीन को उपजाऊ बनाया। मगर, वर्षों के संघर्ष के बाद भी बड़ी संख्या में ये परिवार आज भी वहीं पर हैं, जहां से उन्होंने अपना सफर शुरू किया था। गांवों में खड़ंजा नहीं। बरसात के पानी की निकासी को नालियां नहीं बनी हैं। अधिकांश मकान कच्चे और खपरैल वाले हैं। गांवों के पास ही में बियावान जंगल है। रात में अगर अस्पताल की जरूरत पड़े तो पूरनपुर तहसील पहुंचना इनके लिए कोई पहाड़ पार करने के बराबर है। इसकी वजह यह है कि राहुलनगर से तहसील मुख्यालय जाने वाली सड़क गड्ढायुक्त है। रास्ते में हर जगह सड़क पर पानी और कीचड़ भरा है। शारदा में जब बाढ़ आती है या जलस्तर बढ़ता है तो गांव के दर्जनों परिवार कई दिनों तक घरों के बाहर ऊंचाई पर बने मचानों में रहकर किसी तरह अपने दिन काटते हैं। अगर जलस्तर ज्यादा बढ़ा तो गांव से पलायन करना पड़ता है। बाढ़ में गांव वालों को पानी का खतरा तो अपनी जगह है, मगर दूसरा खतरा जंगली जानवरों का भी है।
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अक्सर अपना रुख बदल लेती है शारदा
शारदा नदी की खासियत यह है कि वह अपने बहाव का रुख बदल देती हैं। शारदा के बहाव पर आज तक अंकुश नहीं लगाया जा सका। हर साल शारदा नदी के आसपास बसे लोग अपनी तबाही को बहुत नजदीक से देखते हैं। पहाड़ों पर बारिश के बाद बनबसा बैराज से पानी आगे बढ़ने के बाद ही शारदा के तेवर तल्ख होने लगते हैं।
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जमीन और घर का मोह कैसे छोड़ दूं। मेरे पास कोई और साधन नहीं है। हम पहले ही उजड़ने के बाद विस्थापित के रूप में यहां आकर बसे हैं। बाढ़ आने पर सुबह रोटी बन गई तो शाम को मुश्किल है। बाढ़ के समय मजदूरी भी नहीं मिलती। परिवार कैसे पलता है, यह ऊपर वाला ही जनता है। सरकार को हमारी सुध लेनी चाहिए। - ईश्वर, राहुलनगर।
हर साल बाढ़ से यही हालात रहते हैं। फसलें बर्बाद हो जाती हैं। पूरे साल की मेहनत पर पानी फिर जाता है। साल भर घर को संवारने पर लगी धनराशि एक झटके में बाढ़ में बह जाती है। परिवार के भरण पोषण के लिए बाढ़ की बाधाओं को पार कर किसी तरह दूरदराज के गांवों में मजदूरी करने जाना पड़ता है। - संजू रॉय, राहुलनगर
गांव में पानी भरने पर ऊंचे स्थानों पर रात जागकर काटनी पड़ती है। पानी निकलने के बाद घरों और गांव में कीचड़ हो जाती है। दलदल में मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है। बुखार, खांसी समेत चर्म रोगों का दंश झेलना पड़ता है। रात के समय वन्य जीवों का भी खतरा बना रहता है। लेकिन शासन-प्रशासन को कोई फर्क नहीं पड़ता। - राकेश विश्वास, राहुलनगर
बाढ़ से बचने के लिए एक महीने पहले से तैयारी करते हैं। खाने का सामान जुटाते हैं। नदी का पानी गांव में कब घुस आए, यही दहशत बनी रहती है। पिछले दो सालों से हमारी फसलें नदी की भेंट चढ़ रही हैं। इस बार तो कोरोना के चलते मजदूरी भी नहीं मिल रही। बरसात के दिन ग्रामीणों पर बहुत भारी पड़ते हैं। - रामप्रसाद मंडल, राहुलनगर
बीमार होने पर 25 किलोमीटर दूर तहसील मुख्यालय जाना पड़ता है। रास्ते दलदल और कीचड़ से भरे हैं। ऐसे में यह सफर पहाड़ पर चढ़ने जैसा कठिन होता है। राशन की दुकान गांव में नहीं है। राशन लेने भी पांच किलोमीटर पैदल चलते हैं। बाढ़ के समय नेता और अफसर आते हैं। हमारे साथ फोटो भी खिंचाते हैं पर मदद कुछ नहीं करते। - अनीता रॉय, राहुलनगर
बाढ़ में बुखार, खांसी समेत कई संक्रामक बीमारियों की फैलने की आशंका रहती है। राहुलनगर क्षेत्र की एएनएम को आवश्यक दवाएं उपलब्ध करा दी गई हैं। मलेरिया बुखार, विटामिन की टैबलेट समेत अन्य दवाईयां एएनएम के पास है। क्लोरीन की टैबलेट बांटने के भी निर्देश दिए गए हैं, ताकि लोग पानी शुद्ध करके पी सकें। - डॉ. प्रेम सिंह, प्रभारी चिकित्साधिकारी।
ग्रामीण बोले- जान पर बन आई, नहीं ली स्वास्थ्य विभाग ने सुध
बीसलपुर। तहसील क्षेत्र में देवहा, कटना, माला, अमेड़ी रपटुआ और खन्नौत नदी के किनारे बसे 50 से अधिक गांवों में बाढ़ के चलते संक्रामक रोगों के फैलने की आशंका बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव का शायद ही कोई परिवार हो जहां लोग बुखार, जुकाम से पीड़ित न हों, लेकिन अब तक किसी भी बाढ़ प्रभावित गांव में स्वास्थ्य विभाग की टीम नहीं पहुंची है। संवाद
देवहा नदी में बाढ़ आते ही तलहटी में बसे हमारे गांव में पानी आ जाता है। पानी निकलने के बाद संक्रामक रोग फैलने लगते हैं। इस बार भी गांव में पानी भर चुका है। कोरोना का दौर चल रहा है। स्वास्थ्य विभाग की टीम को कम से कम इस समय तो आकर देखना चाहिए था। - शरदपाल सिंह, पूर्व प्रधान, गांव खांडेपुर।
हमारा गांव देवहा नदी से बिल्कुल सटा हुआ है। नदी का जलस्तर बढ़ते ही गांव में पानी आने लगता है। फसलें तबाह हो जाती हैं। इस बार भी संक्रामक रोग फैलने लगे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने अभी तक गांव आकर नहीं देखा। न ही इस संबंध में कोई तैयारियां की हैं। - ताराचंद गंगवार, गांव किशनी।
नदियों के किनारे बसे गांव के लोगों को बाढ़ के समय फैलने वाली संक्रामक बीमारियों के बारे में सतर्क कर दिया गया है। बाढ़ चौकी पर कार्यरत स्वास्थ्य कर्मचारियों को दवाएं उपलब्ध करा दी गई हैं। देवहा नदी के किनारे खांडेपुर और चुर्रासकतपुर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के स्टाफ से भी गांव जाकर हालात देखने को कहा गया है। स्वास्थ्य केंद्रों पर दवाइयां भी उपलब्ध करा दी गई हैं। - डॉ. ठाकुरदास, अधीक्षक, सीएचसी बीसलपुर